भारत के दो सबसे बड़े व्यापारिक घरानों में जो मीडिया में भी सक्रिय हैं, जंग छिड़ गई है। सहारा समूह ने आउटलुक बिजनेस पत्रिका निकालने वाले रहेजा समूह पर इल्जाम लगाया है कि उसने झूठ प्रकाशित कर के सहारा का नुकसान किया है और मानहानि का दो सौ करोड़ रुपए का मुकदमा भी कायम कर दिया गया है।
रहेजा मुंबई का जाना माना बिल्डर समूह है। लेकिन पत्रिकाओं के मामले में उसकी किस्मत अच्छी नहीं रही। हिंदी और अंग्रेजी में रहेजा समूह ने आउटलुक पत्रिकाएं निकाली थी। इनमें से हिंदी की आउटलुक साप्ताहिक अब पाक्षिक होते हुए मासिक हो गई है और जल्दी ही अदृश्य होने की तैयारी में है। इसके अलावा अंग्रेजी पत्रिका विनोद मेहता चला रहे हैं और वह भी बाजार में ज्यादा जगह नहीं पकड़ पाई। आउटलुक बिजनेस थोड़ी बहुत चल रही है।
इसी आउटलुक बिनजेस को ले कर रहेजा और सहारा में दो अरब रुपए की जंग छिड़ी है। आउटलुक बिजनेस ने सहारा पर बहुत सारे आर्थिक घोटालों का इल्जाम लगाते हुए मध्यस्त के अपने अंत में एक रिपोर्ट छापी थी जबकि जो भी आरोप इस रिपोर्ट में लिखे थे उनकी जांच सहारा समूह के अनुसार स्टॉक एक्सचेंज बोर्ड और कई आर्थिक संस्थाएं कर रही है। ऐसे में सहारा से तथ्यों की पुष्टि किए बगैर यह रिपोर्ट छाप दी गई। सहारा ने इसी पर ऐतराज जताया है कि और अदालत ने सहारा का साथ देते हुए रहेजा की कंपनियाें को कह दिया है कि जब तक फैसला नहीं हो जाता तब तक सहारा के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं छपेगी।
आउटलुक की रिपोर्ट के अनुसार सहारा समूह अपने ग्राहकों को धोखा देता है और उनका पैसा हजम कर जाता है। शेयर बाजार में भी उसने निवेशकों को ठगा है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सहारा अखबारों में पैसा दे कर खबरे छपवाता है ताकि उसकी छवि ठीक नहीं रहे। इस रिपोर्ट में सीधे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय पर आरोप लगाया गया है कि वे अपनी सफलताओं की झूठी कहानियां प्रचारित कर रहे है। यह भी कहा गया है कि पचास हजार करोड़ के कारोबार और नौ लाख से ज्यादा कर्मचारियों का सहारा का दावा भी गलत है। यह भी कहा गया है कि सहारा के ज्यादातर धंधे घाटे में चल रहे हैं।
घाटे वाली बात पर तो शायद ही कोई विचार करे क्योंकि सहारा समूह जिस तरह से अपार पैसे लगा कर भारतीय क्रिकेट टीम को प्रायोजित कर रहा है और आईपीएल की एक पूरी टीम खरीद लेता है यह कोई घाटे में चलने वाला समूह नहीं कर सकता। वैसे भी आउटलुक बिजनेस की रिपोर्ट की एक एक पक्ति से प्रतिशोध की गंध आती है। इसमें सहारा की देशभक्ति से ले कर सामाजिक परिवर्तन में भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं और विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहने का मजाक उड़ाया गया है।
पत्रिका ने सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, बाल ठाकरे, दलाई लामा, बाबा रामदेव, प्रतिभा पाटिल, एपी जे अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, धीरूभाई अंबानी, स्वराज पॉल, रतन टाटा, बिल क्लिंटन और आदि गोदरेज के साथ खिंचवाए गए फोटोग्राफ्स का भी मजाक उड़ाया गया है। जाहिर है कि यह व्यापार की रिपोर्टिंग कम और सहारा को जलील करने की कोशिश ज्यादा है। सहारा के आर्थिक कारोबार यानी सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन को नॉन बैकिंग कंपनी कहते हुए पत्रिका आरोप लगाती है यह म्यूचुअल मंड और जीवन बीमा में भी काम कर रही है। मगर पत्रिका का आरोप है कि यह जानकारी सिर्फ सहारा की वेबसाइट पर ही उपलब्ध है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई बार सहारा के खिलाफ जांच की है मगर सहारा के खिलाफ कभी कुछ साबित नहीं हुआ।
जहां तक आउटलुक्स समूह यानी रहेजा बंधुआें की पत्रकारिता में असफलता का कारण है तो इसके बारे में खुद आउटलुक समूह के लोग स्वीकार करते है कि आउटलुक हिंदी तो कभी ठीक से चल ही नहीं पाई क्योंकि इसके संपादक की दिलचस्पी पत्रिका से ज्यादा सरकार में अपने काम करवाने में थी। अंग्रेजी की पत्रिका भी इसलिए नहीं चल पा रही क्योंकि इसके संपादक विनोद मेहता अपने ऑफिस से ज्यादा टीवी के स्टूडियो में बैठ कर ज्ञान बांटते हुए नजर आते हैं।
आलोक तोमरसाभार : - डेट लाइन इंडिया
रहेजा मुंबई का जाना माना बिल्डर समूह है। लेकिन पत्रिकाओं के मामले में उसकी किस्मत अच्छी नहीं रही। हिंदी और अंग्रेजी में रहेजा समूह ने आउटलुक पत्रिकाएं निकाली थी। इनमें से हिंदी की आउटलुक साप्ताहिक अब पाक्षिक होते हुए मासिक हो गई है और जल्दी ही अदृश्य होने की तैयारी में है। इसके अलावा अंग्रेजी पत्रिका विनोद मेहता चला रहे हैं और वह भी बाजार में ज्यादा जगह नहीं पकड़ पाई। आउटलुक बिजनेस थोड़ी बहुत चल रही है।
इसी आउटलुक बिनजेस को ले कर रहेजा और सहारा में दो अरब रुपए की जंग छिड़ी है। आउटलुक बिजनेस ने सहारा पर बहुत सारे आर्थिक घोटालों का इल्जाम लगाते हुए मध्यस्त के अपने अंत में एक रिपोर्ट छापी थी जबकि जो भी आरोप इस रिपोर्ट में लिखे थे उनकी जांच सहारा समूह के अनुसार स्टॉक एक्सचेंज बोर्ड और कई आर्थिक संस्थाएं कर रही है। ऐसे में सहारा से तथ्यों की पुष्टि किए बगैर यह रिपोर्ट छाप दी गई। सहारा ने इसी पर ऐतराज जताया है कि और अदालत ने सहारा का साथ देते हुए रहेजा की कंपनियाें को कह दिया है कि जब तक फैसला नहीं हो जाता तब तक सहारा के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं छपेगी।
आउटलुक की रिपोर्ट के अनुसार सहारा समूह अपने ग्राहकों को धोखा देता है और उनका पैसा हजम कर जाता है। शेयर बाजार में भी उसने निवेशकों को ठगा है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सहारा अखबारों में पैसा दे कर खबरे छपवाता है ताकि उसकी छवि ठीक नहीं रहे। इस रिपोर्ट में सीधे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय पर आरोप लगाया गया है कि वे अपनी सफलताओं की झूठी कहानियां प्रचारित कर रहे है। यह भी कहा गया है कि पचास हजार करोड़ के कारोबार और नौ लाख से ज्यादा कर्मचारियों का सहारा का दावा भी गलत है। यह भी कहा गया है कि सहारा के ज्यादातर धंधे घाटे में चल रहे हैं।
घाटे वाली बात पर तो शायद ही कोई विचार करे क्योंकि सहारा समूह जिस तरह से अपार पैसे लगा कर भारतीय क्रिकेट टीम को प्रायोजित कर रहा है और आईपीएल की एक पूरी टीम खरीद लेता है यह कोई घाटे में चलने वाला समूह नहीं कर सकता। वैसे भी आउटलुक बिजनेस की रिपोर्ट की एक एक पक्ति से प्रतिशोध की गंध आती है। इसमें सहारा की देशभक्ति से ले कर सामाजिक परिवर्तन में भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं और विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहने का मजाक उड़ाया गया है।
पत्रिका ने सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, बाल ठाकरे, दलाई लामा, बाबा रामदेव, प्रतिभा पाटिल, एपी जे अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, धीरूभाई अंबानी, स्वराज पॉल, रतन टाटा, बिल क्लिंटन और आदि गोदरेज के साथ खिंचवाए गए फोटोग्राफ्स का भी मजाक उड़ाया गया है। जाहिर है कि यह व्यापार की रिपोर्टिंग कम और सहारा को जलील करने की कोशिश ज्यादा है। सहारा के आर्थिक कारोबार यानी सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन को नॉन बैकिंग कंपनी कहते हुए पत्रिका आरोप लगाती है यह म्यूचुअल मंड और जीवन बीमा में भी काम कर रही है। मगर पत्रिका का आरोप है कि यह जानकारी सिर्फ सहारा की वेबसाइट पर ही उपलब्ध है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई बार सहारा के खिलाफ जांच की है मगर सहारा के खिलाफ कभी कुछ साबित नहीं हुआ।
जहां तक आउटलुक्स समूह यानी रहेजा बंधुआें की पत्रकारिता में असफलता का कारण है तो इसके बारे में खुद आउटलुक समूह के लोग स्वीकार करते है कि आउटलुक हिंदी तो कभी ठीक से चल ही नहीं पाई क्योंकि इसके संपादक की दिलचस्पी पत्रिका से ज्यादा सरकार में अपने काम करवाने में थी। अंग्रेजी की पत्रिका भी इसलिए नहीं चल पा रही क्योंकि इसके संपादक विनोद मेहता अपने ऑफिस से ज्यादा टीवी के स्टूडियो में बैठ कर ज्ञान बांटते हुए नजर आते हैं।
2 टिप्पणियां:
sir, you are talking about a dustbin magazine
यदि सच में पल्निअप्प्म चिदम्बरम प्रचारित कोई भगवा आतंक होता तो क्या
आउटलुक के मुख्या पृष्ट पर स्वास्तिक और भगवान् राम की अवमानना के उपरांत
,पत्रिका के एडिटर इन चीफ का हश्र केरला के प्रोफेस्सर टी.जे.जोसेफ जैसा न
हो गया होता ?
स्वास्तिक प्रतीक कि अवमानना
स्वास्तिक प्रतीक कि अवमानना
सेकुलर शैतानों की कुष्ठ- मानसिकता...
एल.आर .गाँधी.
सेकुलर मिडिया की एक और शैतानियत - - -आउट लुक पत्रिका के १९ जुलाई २०१० के अंक
के मुख्या पृष्ट पर हिन्दुओं के आस्था प्रतीक स्वास्तिक को विकृत रूप में
छाप कर विनोद महता ने अपनी कुष्ठ-मानसिकता का ही परिचय दिया है. हिन्दू
टेरर नामक अपने लेख पर स्वास्तिक के निशाँ को चार पिस्तौलों से बना कर
हिन्दुओं के पवित्र आराधना चिन्ह की पवित्रता को जानबूझ कर दूषित करने का
दुस्साहस किया है. इस सेकुलर शैतान की ध्रिष्ट्ता की पराकाष्टा तो तब हो गई
जब अपनी इस पत्रिका के पूरे मुख्या पृष्ट पर पिस्तौल-स्वास्तिक की पृष्ट भूमि में
पूरा पृष्ट // राम राम // //राम राम// से भर दिया. , मानो राम नाम और स्वास्तिक
आतंक के प्रतीक पिस्तौल के समान हैं !
संस्कृत में स्वस्तिक का अर्थ है सु=अच्छा , अस्ति=हो , इक= जो अस्तित्व
में है अर्थात उज्जवल भविष्य . या अच्छाई की विजय अर्थात समस्त मानवता के
लिए आशीर्वाद. बौध साहित्यकार इसे बुध के चरण-कमल मानते हुए अपनी कृति से
पूर्व स्वास्तिक का चिन्ह अंकित करना शुभ्यंकर मानते हैं. वैदिक दर्शन में
इसे ४ वेदों रिग्वेदा, सामवेद, यजुर्वेद और अर्थव वेद का प्रतीक माना जाता
है. भारतीय संस्कृति में स्वास्तिक को मानव के चार आश्रमों -ब्रह्मचर्य,
गृहस्थ वानप्रस्थ और संन्यास का प्रतीक चिन्ह माना जाता है. हिन्दू इसे
मानव के ४ जीवन लक्ष्यों -धरम, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक भी मानते हैं.
उक्त साक्ष्यों से स्पष्ट है की स्वास्तिक हिन्दू धरम में पवित्र,
शुभ्यंकर, भाग्यवर्धक और शान्ति का प्रतीक है.
स्वास्तिक को विकृत रूप में प्रदशित करना घोर पाप के साथ साथ अमंगल कारी भी
माना जाता है. नाज़ियों ने स्वास्तिक को विकृत रूप में अपनाते हुए इसे ४५
डिग्री पर टेढ़ा कर लाल पृष्ट भूमि में अंकित किया. एसा करने से स्वास्तिक
का प्रभाव विनाशकारी हो जाता है. इतिहास इस विशवास का साक्षी है - जो
हश्र नाज़ीओं का हुआ वह सबके सामने है. आतंकियों का साथ देने वाले इन
सेकुलर शैतानों का अंत भी अन्ततोगत्वा निश्चित ही है.
अपनी वैदिक संस्कृति के सम्मान की रक्षा के लिए ऐसे सेकुलर शैतान को कड़ी
से कड़ी सजा निश्चित करने के लिए सभी भारतियों से मेरा अनुरोध है कि वे अपना
विरोध अहिंसक ढंग से अवश्य दर्ज करवाएं . यदि हिन्दू आतंकी होता तो अब तक
इस राक्षस बुद्धि सेकुलर शैतान का हश्र केरला के प्रोफेस्सर टी.जे.जोसफ जैसा हो
गया होता.
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