सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के हलफनामे पर सोमवार को सुनवाई करते हुए भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को नोटिस जारी कर दिल्ली पुलिस के द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब मांगा है। सुनवाई की अगली तारीख 11 जुलाई तय की गई है।
न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति एके पटनायक की पीठ के द्वारा इसके साथ ही अधिवक्ता अशोक अग्रवाल की ओर से दायर उस याचिका पर भी सुनवाई किए जाने की संभावना है, जिसमें उन्होंने दिल्ली के पुलिस आयुक्त को उन 42 सीसीटीवी कैमरों को जमा कराने के निर्देश देने का अनुरोध किया है, जिन्हें कथित रूप से रामलीला मैदान में कार्रवाई के दौरान कब्जे में लिया गया था। यद्यपि अदालत में दायर हलफनामे में शहर पुलिस ने दावा किया है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई बल प्रयोग नहीं किया गया था, बल्कि रामदेव समर्थकों पर केवल उस समय आठ आंसू गैस के गोले छोड़े गए थे जब वे हिंसक हो गए थे और पुलिसकर्मियों पर पथराव करना शुरू कर दिया था।
पुलिस ने अपनी कार्रवाई को उचित ठहराते हुए कहा है कि प्रशासन ने रामदेव को मैदान पर केवल योग शिविर आयोजित करने की इजाजत दी थी और किसी उद्देश्य के लिए नहीं। पुलिस ने कहा कि रामदेव ने उस मैदान में योगशिविर की बजाय अपने अनशन के दौरान समर्थकों को भ्रष्टाचार और कालेधन के मुद्दे पर भड़काया जहां पर 20 हजार से अधिक लोग एकत्रित थे। दिल्ली पुलिस ने अपना यह जवाब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दायर किया है। न्यायालय ने रामलीला मैदान में पुलिस कार्रवाई पर स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस को यह स्पष्ट करने के निर्देश दिये थे कि उसे रामदेव और उनके समर्थकों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई क्यों की। यद्यपि अधिवक्ता अग्रवाल ने आरोप लगाया कि पुलिस मालवीय नगर के सावित्री कालोनी निवासी विपिन मित्तल से 42 सीसीटीवी कैमरे और हार्डडिस्क जबरदस्ती ले गई। मित्तल उस साई कंपनी का मालिक है जिसे रामलीला मैदान में सीसीटीवी लगाने का जिम्मा सौंपा गया था।
अग्रवाल ने आरोप लगाया कि पुलिस ने साक्ष्यों को मिटाने के उद्देश्य से सीसीटीवी कैमरों को अपने कब्जे में लिया। उन्होंने इस मामले की जांच विशेष जांच दल से कराने के साथ ही 51 वर्षीय राजबाला को पर्याप्त मुआवजे की मांग की जो कथित रूप से पुलिस लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल हुई है।

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