इस साल करीब एक दर्जन बार पेट्रोल कीमतों में बढ़ोतरी झेल चुकी जनता को अगले सप्ताह थोड़ी राहत मिल सकती है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कमी का दौर जारी रहा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती बनी रही तो अगले सप्ताह भारत में भी पेट्रोल की कीमत घट सकती है। हालांकि यह कमी कितनी होगी, इस बारे में कुछ तय नहीं है।
आईओसी अध्यक्ष आरएस बुटोला ने कहा, 'पेट्रोल की कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल से घट कर 115 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है। डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती के साथ ही यह दौर जारी रहना चाहिए।'
तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर ही हर 15 दिन पर दाम की समीक्षा करती हैं और दाम बढ़ा देती हैं। पिछले सप्ताह भी 1.80 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी इसी आधार पर की गई है। कंपनियों का कहना है कि उन्हें भारी घाटा हो रहा है। भारत में तेल बेचने वाली सबसे बड़ी और नवरत्न कंपनी आईओसी का कहना है कि चालू वित्त वर्ष के पहले तीन महीने में उसे 30700 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। एक और कंपनी एचपीसीएल भी 3200 करोड़ रुपये का घाटा होने का दावा कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल कंपनियों को घाटा नहीं हो रहा है। उनकी राय में मामला यह है कि पेट्रोल पर मिलने वाली सब्सिडी का बोझ कौन उठाए- सरकार या तेल कंपनियां? इसी सवाल में पेट्रोल कीमतों में कमी उलझ कर रह गई है। पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा का कहना है कि सरकार टैक्स कम करके जनता को पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से निजात दिला सकती है। उनका दावा है कि इस वक्त पेट्रोल की कीमत में से एक बड़ा हिस्सा टैक्स का ही है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 68.65 रुपये लीटर है जबकि वास्तव में तेल की कीमत 23.37 रुपये है यानी बाकी 45.28 रुपये टैक्स है।
उन्होंने कच्चे तेल की खरीद और पेट्रोल की कीमत के बारे में बताया कि भारत ने कच्चे तेल के लिए जो करार किया है, उसके तहत रोजाना बाजार में कीमतों में उछाल के मुताबिक दाम नहीं बढ़ते। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में तेल की कीमत का औसत निकाला जाता है और वही कीमत सरकार को देनी होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यह सही है कि कच्चे तेल की कीमत जुलाई 2008 में 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थी लेकिन अगर 2006 से 2011 के बीच कच्चे तेल की औसत कीमत निकाली जाए तो वह 80 डॉलर प्रति बैरल है। इस तरह कायदे से पेट्रोल के दाम इतने बढ़ने ही नहीं चाहिए।
बीजेपी नेता ने सरकार ने इस तर्क को भी नकार दिया, जिसमें कहा गया था कि रुपये का अवमूल्यन होने की वजह से पेट्रोल के दाम बढ़ाने पड़े हैं। उनका कहना है कि जब रुपये की कीमत कम होती है तो पेट्रोल के दाम बढ़ाए जाते हैं लेकिन जब रुपया महंगा होता है तो फिर दाम कम क्यों नहीं किए जाते। यही नहीं, अगर रुपये का अवमूल्यन हो रहा है तो उसे रोकने के लिए सरकार अपने 315 बिलियन डॉलर के रिजर्व का इस्तेमाल क्यों नहीं करती। उन्होंने यह भी कहा कि पड़ोसी देशों में से भारत में ही पेट्रोल के दाम सबसे ज्यादा हैं। मसलन, अगर भारतीय रुपये के बराबर का आकलन किया जाए तो पाकिस्तान में भारतीय रुपये में 48.41 रुपये लीटर पेट्रोल मिल जाएगा। इसी तरह से बांग्लादेश में यह दर 44.80 रुपये और श्रीलंका में यह दर 50.30 रुपये लीटर है।
आईओसी अध्यक्ष आरएस बुटोला ने कहा, 'पेट्रोल की कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल से घट कर 115 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है। डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती के साथ ही यह दौर जारी रहना चाहिए।'
तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर ही हर 15 दिन पर दाम की समीक्षा करती हैं और दाम बढ़ा देती हैं। पिछले सप्ताह भी 1.80 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी इसी आधार पर की गई है। कंपनियों का कहना है कि उन्हें भारी घाटा हो रहा है। भारत में तेल बेचने वाली सबसे बड़ी और नवरत्न कंपनी आईओसी का कहना है कि चालू वित्त वर्ष के पहले तीन महीने में उसे 30700 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। एक और कंपनी एचपीसीएल भी 3200 करोड़ रुपये का घाटा होने का दावा कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल कंपनियों को घाटा नहीं हो रहा है। उनकी राय में मामला यह है कि पेट्रोल पर मिलने वाली सब्सिडी का बोझ कौन उठाए- सरकार या तेल कंपनियां? इसी सवाल में पेट्रोल कीमतों में कमी उलझ कर रह गई है। पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा का कहना है कि सरकार टैक्स कम करके जनता को पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से निजात दिला सकती है। उनका दावा है कि इस वक्त पेट्रोल की कीमत में से एक बड़ा हिस्सा टैक्स का ही है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 68.65 रुपये लीटर है जबकि वास्तव में तेल की कीमत 23.37 रुपये है यानी बाकी 45.28 रुपये टैक्स है।
उन्होंने कच्चे तेल की खरीद और पेट्रोल की कीमत के बारे में बताया कि भारत ने कच्चे तेल के लिए जो करार किया है, उसके तहत रोजाना बाजार में कीमतों में उछाल के मुताबिक दाम नहीं बढ़ते। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में तेल की कीमत का औसत निकाला जाता है और वही कीमत सरकार को देनी होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यह सही है कि कच्चे तेल की कीमत जुलाई 2008 में 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थी लेकिन अगर 2006 से 2011 के बीच कच्चे तेल की औसत कीमत निकाली जाए तो वह 80 डॉलर प्रति बैरल है। इस तरह कायदे से पेट्रोल के दाम इतने बढ़ने ही नहीं चाहिए।
बीजेपी नेता ने सरकार ने इस तर्क को भी नकार दिया, जिसमें कहा गया था कि रुपये का अवमूल्यन होने की वजह से पेट्रोल के दाम बढ़ाने पड़े हैं। उनका कहना है कि जब रुपये की कीमत कम होती है तो पेट्रोल के दाम बढ़ाए जाते हैं लेकिन जब रुपया महंगा होता है तो फिर दाम कम क्यों नहीं किए जाते। यही नहीं, अगर रुपये का अवमूल्यन हो रहा है तो उसे रोकने के लिए सरकार अपने 315 बिलियन डॉलर के रिजर्व का इस्तेमाल क्यों नहीं करती। उन्होंने यह भी कहा कि पड़ोसी देशों में से भारत में ही पेट्रोल के दाम सबसे ज्यादा हैं। मसलन, अगर भारतीय रुपये के बराबर का आकलन किया जाए तो पाकिस्तान में भारतीय रुपये में 48.41 रुपये लीटर पेट्रोल मिल जाएगा। इसी तरह से बांग्लादेश में यह दर 44.80 रुपये और श्रीलंका में यह दर 50.30 रुपये लीटर है।

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