सर्दियों में पक्षी हिमालय से विस्थापित हो समतल भूमि पर आ जाते हैं, जहाँ सर्दी कम पड़ती है. इन खूबसूरत और रंग बिरंगे पक्षियों के आगमन के उपलक्ष और स्वागत में मिथिला में सामा चकेवा त्यौहार के रूप में मनाई जाती है जिसे भाई बहन के पवित्र रिश्ते को समर्पित किया जाता है.
बहने इस त्यौहार के माध्यम से अपने भाई के लम्बी उम्र की कामना करती हैं. यह त्यौहार सामा चकेवा नामक पक्षी के जोड़े के आगमन और स्वागत से शुरू होती है. बहने तरह तरह के मिट्टी से पक्षी बना उन्हें पारंपरिक तरीके से सजाती हैं. इस त्यौहार का अंत इस उम्मीद के साथ किया जाता है कि पक्षी फिर अगले वर्ष आवें और इसे सामा चकेवा की बिदाई के रूप में की जाती है. कहा जाता है कि सामा अपने ससुराल चली जाती है.
छठ के पारण यानि कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सामा चकेवा शुरू होता है और कार्तिक पूर्णिमा को सामा चकेवा की बिदाई की जाती है. सामा चकेवा पक्षियों की जोड़ी जो इस त्यौहार में सबसे ज्यादा महत्त्व रखता है छठ के पारण यानि कार्तिक शुक्ल सप्तमी को मिट्टी से सामा चकेवा की जोड़ी बनाई जाती है. बाकी सारी मूर्तियाँ जिनमे चुगला, वृन्दावन, बटगमनी इत्यादि कार्तिक शुक्ल एकादशी यानि नरक निवारण एकादशी तक पूरा किया जाता है. कहते है एकादशी के दिन ही सामा के ससुराल जाने का दिन तय होता है और इस दिन से सारी मूर्तियों को रंगना सजाना शुरू हो जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन सामा की बिदाई हो जाती है.
प्रतिदिन रात्रि समय बहने एक बांस की टोकरी में अपनी अपनी मूर्तियों को रख साथ ही एक दिया जलाकर जुते हुए खेतों में अपने भाइयों के साथ जाती हैं. बहने अपने अपने भाइयों के लम्बी उम्र की कामना मनोरंजक तरीके से करती हैं. भाई भी इस खेल में उपस्थित रहते हैं. यह सिलसिला प्रतिदिन रात्रि में होता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन बहने अपने भाइयों के साथ खेतों में जाती हैं और मूर्तियों को भाइयों के घुटने से तुड़वा उनकी लम्बी उम्र की कामना के साथ सामा चकेवा का विसर्जन कर देती हैं. भाइयों को मिठाई खिला अगले वर्ष फिर सामा चकेवा के आने की कामना के साथ घर वापस आ जाती हैं.
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