क्या फिर से ऐसे घोटालों के लिए जमीन तैयार की जा रही है, जिसके बारे में हम सपनों में भी नहीं सोच सकते। अगर इसका उत्तर मुझे देना हो तो उत्तर हाँ है। 1.76 लाख करोड़ के टूजी, प्रतीक्षारत केजी के बाद संभवतः बैंकिंग ऐसा क्षेत्र होगा जहाँ बड़े घोटाले के लिए अंकुरण की प्रक्रिया शुरू होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि अनिल अंबानी ने बैंकिंग कारोबार शुरू करने की इच्छा जाहिर की है। टूजी और केजी घोटालों में जो गम्भीर आरोप अंबानियों पर लगे हैं वो इस सम्भावना को प्रबल बना रहे हैं कि बैंकिंग सेक्टर भी अंबानियों के लिए सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी साबित होगी।
मामला केवल टूजी और केजी घोटालों तक ही सीमित नहीं है, इतिहास बताता है कि जहाँ-जहाँ अंबानियों ने कदम रखे हैं वहाँ-वहाँ वो विवादों में घिरे हैं। इस औद्योगिक घराने का ‘मिडास टच’ महज इत्तेफाक या बुलन्द किस्मत का मामला नहीं है। फ्रेंच उपन्यासकार बेलजेक के शब्दों में कहें तो ‘हर महान सौभाग्य के पीछे अपराध छुपा होता है’(Behind every great fortune there is a crime)।
टूजी घोटाले की बात करें तो भारतीय इतिहास के इस सबसे बडे घोटाले में रिलायंस की भूमिका बेहद संदेहास्पाद पाई गई है। आरोप है कि रिलायंस ने स्पेक्ट्रम में अधिक हिस्सेदारी पाने के लिए श्वान टेलीकॉम का सहारा लिया और उसमें अपनी हिस्सेदारी होने की बात को छुपाया, जो कम्पनी कानून का भी उल्लंघन था। इस आरोप में रिलायंस के तीन उच्च पदाधिकारी गौतम दोषी, हरि नायर और सुनील पिपरिया तिहाड जेल में हैं। हांलाकि रिलांयस श्वान के साझेदार होने की बात को नकारता है उसका कहना है कि उसने शेयर, स्पेक्ट्रम आवंटित हो जाने के बाद खरीदे थे। लेकिन कई बातें रिलायंस की संदेहास्पद भूमिका की और इशारा करती हैं। मसलन श्वान की एलतितास को बेचे गए शेयर और रिलायंस द्वारा अन्य कंपनी को बेचे गए शेयरों की कीमत मे भारी अंतर था। वैसे श्वान के इतिहास को जानने के लिए सीबीआई स्विजरलैंड से मदद ले रही है। वैसे अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के अलावा स्विजरलैंड अन्य कारणों के चलते सुर्खियों में ज्यादा रहता है। जानकारी के लिए बताते चलें कि फर्जी कम्पनियों के जरिए शेयर बाजार में गड़बड़ी फैलाने के एक नहीं कई आरोप रिलायंस पर धीरूभाई अंबानी के समय से लगते रहे हैं।
पूर्व में रिलायंस से जुड़े एस गुरूमूर्ति ‘रिलायंस’ की एक अनोखी खासियत के बारे में बताते हैं। गुरूमूर्ति कहते हैं “बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा मुनाफे के लिए नियमों का तोड़ना कोई नई बात नहीं है। वे अपनी राजनीतिक घनिष्ठताओं के चलते ये आसानी से कर भी लेते हैं। लेकिन इन सब के बावजूद, एक लक्ष्मण रेखा है जिसे नहीं लांघा जाता। लेकिन अंबानियों के लिए ऐसी कोई रेखा नहीं है वह अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।
सरकार कोई भी हो रिलायंस का काम बिना बाधा चलते रहता है। रिलायंस की राजनीतिक घनिष्ठताओं के चलते एक मजाक राजनीतिज्ञों के बीच काफी प्रचिलत है कि देश की सबसे बड़ी पार्टी कौन सी है? उत्तर है रिलायंस पार्टी ऑफ इन्डिया।
केजी घोटाला जिसे विशेषज्ञ टूजी से भी बड़ा घोटाला मान रहे हैं मुकेश अंबानी के लालच को दिखाता है। केजी बेसिन से जुड़ी कैग की रिपोर्ट में रिलायंस इंडस्ट्री लि.(रिल) पर गम्भीर आर्थिक अनियमितताओं के आरोप हैं। कृष्णा-गोदावारी(केजी) बेसिन दरअसल एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ हाइड्रोकॉर्बन के भण्डार मिले हैं। (हाइड्रोकॉर्बन ऊर्जा के प्रमुख स्त्रोतों में गिना जाता है। जैसे-एलपीजी) कैग का कहना है कि रिलायंस ने अपने पूंजीगत व्यय (कैपएक्स capital Expenditure) को बिना उचित छानबीन के बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जिससे सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हुआ। सीपीआई(एम) के राज्यसभा सांसद तपन सेन तो एलपीजी की कीमतों में हो रही बढोत्तरी की वजह भी इस सौदे में हुए घालमेल को मानते हैं।
लगभग 11 क्षेत्रों में [पेट्रोकेमिकल, पेट्रोलियम रिफाइनिंग एवं मार्केटिंग, पोलिस्टर, तेल एवं गैस, रिटेल टेक्सटाइल(मुकेश), संचार, वित्तीय कारोबार/सेवा(रिलायंस कैपिटल),ऊर्जा, निर्माण क्षेत्र एवं मनोरंजन(अनिल)] कारोबार करने वाले अंबानी बंधुओं ने मुनाफा कमाने के लिए देश की सुरक्षा और संवेदनशीलता को भी महत्व देना जरूरी नहीं समझा है। अगर आपको याद हो तो रिलायंस को विदेशी कॉलो को लोकल कॉल बनाने का दोषी पाया गया था। इस हरकत के लिए उस पर जुर्माना भी लगा था। वैसे चेतावनियाँ और पेनाल्टी रिलायंस के लिए कोई नई बात नहीं है। सेबी कई मामलों में रिलायंस को चेतावनी देता रहा है। एक मामले में कोड ऑफ कंडक्ट के नियमों के उल्लंघन के चलते सेबी ने आदेश दिया था कि रिलायंस सिक्योरिटीज 45 दिन तक नए ग्राहकों को नहीं ले पाएगी। रिलायंस सिक्योरिटीज रिलायंस कैपिटल की शाखा है। रिलायंस पर विदेशी धन को शेयर बाजार में लगाने के चलते 25 करोड रूपये का रिकार्ड जुर्माना भी सेबी वसूल चुका है।
राष्ट्रीयकृत बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का आधार हैं। निजी बैंकों को बढ़ावा देने की प्रवृति अच्छी नहीं है। यह उल्टी गंगा बहाने जैसा है। विश्व की मजबूत अर्थव्यवस्थाओं ने इसके दुष्परिणाम भुगते हैं। अमेरीका और आइसलैंड इसके उदाहरण हैं। आइसलैंड में वहाँ का शीर्ष बैंक लैंड्सबैंकी क्या बैठा वहां की पूरी बैंकिंग प्रणाली ही बैठ गई। इसी तरह लीमन ब्रदर्स का दिवालिया होना अमेरीका की अर्थव्यवस्था के लिए काफी घातक सिद्ध हुआ। दोनों निजी स्वामित्व वाले बैंक थे।
वैसे सरकार अब इस जिन्न को बाहर निकाल चुकी है कदम वापस खींचने की उम्मीद कम ही है। हांलाकि आरबीआई ने बैंकिंग लाइसेंस के लिए मानकों को सख्त रखा है। रियल एस्टेट निर्माण और ब्रोकिंग कंपनियों को लाइसेंस न देने की बात कही गई है साथ ही नेटवर्थ के 10 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज भी नहीं दिया जा सकेगा। लेकिन इन सबके साथ ही साथ यह भी जरूरी है कि साख को भी ध्यान में रखा जाए।

---शिशिर सिंह---
shi2r.si@gmail.com
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