मनमोहन सिंह ने शनिवार को 23 बच्चों को वीरता पुरस्कार प्रदान किए। इनमें दो मरणोपरांत पुरस्कार भी शामिल है। उत्तराखंड की श्रुति लोधी और राजस्थान की चंपा कंवर को मरणोपरांत पुरस्कार दिया गया है।
जान है तो जहां है, यह कहावत तो आपने बहुत सुनी होगी। लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो जान की नहीं, जहां कि चिंता करते हैं। इनमें से ही एक है देहरादून की श्रुति। उसने अपनी जान की परवाह ना करते हुए अपने एक दर्जन साथियों की जान बचा ली। अब वह इस दुनिया में नहीं है। लेकिन श्रुति के मां-बाप को आज भी इंसाफ का इंतजार है। श्रुति के परिजनों को आज भी 18 अप्रैल का वह मनहूस दिन भुलाए नहीं भूलता।
हादसे का वह दिन 18 अप्रैल 2010 ही था जो हमारे बीच से एक बहादुर लड़की को काल के गाल में ले लिया। दरअसल देहरादून की एक संस्था इको वॉच ने सेंट जोसेफ स्कूल से स्कॉलर होम तक रन टू लिव नाम से एक मैराथन दौड़ का आयोजन किया था। इसी दौरान एक पेंड़ में आग लग गई और पेंड़ बच्चों पर गिर गया। श्रुति ने जब पेड़ को गिरता देखा तो कई बच्चों को धक्का देकर उन्हें पेड़ के नीचे आने से बचा लिया और खुद पेड़ की चपेट में आ गई। यह हादसा आज भी याद करके वह बच्चें सिहर जाते हैं जो श्रुति के साथ पढ़ते हैं। भर्राए गले से वह बच्चें आज भी उस मंजर को याद करते ही रोने लगते हैं। बच्चें कहते हैं कि हमें नई जिन्दगी देकर श्रुति अपनी जान दे दी।
हादसे के बाद इस मामले में हुई चूक के लिए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए गए थे लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुआ है। अब भले ही देश श्रुति की बहादुरी को सलाम करके उसे वीरता पुरस्कार से नवाज दिया। लेकिन श्रुति के मां-बाप अपनी लाडली के इंतजार में आज भी आंसू बहा रहे हैं।
जान है तो जहां है, यह कहावत तो आपने बहुत सुनी होगी। लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो जान की नहीं, जहां कि चिंता करते हैं। इनमें से ही एक है देहरादून की श्रुति। उसने अपनी जान की परवाह ना करते हुए अपने एक दर्जन साथियों की जान बचा ली। अब वह इस दुनिया में नहीं है। लेकिन श्रुति के मां-बाप को आज भी इंसाफ का इंतजार है। श्रुति के परिजनों को आज भी 18 अप्रैल का वह मनहूस दिन भुलाए नहीं भूलता।
हादसे का वह दिन 18 अप्रैल 2010 ही था जो हमारे बीच से एक बहादुर लड़की को काल के गाल में ले लिया। दरअसल देहरादून की एक संस्था इको वॉच ने सेंट जोसेफ स्कूल से स्कॉलर होम तक रन टू लिव नाम से एक मैराथन दौड़ का आयोजन किया था। इसी दौरान एक पेंड़ में आग लग गई और पेंड़ बच्चों पर गिर गया। श्रुति ने जब पेड़ को गिरता देखा तो कई बच्चों को धक्का देकर उन्हें पेड़ के नीचे आने से बचा लिया और खुद पेड़ की चपेट में आ गई। यह हादसा आज भी याद करके वह बच्चें सिहर जाते हैं जो श्रुति के साथ पढ़ते हैं। भर्राए गले से वह बच्चें आज भी उस मंजर को याद करते ही रोने लगते हैं। बच्चें कहते हैं कि हमें नई जिन्दगी देकर श्रुति अपनी जान दे दी।
हादसे के बाद इस मामले में हुई चूक के लिए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए गए थे लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुआ है। अब भले ही देश श्रुति की बहादुरी को सलाम करके उसे वीरता पुरस्कार से नवाज दिया। लेकिन श्रुति के मां-बाप अपनी लाडली के इंतजार में आज भी आंसू बहा रहे हैं।

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