नहीं टूटा सांसद को मुख्यमंत्री बनाने का मिथक - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 13 मार्च 2012

नहीं टूटा सांसद को मुख्यमंत्री बनाने का मिथक

तीसरे सांसद हैं बहुगुणा, जो बने राज्य के मुख्यमंत्री

उत्तराखण्ड में चाहे भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही हो अथवा कांग्रेस की। अभी तक केवल एक बार ही विधानसभा के सदस्य को इस राज्य का मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। इससे पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री या तो विधान परिषद के सदस्यों में से बने थे अथवा सांसदों में से।  उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की पहाड़ की भोली-भाली, जनता बार-बार, कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को ही सत्ता सौंपती रही है किन्तु हर बार ये राष्ट्रीय पार्टी किसी विधायक को मुख्यमंत्री न बनाकर किसी अन्य व्यक्ति या फिर सांसद को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप देती है। जिससे इस गरीब राज्य को अनावश्यक चुनावी खर्च उठाना पड़ता है।

राज्य बनने के दौरान अन्तरिम सरकार में विधान परिषद सदस्य नित्यानंद स्वामी को राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि इसके बाद विधान परिषद के सदस्य भगत सिंह कोश्यारी को। राज्य में 2002 में हुए पहले चुनाव में नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। जो नैनीताल से सांसद थे। इसके बाद सांसद खण्डूडी को मुख्यमंत्री बनाया गया। ठीक इसी तर्ज पर इस समय एक बार फिर सांसद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश की यह दोनों राजनैतिक पार्टियां उत्तराखण्ड को राजनीति के प्रयोगशाला के रूप में प्रयोग कर रही है। इनका मानना है कि मुख्यमंत्री विधानसभा सदस्य को होना चाहिए। अन्यथा इससे राज्य पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इस पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि 2003 में सांसद खण्डूडी को राज्य विधानसभा में लाने के लिए राज्य में जहां एक विधानसभा का उपचुनाव करना पड़ा वहीं एक लोकसभा का उपचुनाव भी। ठीक इसी तरह जब खण्डूडी को मुख्यमंत्री को बनाया गया तो उस समय वर्ष 2007 में भी राज्य में धुमाकोट विधानसभा पर उपचुनाव कराना पड़ा यहंा से टीपीएस रावत विधायक थे। ठीक इसी समय यहां लोकसभा का भी उपचुनाव कराना पड़ा, जिसमें टीपीएस रावत विधानसभा की कुर्सी छोड़ने के बावजूद सांसद का चुनाव हार गए थे। 

अब इसे संयोग कहें या फिर सियासी दलों के अंदर सूबे में नेतृत्व क्षमता का अभाव, राज्य की अब तक तीनों निर्वाचित विधानसभाओं में सत्तारूढ़ पार्टी के नेता विधायक दल बनने का मौका किसी विधायक को नहीं बल्कि सांसद को ही मिला। पहली निर्वाचित विधानसभा से ही शुरू हुई यह परंपरा इस तीसरी विधानसभा में इस बार भी कायम रही। इसे राज्य का सौभाग्य कहा जाए या दुर्भाग्य राज्य में तीसरी निर्वाचित विधानसभा में लोकसभा सांसद को ही मुख्यमंत्री बनाने का मिथक कांग्रेस भी नहीं तोड़ पाई। 



(राजेन्द्र जोशी)

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