भोपाल गैस त्रासदी मामले में सोमवार को यूनियन कार्बाइड के तत्कालीन अध्यक्ष सहित सभी आठ आरोपियों को दोषी करार दिया गया। मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी मोहन पी तिवारी ने इन आरोपियों को धारा 304 ए और धारा 304 के तहत दोषी करार दिया। जिन लोगों को दोषी ठहराया गया है, उनके नाम हैं- यूसीआईएल के तत्कालीन अध्यक्ष केशव महेन्द्रा, प्रबंध संचालक विजय गोखले, उपाध्यक्ष किशोर कामदार, वर्क्स मैनेजर जे मुकुंद, प्रोडक्शन मैनेजर एस पी चौधरी, प्लांट सुपरिंटेंडेंट के वी शेटटी, प्रोडक्शन इंचार्ज एस आई कुरैशी और यूसीआईएल कलकत्ता।
मामले की सुनवाई के दौरान सभी आरोपी अदालत में मौजूद थे। उल्लेखनीय है कि 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी में कुल नौ लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, जिनमें से यूसीआईएल के तत्कालीन वर्क्स मैनेजर आर बी रायचौधरी की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई।
विश्व की भीषणतम औद्यौगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी के आपराधिक मामले की 25 साल की सुनवाई के बाद भोपाल के मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी मोहन पी़ तिवारी ने अपना फैसला सुनाया।
दो एवं तीन दिसंबर 1984 की रात यूनियन कारबाइड के स्थानीय कीटनाशक दवा बनाने वाले संयंत्र से रिसी जहरीली मिथाइल आइसो सायनेट गैस और उसके प्रभाव से इन पच्चीस सालों में हजारों लोग मारे जा चुके हैं तथा अब भी लाखों लोग इसके दुष्परिणाम भुगतने को मजबूर हैं।
भोपाल की जिला अदालत में गैस त्रासदी के आपराधिक प्रकरण में अभियोजन एजेंसी केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने कुल 178 गवाह और 3008 दस्तावेज पेश किए, जबकि बचाव पक्ष की ओर से आठ गवाह पेश हुए।
अभियोजन एजेंसी सीबीआई के वकील सी़ सहाय ने अदालत के सामने तर्क प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया था कि यूनियन कारबाइड इंडिया लिमिटेड संयंत्र की त्रुटिपूर्ण डिजाइन के कारण यह हादसा हुआ। उन्होंने कहा कि यूनियन कारबाइड कॉरपोरेशन अमेरिका की एक टीम ने वर्ष 1982 में किए गए एक सर्वेक्षण में संयंत्र के अंदर सुरक्षा एवं रखरखाव की लगभग दस प्रकार की कमियां उजागर की थीं, लेकिन उसके बावजूद उन्हें सुधारा नहीं गया था।
सीबीआई के वकील सहाय ने अपने तर्क में कहा कि दुर्घटना के बाद संयंत्र का दौरा करने वाली केन्द्र सरकार की टीम ने पाया था कि वहां सुरक्षा एवं रखरखाव के उचित प्रबंध नहीं थे और संयंत्र की डिजाइन भी दोषपूर्ण थी, जिसकी वजह से यह हादसा हुआ।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील डी़ प्रसाद एवं अमित देसाई ने अभियोजन के आरोपों को गलत ठहराया। बचाव पक्ष ने अभियोजन के इस तर्क का भी खण्डन किया कि वर्ष 1982 में एक कर्मचारी की मौत के बाद आई यूसीसी अमेरिका की टीम ने संयंत्र में सुरक्षा एवं रखरखाव की कमियां उजागर की थीं। उन्होंने कहा कि सुरक्षा एवं रखरखाव के मामले में यूसीआईएल सतर्क थी और उसने यहां सुरक्षा आडिट कराया।
राज्य सरकार की पहल पर केन्द्र सरकार ने यह मामला छह दिसंबर 1984 को सीबीआई को जांच के लिए सौंप दिया था। गैस त्रासदी की जांच कर रही सीबीआई ने विवेचना पूरी कर एक दिसंबर 1987 को कार्बाइड के खिलाफ जिला अदालत में आरोप पत्र पेश किया था, जिसके आधार पर सीजेएम ने भादंसं की धारा 304 एवं 326 तथा अन्य संबंधित धाराओं में आरोप तय किए थे।
इन आरोपों कि खिलाफ कार्बाइड ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और शीर्ष अदालत ने 13 सितंबर 1996 को धारा 304, 326 के तहत दर्ज आरोपों को कम करके 304 ए, 336, 337 एवं अन्य धाराओं में तब्दील कर दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने तीन अन्य अभियुक्तों यूसीसी अमेरिका के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एण्डरसन, यूसीसी अमेरिका एवं यूनियन कारबाइड ईस्टर्न, हांगकांग को भगोड़ा घोषित कर दिया था।
दूसरी ओर गैस पीडि़तों के हक में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों को इस फैसले से इसलिए कोई अधिक उम्मीद नहीं है, क्योंकि उनका आरोप है कि सीबीआई ने कार्बाइड के खिलाफ प्रकरण को ठीक तरह पेश नहीं किया है।
इस मामले में तीन अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया था, लेकिन इनमें यूनियन कार्बाइड कापोरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एंडरसन, यूसीसी यूएसए तथा यूनियन कार्बाइड ईस्टर्न
हांगकांग अदालत में उपस्थित नहीं हुए।
अभियोजन पक्ष की ओर से पहला गवाह घटना के 13 साल बाद 29 अक्टूबर 1997 को अदालत में पेश हुआ, जबकि अंतिम गवाह ने तीन सितंबर 2005 को अपनी गवाही दर्ज कराई। इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 178 गवाह पेश हुए, वहीं अदालत में 3009 दस्तावेज पेश किये गये।
बचाव पक्ष की ओर से 27 जून 2009 को पहली गवाही हुई, जबकि अंतिम गवाह ने 22 फरवरी 2009 को गवाही दी। इस दौरान बचाव पक्ष की और से 47 दस्तावेज भी पेश किये गये।
मामले की सुनवाई के दौरान सभी आरोपी अदालत में मौजूद थे। उल्लेखनीय है कि 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी में कुल नौ लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, जिनमें से यूसीआईएल के तत्कालीन वर्क्स मैनेजर आर बी रायचौधरी की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई।
विश्व की भीषणतम औद्यौगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी के आपराधिक मामले की 25 साल की सुनवाई के बाद भोपाल के मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी मोहन पी़ तिवारी ने अपना फैसला सुनाया।
दो एवं तीन दिसंबर 1984 की रात यूनियन कारबाइड के स्थानीय कीटनाशक दवा बनाने वाले संयंत्र से रिसी जहरीली मिथाइल आइसो सायनेट गैस और उसके प्रभाव से इन पच्चीस सालों में हजारों लोग मारे जा चुके हैं तथा अब भी लाखों लोग इसके दुष्परिणाम भुगतने को मजबूर हैं।
भोपाल की जिला अदालत में गैस त्रासदी के आपराधिक प्रकरण में अभियोजन एजेंसी केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने कुल 178 गवाह और 3008 दस्तावेज पेश किए, जबकि बचाव पक्ष की ओर से आठ गवाह पेश हुए।
अभियोजन एजेंसी सीबीआई के वकील सी़ सहाय ने अदालत के सामने तर्क प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया था कि यूनियन कारबाइड इंडिया लिमिटेड संयंत्र की त्रुटिपूर्ण डिजाइन के कारण यह हादसा हुआ। उन्होंने कहा कि यूनियन कारबाइड कॉरपोरेशन अमेरिका की एक टीम ने वर्ष 1982 में किए गए एक सर्वेक्षण में संयंत्र के अंदर सुरक्षा एवं रखरखाव की लगभग दस प्रकार की कमियां उजागर की थीं, लेकिन उसके बावजूद उन्हें सुधारा नहीं गया था।
सीबीआई के वकील सहाय ने अपने तर्क में कहा कि दुर्घटना के बाद संयंत्र का दौरा करने वाली केन्द्र सरकार की टीम ने पाया था कि वहां सुरक्षा एवं रखरखाव के उचित प्रबंध नहीं थे और संयंत्र की डिजाइन भी दोषपूर्ण थी, जिसकी वजह से यह हादसा हुआ।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील डी़ प्रसाद एवं अमित देसाई ने अभियोजन के आरोपों को गलत ठहराया। बचाव पक्ष ने अभियोजन के इस तर्क का भी खण्डन किया कि वर्ष 1982 में एक कर्मचारी की मौत के बाद आई यूसीसी अमेरिका की टीम ने संयंत्र में सुरक्षा एवं रखरखाव की कमियां उजागर की थीं। उन्होंने कहा कि सुरक्षा एवं रखरखाव के मामले में यूसीआईएल सतर्क थी और उसने यहां सुरक्षा आडिट कराया।
राज्य सरकार की पहल पर केन्द्र सरकार ने यह मामला छह दिसंबर 1984 को सीबीआई को जांच के लिए सौंप दिया था। गैस त्रासदी की जांच कर रही सीबीआई ने विवेचना पूरी कर एक दिसंबर 1987 को कार्बाइड के खिलाफ जिला अदालत में आरोप पत्र पेश किया था, जिसके आधार पर सीजेएम ने भादंसं की धारा 304 एवं 326 तथा अन्य संबंधित धाराओं में आरोप तय किए थे।
इन आरोपों कि खिलाफ कार्बाइड ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और शीर्ष अदालत ने 13 सितंबर 1996 को धारा 304, 326 के तहत दर्ज आरोपों को कम करके 304 ए, 336, 337 एवं अन्य धाराओं में तब्दील कर दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने तीन अन्य अभियुक्तों यूसीसी अमेरिका के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एण्डरसन, यूसीसी अमेरिका एवं यूनियन कारबाइड ईस्टर्न, हांगकांग को भगोड़ा घोषित कर दिया था।
दूसरी ओर गैस पीडि़तों के हक में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों को इस फैसले से इसलिए कोई अधिक उम्मीद नहीं है, क्योंकि उनका आरोप है कि सीबीआई ने कार्बाइड के खिलाफ प्रकरण को ठीक तरह पेश नहीं किया है।
इस मामले में तीन अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया था, लेकिन इनमें यूनियन कार्बाइड कापोरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एंडरसन, यूसीसी यूएसए तथा यूनियन कार्बाइड ईस्टर्न
हांगकांग अदालत में उपस्थित नहीं हुए।
अभियोजन पक्ष की ओर से पहला गवाह घटना के 13 साल बाद 29 अक्टूबर 1997 को अदालत में पेश हुआ, जबकि अंतिम गवाह ने तीन सितंबर 2005 को अपनी गवाही दर्ज कराई। इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 178 गवाह पेश हुए, वहीं अदालत में 3009 दस्तावेज पेश किये गये।
बचाव पक्ष की ओर से 27 जून 2009 को पहली गवाही हुई, जबकि अंतिम गवाह ने 22 फरवरी 2009 को गवाही दी। इस दौरान बचाव पक्ष की और से 47 दस्तावेज भी पेश किये गये।

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