कांग्रेसियों के चेहरे की रौनक थी गायब
उत्तराखण्ड के इतिहास में विजय बहुगुणा का नाम मंगलवार को सातवें मुख्यमंत्री के रूप में में दर्ज हो गया। राज्यपाल माग्रेट आल्वा ने ठीक पांच बजे विजय बहुगुणा को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। कांग्रेस का यह हाईप्रोफाइल ड्रामा मात्र पांच मिनट में समाप्त हो गया। मुख्यमंत्री के रूप में विजय बहुगुणा के साथ किसी और मंत्री को शपथ नहीं दिलाई गई। पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि कांग्रेस को समर्थन देने वाले बसपा के तीन तथा निर्दलीय चार विधायकों को भी पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई जाएगी, लेकिन शपथ दिलाए जाने से पूर्व इन सबका नाम सूची से हटा दिया गया।
इससे पूर्व विजय बहुगुणा ने मात्र तीन विधायक यशपाल आर्य, विजय पाल सजवाण तथा सुबोध उनियाल के साथ शपथ ग्रहण समारोह के लिए बनाए गए मंच की ‘‘डी‘‘ में आकर उपस्थित जनता का हाथ हिलाकर अभिवादन किया। जबकि कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन एवं गुलाम नवी आजाद भी दर्शक दीर्घा में बैठकर इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। बीच-बीच में विजय बहुगुणा जिन्दाबाद के नारों से कार्यकर्ता उनका मनोबल बढ़ा रहे थे, जबकि समारोह स्थल पर समूचे कांग्रेसियों के न होने की कमी महसूस की जा रही थी। यही कारण है कि सभा स्थल पर पहुंचे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर वह रौनक नहीं दिखाई दी जो उनके चहेते मुख्यमंत्री के बनने पर दिखाई देती है। कार्यक्रम का संचालन मुख्य सचिव सुभाष कुमार द्वारा किया गया।
गौरतलब है कि टिहरी गढ़वाल संसदीय सीट से सांसद विजय बहुगुणा कांग्रेस में परिवार की परंपरा से निकले राजनेताओं में से एक हैं। उनका शुरुआती कैरियर अधिवक्ता और न्यायाधीश के रूप में रहा और इसके बाद उन्होंने राजनीतिक पारी की शुरुआत की। न्यायिक सेवा छोड़कर सक्रिय राजनीति में आए विजय बहुगुणा को वर्ष 2002 में मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के कार्यकाल में उत्तराखण्ड योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया था। 2007 में वह 14वीं लोकसभा के लिए चुने गए। इसके बाद 2009 में वह 15वीं लोकसभा के लिए टिहरी गढ़वाल लोकसभा सीट से चुन लिए गए। वह कई संसदीय समितियों के सदस्य भी हैं।
28 फरवरी, 1947 को इलाहाबाद में जन्मे विजय बहुगुणा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए, एलएलबी करने के बाद स्थानीय बार काउंसिल के सदस्य बने और वहां उन्होंने वकालत शुरू की। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश बने बहुगुणा को मुंबई में महाराष्ट्र हाईकोर्ट का भी न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
महाराष्ट्र में न्यायाधीश रहने के दौरान ही उन्होंने राजनीति में आने का विचार बनाया और त्याग पत्र देकर इलाहाबाद लौट आए और राजनीति में कदम रखा। उत्तर प्रदेश में वह कुछ असर छोड़ पाने में विफल रहे इसके बाद वह उत्तराखण्ड लौट गए और कांग्रेस के नेता बन गए। 1997 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सदस्य बनाया गया।
उनके पिता दिवंगत हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस के उन बड़े नेताओं में थे जिन्होंने कांग्रेस के भीतर रहते हुए भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता के समक्ष पूरा समर्पण कभी नहीं किया। वे उन चंद नेताओं में से थे जिनका स्वयं बड़ा जनाधार था। उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के राजनीतिक संन्यास से उत्पन्न ब्राह्मण नेता के संकट का समाधान भले ही बहुगुणा से पूरा न हो लेकिन उसी के भरपाई के तहत उन्हें तरजीह मिल रही है। चर्चा है कि 10 जनपथ में उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी के संबंधों के चलते यह निर्णय तमाम विरोधों के बावजूद उनके पक्ष में किया गया बताया जाता है।
(राजेन्द्र जोशी)

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