आजकल हरकारों का जमाना है। हरकारे समाज-जीवन के हर क्षेत्र में हैं जिनका काम ही हलचलों को हवा देना और भ्रमों तथा अफवाहों के साथ भटकते रहना है। ये हरकारे हमारे क्षेत्रों में भी खूब हैं जो लोगों को वे सारी बातें सुनाते रहते हैं जिन्हें लोग सुनना चाहें या न चाहें, लोगों का इनकी बातों से संबंध हो या न हो। कुछ लोग जन्मजात हरकारे होते हैं और कुछ अपने संगी-साथियों के संक्रमण से बन जाते हैं। कुछ हरकारे ऎसे हैं जो वंश परंपरा से जुड़े हैं और कुछ ऎसे कर्म क्षेत्रों में घुस आए हरकारे हैं जिन्हें सुनना लोगों की मजबूरी है वरना ये अपनी हिंसक और नकारात्मक मनोवृत्तियों के फन आजमाना शुरू कर देते हैं। अलबत्ता हरकारे तो हरकारे ही हैं और रहेंगे। इनमें पढ़े-लिखों से ज्यादा अनपढ़ और नादान लोगों का जमावड़ा ज्यादा है जो अपनी अज्ञानता और बौद्धिक दिवालियेपन को छिपाने के लिए ज्ञान की बातें करते हैं और हमेशा उपदेशों या आदर्शों की भाषा में बात करते हैं।
कुछ हरकारे ऎसे-ऎसे फील्ड में घुस आए हैं जहाँ उन्हें अपने आप लोकप्रियता हासिल हो जाती है। तब इन्हें देख, इनकी हरकतों को झेलने वाले लोग उन बन्दरों को याद करते हैं जिनके हाथों में उस्तरे थमा दिए गए हैं। लोगों को यकीन आ जाता है कि हमारे पुरखों ने जिन नादानों, नासमझों और मूर्खों की कल्पना करते हुए जो-जो कालजयी कहावतें गढ़ी थीं वे आज भी अक्षरशः सत्य हैं। हमारे आस-पास भी बरसों से ऎसे हरकारों का वजूद रहा है जिन्हें झेलते-झेलते काफी समय निकल चुका है लेकिन वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आए बल्कि दिन-ब-दिन और अधिक पसरते गए। इतने कि गलियाँ छोटी पड़ती गई और वे चौड़े। आस-पास से लेकर दूर देश की बात हो या किसी के बाथरूम से लेकर चौके-चूल्हे तक की, ये खुद को इससे भिज्ञ होने का दावा करते हुए रोजाना कई-कई ऎसी बातें कहते फिरते हैं जिनका कोई आधार नहीं हुआ करता।
किसी भी आगत को पहले से प्रकटाने वाले हरकारे के रूप में ये लोग किसी एक जगह नहीं रुका करते बल्कि जगह-जगह की चर्चाओं का संग्रह करने एक से दूसरे डेरों की ओर परिभ्रमण करते रहते हैं। फिर इनकी दैनंदिन चर्चाओं के विश्लेषण और इनमें तड़का लगाने तथा मिर्च-मसाला भरने इनके अपने स्टुडियो होते हैं जहाँ सब कुछ फोकट का मिल जाता है। इन हरकारों के लिए और चाहिए ही क्या, बिना मेहनत की चाय, समोसा-कचोड़ी और चाट-पकौड़े, फिर पीने को बहुत कुछ जो वेरायटी वाला हो और रात में भी चल जाए। हरकारे कभी अकेले नहीं हुआ करते। जहाँ एकाध हरकारा होता है वह दूसरे हरकारे अपने आप तलाश लेता है अथवा उस किस्म के हरकारे उसकी गंध पाकर अपने आप साथ जुटते चले जाते हैं।
इन हरकारों का सम्प्रदाय भी भूतों की तरह होता है। कहा जाता है कि किसी जगह एक्सीडेंट के बाद अकाल मृत्यु को प्राप्त लोग भूत बन जाते हैं फिर ये भूत अपनी संख्या बढ़ाने के प्रयास करने के फेर में इसी स्थल पर दुर्घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं और इस तरह इनका कुनबा बढ़ता रहता है। भूतों की तरह हरकारों को भी जिन्दा रहने के लिए घटनाओं-दुर्घटनाओं, होनी-अनहोनी और चर्चाओं-भ्रमों तथा अफवाहों का जीवनरस चाहिए होता है। हरकारे जहाँ होते हैंं उन्हें भी भूतों की तरह धूप-अगरबत्ती और आमिष-निरामिष खान-पान की सामग्री भेंट चढ़ानी ही पड़ती है वरना ये सामान्य जनजीवन में धमाल मचा सकने की क्षमता तो रखते ही हैं। आजकल सच को जानना कौन चाहता है ? जो हरकारे कह देते हैं लोग उसे ही सच मान लेते हैं। फिर किसी भी बात को अपने तरीके से पेश करने और सामने वालों को उलझाने या भ्रमित कर देने की परंपरा का निर्वाह करते-करते ये लोग ऎसे सिद्ध हो जाते हैं कि पूरा माहौल इनकी मौजूदगी पाते ही अपने आप प्रदूषित होकर बिगड़ने लगता है। वह हरकारा ही क्या जिसकी उपस्थिति के बावजूद माहौल सकारात्मक और शांत बना रहे।
समाज का दुर्भाग्य यह है कि हरकारों के रूप में ऎसे-ऎसे लोग हमारे आस-पास विचरण कर रहे हैं जिन्हें मनुष्य की श्रेणी तक में रखना ईश्वर का अपमान होगा। इन हरकारों के लिए कहीं कोई वर्जनाएं नहीं होती, ये हर कहीं पाए जा सकते हैं। या यों कहें कि हर कहीं आवागमन और अनर्गल प्रलाप करने का इनके पास आजीवन लाईसेंस होता है। यों भी हरकारों को लोग हूरज के साण्ड या उन्मादी मानते हैं और ऎसे में कोई भी समझदार आदमी इनके साथ पंगा मोल लेना नहीं चाहता। इन हरकारों का कहीं कोई विरोध नहीं होता, इस स्थिति को ये लोग अपनी लोकप्रियता और जन-स्वीकार्यता समझते हैं और इसी की बदौलत ये इतने अहंकारी हो जाते हैं कि पूरी जिन्दगी चरम स्वच्छन्दता के साथ विचरण करते रहते हैं।
वह पुराना जमाना था जब इनके पास डोंडियां हुआ करती थी और डोंडी पीटते हुए ये कुछ भी कर गुजरते थे। आज हरकारों के पास कर्कश आवाज है, माउस हैं, लकीरें ख्िंाचने में माहिर अँगुलियाँ हैं और ढेरों संसाधन, जिनके जरिये ये कुछ भी कर गुजरते हैं। नित नए भ्रमों और अफवाहों के सहारे जैसे-तैसे जिन्दगी गुजार रहे इन हरकारों को ईश्वर ने इतनी शक्ति भी न दी होती तो ये अपना पेट पालने के लिए किन-किन रास्तों का सहारा लेते, इस बारे मेें किसी को कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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