दिवसों की ढेर में शिक्षक दिवस.. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

दिवसों की ढेर में शिक्षक दिवस..

आज-काल पश्चिमी संस्कृति कहे या कुछ लेकिन किसी ना किसी वजह से हर दिन कोई ना कोई दिवस इस भारतवर्ष में भी जरुर मनाया जा रहा हैं. दिवसों की इस प्रणाली में कुछ ऐसे दिवस जिसे हमें विशेष रूप से मनाना चाहिएउसे उतना महत्व नहीं दे पा रहे हैं. शिक्षक दिवस जो की एक ऐसा ही दिवस हैं. अपने गुरु को साल में महज एकबार याद करना वाकई एक प्रकार की औपचारिकता हैं लेकिन व्यस्तताओं के बावजूद अपने जीवन के इसमहत्वपूर्ण इंसान को तहे दिल से शुक्रिया अदा करने का एक माध्यम यह शिक्षक दिवस कहलाया जा सकता हैं.

गुरु शब्द सुनते ही हमारे मस्तिष्क में छवि बनती है उन शिक्षकों की जिनसे हमने स्कूल या कॉलेज में शिक्षा ग्रहणकी हैं. इनके साथ ही गुरु वो भी है जो जिनसे हमें कुछ न कुछ सीख मिले. फिर चाहे वह नन्हा बच्चा ही क्यों न हो. यदि वह भी हमें भटकाव से सही राह पर ले जाए तो वह भी हमारा गुरु ही कहलाएगा. एकलव्य और द्रोणाचार्य जैसेगुरु-शिष्य के कई उदाहरण हमारे सामने है. विद्यार्थी जीवन में ही नहीं बल्कि जीवन के हर पथ पर हमें कोई न कोईऐसा व्यक्ति मिलता ही है जो हमारे जीवन में एक सकारात्मक परिवर्तन लाता है. सही अर्थों में देखें तो हम हमारेदोस्तों से भी कुछ न कुछ ‍सीखते हैं. घर में भाई-बहनों से भी कुछ सीख मिलती है. तो वे भी हमारे गुरु ही हुए ना.

वास्तव में आदमी हमेशा ही छात्र बना रहता है. वो नौकरी, पेशा या धंधा कुछ भी करे. उसे हमेशा ही अपनी क्लास, सहपाठी, गुरुओं को पाएगा. साथ बैठे सहकर्मी उसके सहपाठी हैं तो बॉस उसके गुरु और वह खुद अपने जूनियर्स केलिए वह गुरु. यदि हम खेल के क्षेत्र में जाएँगे तो आपके कोच हमारे गुरु की भूमिका निभाएँगे. संभव ही नहीं किजीवन में कभी हम अपना छात्र जीवन से नाता तोड़ ले. कभी भी कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता. उसे किसी न किसी से, कहीं न कहीं कुछ न कुछ सीखना पड़ता है. कभी आपकी संतान, पत्नी, मित्र या सड़क चलता कोई भी आदमी भीआपके लिए गुरु की भूमिका निभाते हैं. ऐसे माहौल में मुश्किलें-मुश्किलें नहीं रहतीं. तभी तो हम कह सकते हैं किहाँ, हम समाज में रहते हैं और किसी क्षेत्र या शहर का प्रतिनिधित्व करते हैं.

'अंदर से सहारा दे और बाहर मारे चोट'. जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी के घड़े को मजबूत करने के लिए अंदर से सहारादेकर ऊपर से चोट मारता है. उसी प्रकार गुरु की भूमिका बहुत ही चुनौतीपूर्ण होती है. उसे गुरु के साथ-साथ हमारेमाता-पिता की भूमिका भी निभानी होती है. इन जिम्मेदारियों के साथ ही हमें शिक्षित और संस्कारवान बनाना भीगुरु की जिम्मेदारी है. हम पर अपार कृपा बरसाने वाले गुरु बदले में हमसे कुछ नहीं चाहते हैं. उन्हें तो बस हमारीतरक्की और खुशहाली चाहिए. उन्हें जब भी यह खबर लगेगी कि मेरा अमुक छात्र आज इस मुकाम पर पहुँच गयाहै. तो उन्हें इसी खबर से सारी खुशियाँ मिल जाएँगी लेकिन बदले में इन्हें हम क्या देते हैं. शायद पीठ पीछे पुकारनेवाले दिए गए 'निक नेम'. कई बार तो वास्तविक नाम याद करने के लिए दिमाग पर विशेष जोर डालना पड़ता हैंबड़े ही दु:ख की बात है कि कक्षा के मेधावी छात्र भी इस 'बीमारी' से बच नहीं पाते. क्यों पुकारते हो अपने गुरुओं कोइन नामों से? एक बात हमेशा यह बात याद रखें. गुरु आखिर गुरु होते हैं.

हाँ समकालीन समय में कुछ शिक्षक ऐसे भी पायें जाते हैं जो स्कूलों और अपनी टूशन की पढाई में अंतर करते पायेंजाते हैं उन्हें भी छात्रों के बीच अपनी विश्वसनीयता को कायम कराने की जरुरत आज हो गयी हैं.अपने अच्छे गुरुओंके प्रति हमेशा आदर और श्रद्धा का भाव रखिए. जीवन में कभी भी उन्हें याद करेंगे तो आत्मिक सुख मिले बगेरनहीं रहेगा . इस शिक्षक दिवस पर तमाम शिष्यों को गुरुओं का आदर और गुरुओं से समानता तथा विश्वसनीय कीकी अपेक्षा हैं .यदि ऐसा हुआ तो निश्चित ही इस रिश्ते का महत्व और अधिक होगा और इस शिक्षक दिवस का भी..
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निलेश झालटे
स्वतंत्र पत्रकार
09822721292
nileshzalte11@gmail.com

1 टिप्पणी:

Pallavi saxena ने कहा…

सारगर्भित आलेख.... कभी समय मिले तो आयेगा मेरी भी पोस्ट पर आपका स्वागत है।
http://mhare-anubhav.blogspot.com/