हमारे एक मित्र जो पत्रकारिता की पढाई कर रहे हैं, पत्रकारिता पर अपनी वही संपादकों वाली सोच रखे हुए हैं, जो अन्याय और भ्रष्टाचार अपनी लेखनी से मिटाने में लगे रहते हैं, ने मुझे तब एक प्रतिक्रिया दी जब मैं लगातार उन व्यक्तव्यों के वीडियो को रिपीट,रिवाइंड, प्ले फॉरवार्ड, तो कभी उस वीडियो को टेक्स्ट में बदलने की कोशिश कर रहा था. मैं उस दिन कॉलेज भी नहीं गया था, दिन भर बीएसएनएल की इंटरनेट की धीमी गति से उस वीडियो को अपलोड करने की कोशिश कर रहा था, कई बार अपलोड फेल की भी समस्या हो रही थी. तो ये थी मेरी मनोस्थिति.
मेरे उस मित्र के उस टिपप्णी ने कि क्या आज तक किसी कन्क्लेव में गए हैं? पहली बार कोई कन्क्लेव में चले गए तो.. ऐसे कन्क्लेव रोज होते रहते हैं...
और कुछ ही देर पहले एक सन्देश आया कि अभिषेक जी प्रोग्राम के सारे वीडियो फटाफट अपलोड कर लिंक भेजे, एक विषय पर ज्यादा देर बने रहना सही नहीं हैं. मुझे झकझोर के रख दिया, मजबूर किया ये सोचने पर कि क्या इस पोस्ट को लिखा जाए या नहीं. फिर एक सवाल आया मेरे मन में की क्या मुझे इसे इस रूप में लिखने का हक हैं?
मैं उन तमाम दिग्गज के सामने क्या हू, मेरी उम्र बमुश्किल अठारह साल ही हैं. कोई अनुभव नहीं. कोई बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं. बस थोड़ी सी अलग सोच, और दुनिया के विभिन्न घटनाक्रमों से हर पल वाकिफ रहने की कोशिश.
वो तो एक महानुभाव की कृपा थी कि उन्होंने मुझे बुलाया, मुझसे बातें की, और उन्ही के साथ, उन्ही के सौजन्य से मुझे मुकेश जी, परंजय जी और आनंद प्रधान से भी मेरी मुलाकातें हुई. इन सभी बड़े लोगों के साथ मुझे एक ही टेबल पर नाश्ता करने का भी अवसर प्राप्त हुआ. उस कन्क्लेव की जो भूमिका थी मुझे वहीं, उस टेबल पर उनलोगों की बातचीत से समझ आ गयी. तब जब परंजय जी के साथ, साथ में वो सभी भी थे, मैं उस कन्क्लेव में पहुंचा, हालांकि मैं कोई उस कन्क्लेव का बुलाया हुआ मेहमान नहीं था, फिर भी गया. सुना, देखा और कैमरे में कैद किया, भोजन भी खाया.
अब जबकि मैंने अभी अभी देखा सेमिनार के बारे में कहा क्या छपा हैं. पटना के एक डेली अखबार ने इसे जिस लीड के साथ छापा क्या वही इस कन्क्लेव के दूसरे दिन मीडिया सेगमेंट का सबसे बड़ी बातें थी? शायद नहीं, इसे आप उपरोक्त वीडियो में देख सुन सकते हैं.
भड़ास 4 मीडिया ने जिस तरह से छापा क्या उससे बस औपचारिकता पूरी नहीं हो रही थी? क्या ये एक महज एक आयोजन भर था, या इस आयोजन में कहीं उम्मीद से कुछ बड़ी बाते कही गयी मीडिया और बिहार के बारें में खासकर. इन तमाम वीडियो में कोई साधारण व्यक्तव्य नहीं हैं,अगर ध्यान से सुने देंखे तो बहुत बड़ी बड़ी बातें हैं.
क्या कन्क्लेव का मतलब बस यही होता हैं की वक्ता दूर दूर से, यहां तक की सात समुन्दर पार से आयें, पटना शहर घूमें, होटलों में ठहरें, और अपना व्यक्तव्य दें, तालियां बटोरे चलते बने, और क्या मैं नहीं इन वीडियो को अपलोड करता तो ये उस हौल से बाहर के दर्शक तक पहुँच पाता क्या? हां एक बात ये भी हैं कि उसमें कई वक्ता हवाईजहाज का सफर नहीं किये, ट्रेन का सफर ही पसंद किया. हां इसमें एक बहुत बेहतर वीडियो छूट गया हू, संभव हुआ तो जल्द ही उसे भी प्रकाशित करने की कोशिश करूँगा.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें