आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया ने रेल मंत्रालय की कमर तोड़ दी है। ऊपर से दीर्घकालिक योजनाओं पर तात्कालिक कार्रवाई की बजाय रेलवे बोर्ड सहित विभिन्न जोनल रेलवे की कछुआ चाल से रेलवे महकमा कंगाली के कगार पर है।
रेलवे की खाली हुई तिजोरी का सीधा असर बैलेंस-शीट पर पड़ा है। भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में रेलवे की खस्ता होती माली हालत पर भी अगर केंद्र सरकार नहीं चेती तो रेलकर्मियों के वेतन और पेंशन के भी लाले पड़ सकते हैं।
रेल मंत्रालय का कैश-सरप्लस दो साल में धड़ाम से गिरा है। रेलवे की बीमार हालत की बखिया उधेड़ते हुए रिपोर्ट में इस बात का खास जिक्र है कि कैश-सरप्लस महज 75 लाख रुपए में सिमट कर रह गया है। आर्थिक मोर्चे पर शिकस्त खा रहे रेल मंत्रालय के लिए इसे एक खतरनाक संकेत माना जा रहा है। दो वर्ष पहले तक वर्ष 2007-08 में रेलवे का कैश-सरप्लस 13 हजार 431 करोड़ रुपए था।
मंत्रालय की ओर से केंद्रीय वित्त मंत्रालय को लगातार डिविडेंड का भुगतान कर यह संकेत देने की कोशिश की गई कि सब ठीक है,लेकिन कैग की रिपोर्ट केंद्र सरकार को खबरदार कर रही है। इतना ही नहीं, रेलवे की बैलेंस-शीट को आईना दिखाने वाला ऑपरेटिंग-रेशो बेहद तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 17 में से 9 जोनल रेलवे की ऑपरेटिंग-रेशो 100 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है। यानी 100 रुपए कमाने के लिए रेलवे को 100 रुपए से भी ज्यादा खर्चने पड़ रहे हैं। ममता बनर्जी अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। रेलमंत्री रहते हुए उन्होंने भारी घाटे में चल रही कोलकाता मेट्रो के विस्तार की योजना को मूर्त रूप दिया। अब उस योजना पर रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी काम कर रहे हैं। कोलकाता मेट्रो की जर्जर आर्थिक दशा बताते हुए रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि 100 रुपए कमाने के लिए वहां 200 रुपए से ज्यादा खर्च किया जा रहा है।

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