देश जब आजादी के 65 वें साल में प्रवेश कर रहा है तो इस बात का अहसास बहुत कम लोगों को है कि सुदूर समुद्र और आकाश में स्वाधीनता की रखवाली करने वालों के कंधों पर अंग्रेजी जमाने की गुलामी के चिन्ह आज भी बरकरार हैं। लेकिन भारतीय नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों की वर्दी पर नेल्सन रिंग को बरकरार रखने के खिलाफ नौसेना के युवा अधिकारियों में सुगबुगहाट शुरू हो गई है।
यह विरोध अभी दबी जुबान में है और ऐतिहासिक शोध के बहाने सामने आने लगा है। ये युवा अधिकारी बढ चढ कर इस बात की वकालत कर रहे हैं कि आजादी के 65 वें साल में पहुंचने पर भारतीय नौसेना को अब उन चिन्हों को अलविदा कर देना चाहिए जो ब्रिटिश राज और गुलामी की यादों से जुडे हैं। वैसे नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुराने चिन्हों को बरकरार रखने की वकालत करते हुए कहा कि कुछ परम्पराएं हैं जिन्हें सैन्य बलों ने अपनाए रखा है। उन्होंने कहा, 'अपने पुरखों और पूर्वजों को यू नहीं भुलाया जा सकता। उस इतिहास को नहीं छोडा जा सकता जो हमारा अपना है।' लेकिन इस तर्क के जवाब में एक युवा नौसैनिक अधिकारी ने दलील दी कि भारतीय नौसेना ने ब्रिटिश राज की ऐसी अनेक परंपराओं को छोडा है जो हमारी आजादी पर और हमारी भारतीयता पर चोट करती थी।
मिसाल के तौर पर भारतीय नौसेना ने ब्रिटिशों द्वारा अपनाए गए इतिहास में 'पायरेट्स आफ मालाबार' को स्वीकार नहीं किया क्योंकि इसके अनुसार छत्रपति शिवाजी तक को मालाबार के लुटेरों में शुमार किया गया था। इस युवा अधिकारी ने कहा कि यदि इतिहास से हमने इस अध्याय को हटाया तो हम गुलामी के चिन्ह को क्यों नहीं हटा सकते। कुछ अन्य अधिकारियों का कहना है कि आजादी के बावजूद नौसेना और वायु सेना में अनेक अधिकारी ऐसे बचे रह गये थे जो ब्रिटिश थे। इसके अलावा राष्ट्रमंडल देशों ने ब्रिटिश परंपराओं को जारी रखा और भारत भी राष्ट्रमंडल के प्रमुख देशों में शामिल होने के कारण उनका पालन कर रहा है। उनकी भावनाओं का सम्मान करने खातिर दोनों सेनाओं ने कुछ परंपराएं बरकरार रखी थीं। चिन्ह बदलने के हिमायती अधिकारियों का कहना है कि अब ऐसा कौन सा ब्रिटिश अधिकारी बचा है जिसकी भावनाओं का सम्मान हमें करना है। भारतीय नौसेना के अधिकारियों के कंधों की पट्टी पर जो चिन्ह पीले रंग की रिंग के रूप में नजर आते हैं वे ब्रिटिश अधिकारी लार्ड नेल्सन की स्मृति में रॉयल इंडियन नेवी ने स्वीकार किए थे।
आजादी के बाद नौसेना ने रॉयल शब्द को गुलामी का प्रतीक मानते हुए अपने नाम से अलग कर लिया लेकिन नौसेना के अधिकारियों की वर्दी पर ब्रिटिशराज के पुराने चिन्ह बरकरार रह गए। इसी तरह भारतीय वायु सेना भी आजादी से पहले रॉयल इंडियन एयरफोर्स हुआ करती थी लेकिन देश के स्वतंत्र होने पर इसे भारतीय वायुसेना नाम दिया गया। लेकिन भारतीय वायु सेना ने अपने कंधे पर गौरव चिन्हों को ब्रिटिश एयरफोर्स की वर्दी की तरह ही बरकरार रखा। स्वाधीनता के 64 साल पूरे होने पर भी ये चिन्ह हमारी वायु सेना और नौसेना के कंधों पर सजे हुए हैं। दूसरी ओर भारतीय थल सेना ने देश की आजादी के साथ ही ब्रिटिश चिन्हों को अलविदा कह दिया और अपने कंधों पर गौरव चिन्ह के रुप में अशोक की लाट के राष्ट्रीय चिन्ह को अपना लिया। थल सेना के अधिकारियों के कंधों पर आज एक भी गुलामी की यादों का चिन्ह नहीं है।भारतीय नौसेना दिवस 4 दिसम्बर को मनाए जाने के बारे में भी यह तर्क दिया जा रहा है कि नौसेना दिवस उसी दिन मनाया जाना चाहिए जब ये रॉयल इंडियन नेवी से भारतीय नौसेना में तब्दील हुई थी। अभी नौसेना दिवस उस दिन मनाया जाता है जब 3 और 4 दिसम्बर 1971 की रात भारतीय नौसेना के जंगी पोत आईएनएस राजपूत ने पाकिस्तान की पनडुब्बी पीएनएस गाजी को विशाखापत्तनम के पास डुबो दिया था।

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