पुण्य के अवसर न गँवाएँ, सेवा को अपनाएँ - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

पुण्य के अवसर न गँवाएँ, सेवा को अपनाएँ

अपने सम्पूर्ण जीवन में हम सभी रोजाना दैनिक चर्या को अपनाते हैं और जिन्दगी गुजारते हैं। कुछ लोग रो-रोकर तो कुछ हँसी-खुशी के साथ जीवनयापन को अपनाए हुए होते हैं। जीवन जीने की कला को और अधिक धार देने के लिए जरूरी है आत्मतोष और मनःशांति।  यह जिस्म और संसाधनों के चरम उपभोग से प्राप्त नहीं हो सकती। इसके लिए जरूरी है परोपकारी जीवन, परमार्थिक कार्य और पुण्यों का संचय। इनके होने पर ही अन्दर से परम शांति, प्रसन्नता और सुकून की जिन्दगी प्राप्त हो सकती है। जीवन में आनंद की प्राप्ति के लिए जो कुछ करना हो करें, लेकिन सच्ची शांति और आत्मतुष्टि के लिए दैनिक जीवनचर्या के साथ पुण्य संचय का अध्याय जोड़ दें तो चमत्कारिक बदलाव देखा जा सकता है। सिर्फ अपने लिए न जीएं, औरों के लिए जीने का अभ्यास लाएं। इससे अपने जीवन के कई काम स्वतः होने लगते हैं और इनके लिए अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत नहीं होती।  मनुष्य को उसके प्रारब्ध के अनुसार कर्मों का फल जरूर प्राप्त होता है और कर्मों का क्षय हुए बगैर ईश्वर का सामीप्य संभव नहीं है।

पाप और पुण्य का फल निश्चित ही भुगतना पड़ता है लेकिन पुण्य के संचय से दुःखों के समय भी अतिरिक्त ईश्वरीय ऊर्जा प्राप्त हो जाती है जिससे दुःखों के अनुभव का घनत्व कम हो जाता है और दुःख भरा समय सहजता के साथ पूर्ण हो जाता है। इसी प्रकार सुखों की प्राप्ति के समय पुण्य की ताकत सुखों को बहुगुणित कर देती है, साथ ही अहंकार के बीजों को पनपने नहीं देती। इन दोनों ही स्थितियों में समय गुजारने में आनंद आता है और कर्मफल का क्षय भी आसान हो जाता है। इसलिए जीवन में प्रसन्नता और आनंद के इच्छुकों के लिए यथासंभव पुण्य संचय के रास्तों को अपनाना जरूरी है। सेवा और पुण्य के लिए अपने सामने कोई बड़ा लक्ष्य न रखें जिसे आप कभी भी पूर्ण नहीं कर सकें और जीवन भर पछताते रहें। यह अपना भ्रम ही है कि सेवा और पुण्य के लिए रुपये-पैसे जरूरी होते हैं। बल्कि हकीकत यह है कि ईमानदारी की चवन्नी भी भ्रष्ट और बेईमानों के करोड़ों पर भारी होती है। इसलिए सारे भ्रमों से अपने आपको बाहर निकालें और सेवा तथा पुण्य का रास्ता अपनाएं।

अपने रोजाना के जीवन में कई मौके ऐसे आते हैं जिनका उपयोग हम पुण्यार्जन में कर सकते हैं लेकिन अपनी अज्ञानता कहें या संवेदनहीनता, हम उन मौकों से चूक जाते हैं।  दिन-रात में दर्जनों ऐसे अवसर आते हैं जब हम पुण्य का लाभ प्राप्त कर सकते हैं लेकिन हमें भान ही नहीं होता। इन छोटे-छोटे अवसरों का लाभ लें और पुण्य कमाएं। ढेरों अवसर ऐसे आते हैं जिनमें ढेला भी खर्च नहीं करना पड़ता और ढेर सारे पुण्य अपने आप मिल जाते हैं। बस थोड़ा सा ध्यान देने की जरूरत है। रोजाना गाय-कुत्तों और कौओं को रोटी डालें। पक्षियों के लिए चुग्गा डालें तथा पानी का इंतजाम करें। कौओं को चावल भी डालें, इससे घर में बरकत रहती है। इन दिनों पशु-पक्षियों के लिए पानी का बंदोबस्त करना सबसे बड़ा पुण्य है। इसी प्रकार चींटियों के लिए कीडीनगरा(सत्तू) की  व्यवस्था करें। इससे पितरों को भी तृप्ति मिलती है और ग्रहों का शमन होता है। हर घर में यह व्यवस्था होनी जरूरी है। 

दिन में कम से कम एक परोपकार जरूर करें। यह तय कर लें कि सोने से पूर्व परोपकार का एक काम हो जाए। दिन भर में कोई अवसर नहीं मिले तो रात में रसोईघर में शेष बची अनुपयोगी भोज्य सामग्री गाय-कुत्तों व दूसरे जानवरों को खिला दें। इससे परोपकार का संकल्प पूरा हो जाएगा। अनजान पथिक को राह बताना, जरूरतमन्द की मदद करना, बीमारों और असहायों की सेवा करना भी पुण्य संचय का सशक्त माध्यम है। बस-रेल में सफर करते हुए असहाय, नारी और वृद्धजनों को सीट दें, इससे उनकी दुआएं मिलेंगी जो कि सीधे पुण्य में परिवर्तित हो जाती हैं। यह याद रखें कि वर्तमान का त्याग भविष्य के इस प्रकार के दुःखों से बचा लेगा क्योंकि आप परोपकार के मकसद से ऐसा करते हैं। और कुछ न हो सके तो अपने किसी बीमार परिचित या रिश्तेदार से फोन पर बात कर लें, इससे उसे जो तसल्ली मिलेगी वह आपको आत्मतोष का अहसास कराएगी।

यह ध्यान रखना होगा कि मन्दिरों में पैसा चढ़ाना, किसी साधु-संत या बाबे को पैसा या सामग्री देना या मन्दिरों के निर्माण के नाम पर पैसा देना कोई धर्म नहीं है। मानव धर्म यही है कि अपने आस-पास रहने वाले या सम्पर्कितों में कोई व्यक्ति अभावों के कारण दुःखी नहीं रहे और उसकी यथासामर्थ्य मदद की जाए। जिन लोगों के पास खूब पैसा है, उन्हें पैसा देकर हम समाज को अशक्त बनाने के सिवा कुछ नहीं कर रहे। आज लाखों लोग भूखे सोते हैं और हम धार्मिक अनुष्ठानों और मन्दिरों के नाम पर पैसा संग्रहण कर रहे हैं, यह समाज के साथ धोखा और बेमानी है। आज हर कहीं गौशालाओं व अन्न क्षेत्र की जरूरत है और पशु-पक्षियों के लिए पीने के पानी का प्रबन्ध करने की जरूरत है।  लोहे-लक्कड़ और पाषाणों की बजाय मनुष्य के भीतर विद्यमान दैव अंश का सम्मान करने और मानव की सेवा करने की आवश्यकता है।

पीड़ित मानवता की सेवा के लिए हर जिले में बेहतर चिकित्सालयों की जरूरत है जहाँ लोगों को गुणवत्तायुक्त ईलाज के लिए सभी प्रकार की जांचों और उपचार की व्यवस्था हो। इसके लिए क्षेत्र विशेष के भामाशाहों व धनाढ्यों को पहल करनी चाहिए। यही आज का सबसे बड़ा धर्म और परोपकार है।  लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। 
आज सेवा, धर्म और परोपकार के नाम पर  सिर्फ नाम कमाने और फोटो छपवाने का धंधा पसर गया है और इस भीड़ में बाबों और बड़े कहे जाने वाले कर्णधारों से लेकर आम आदमी तक शामिल है। भीषण गर्मी के मौजूदा दौर में आप कहीं भी चले जाएँ, बोतलों में पानी बेचने वालों की भरमार है। प्याऊ भी लगते हैं मगर वहाँ भी पैसों की दरकार होती है। मानव सभ्यता का इससे दुर्भाग्यजनक पहलू और कुछ नहीं हो सकता कि आपको प्यास बुझाने के लिए पैसे देने पड़ें। यह स्थिति उन सभी के लिए शर्मनाक है जो विकास के खोखले दावे और वादें करते हैं, सेवा और धरम के नाम पर बड़ी-बड़ी दुकानें  या एनजीओ चलाते हैं। उन सभी संत-महात्माओं, महंतों, मठाधीशों और धर्म के ठेकेदारों के लिए भी शर्म की बात है जो सिर्फ श्रद्धा और आस्था के जरिये माल बनाने और लोकप्रियता की नावों पर सवार हैं।

समाज की वर्तमान दुरावस्था में इन लोगों को संग्राहक की बजाय प्रेरक की भूमिका में आगे आना चाहिए और खुद कुछ कर सकने की स्थिति में न हों, तो अपने भक्तों और चेले-चपाटियों के जरिये पानी पिलवाने की व्यवस्थाएं हर क्षेत्र में इस प्रकार होनी चाहिए कि किसी भी जरूरतमन्द को पानी के लिए भटकना न पड़े और पैसे देकर पानी पाने की विवशता न हो। ये लोग अपने नाम और फोटो के लिए जितना खर्च करते हैं उसका दसवाँ हिस्सा भी प्याऊ और पशु जलनादों पर खर्च करें तब भी बहुत फर्क पड़ जाएगा। सेवा और परोपकार के नाम पर बड़े-बड़े  बैनरों वाली संस्थाओं के श्रेष्ठीजनों को भी चाहिए कि वे समय को पहचानें और सम सामयिक सेवा धर्म को प्रतिष्ठित करें।

यह तय मानिये कि आपका जीवन सेवा और परोपकार के लिए ही है। मैं और मेरा परिवार की आत्मेन्द्रित सोच न आपका भला कर सकती है, न समाज का और न देश का। उतनी ही कमायी की आशा रखें जिससे आपके सारे मौज-शौक पूरे हो जाएं और आनंद के साथ जीवनयापन हो। इससे ज्यादा संग्रहण कर भी लेंगे तो आप अपने आप पर खर्च नहीं कर पाएंगे।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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