संस्कारहीनता के आगे बौनी गई हैं ! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

संस्कारहीनता के आगे बौनी गई हैं !


शिक्षा-दीक्षा की आदर्श परंपराएं !!


शिक्षा-दीक्षा और संस्कार ये जीवन निर्माण के वे बुनियादी तत्व हैं जो व्यक्तित्व के विकास के लिए नितान्त अनिवार्य हैं और इनके संतुलन के बगैर न शिक्षा का महत्त्व है न संस्कारों का। अकेली शिक्षा-दीक्षा और अकेले संस्कारों से व्यक्तित्व के निर्माण और जीवन निर्वाह की बातें केवल दिवा स्वप्न ही हैं। व्यक्ति का जीवन इन दोनों में से एक की कमी होने पर अधूरा ही रहता है और ऎसे लोग आधे-अधूरे ही पैदा होकर अधूरेपन के साथ ही अपने जीवन की इतिश्री कर लेते हैं। पुराने जमाने से इसीलिए कहा जाता रहा है कि पढ़ना और गुनना दोनों ही जरूरी हैं तथा इनमें से एक की भी कमी होने पर मनुष्य अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य व्यक्तित्व को सर्वोत्कृष्ट ऊँचाइयां देते हुए समाज के काम आने लायक बनना था और ऎसे में  हर व्यक्ति को अपने सामने समाज दिखता था। तब सेवा भावना और सर्वांग समर्पण से समाज की सेवा होती थी। कालान्तर में समाज गौण होता गया और व्यक्ति के प्रभाव तथा कुटुम्ब की परिधियां धीरे-धीरे इतनी छोटी हो गई कि समाज की सेवा का भाव पूरी तरह पलायन कर गया और उसका स्थान ले लिया स्वार्थ सिद्धि ने।

ऎसे में व्यक्ति के लिए जहां सामने समाज और परिवेश का विराट दृश्य था वह संकीर्ण होकर अपने मैं, परिवार में सिमट गया। फिर व्यक्ति का स्वार्थ मुँह बोलने लगा तो यह परिधि सिमट आयी अपनी जेब, बैंक बैलेन्स और घर की चहारदीवारी तक। इन हालातों में आदमी का कद इतना सिमट गया कि वह घर में बंधे या आवारा घूमते हुए किसी पशु की मानिन्द सिर्फ अपना पेट भरने तक ही कैद हो गया। आज आदमी सब कुछ समेट कर इस तरह जमा करने लगा है जैसे अर्थी के साथ बाँध कर ले जाने वाला है और वही उसे अगले जनम में भी एफडी की तरह मिलने वाला हो। इस सारे नकारात्मक और आत्मघाती माहौल का मूल कारण शिक्षा-दीक्षा में कमी से भी कहीं ज्यादा संस्कारहीनता है जो पिछले कुछ दशकों में इतनी फैल गई है कि अपने गांव के गली-कूचों से लेकर महानगरों और राजधानियों तक पसरी हुई पूरे देश की परंपरागत साँस्कृतिक अस्मिता को चरने लगी है। शिक्षा के साथ ही दीक्षा का भाव समाप्त हो गया है और शिक्षा भी शिक्षा न होकर धन कमाने लायक मशीन के निर्माण की कार्यशाला होकर रह गई है जहां मशीन को बनाने वाले भी धंधा मान रहे हैं और बनने वाली मशीनें तो धंधे पर लगी हुई हैं ही।

जो जितना ज्यादा कमाने की महारत रखता है उसे उतना ही बड़ा शिक्षित और विद्वान माना जाने लगा है और उसे उतना ही ज्यादा सम्मान मिलने लगा है। भले ही उसके जीवन से संस्कार गायब हों, शुचिता भरे भावों का कोई  अता-पता नहीं हो। संस्कारों से बंधी हुई शिक्षा जहां मर्यादित जीवन को आकार  देती रही है, उन संस्कारों के करीब-करीब स्वाहा होने की स्थितियां आ पहुंची हैं। अब शिक्षा तो सिर्फ उन हुनरों तक सिमट कर रह गई है जहांं कम से कम अक्ल लगाकर ज्यादा से ज्यादा पैसा कम समय में कैसे बनाया जाए, इसका मैनेजमेंट सीखकर हर कोई निहाल हो रहा है। फिर चाहे वह पैसा मिशन का हो या कमीशन का, पुरुषार्थ से कमाया हो या दलाली का। पैसा बनाने के लिए इख्तियार किए जाने वाले रास्तों से कोई मतलब नहीं है। संस्कारहीनता के मौजूदा दौर में अव्वल यह है कि चाहे जिस तरह भी हो सके, पैसा अपने पास संग्रहण होता रहे और जो कुछ बाहर दिख रहा है वह अपने भीतर आता रहे। ऎसे-ऎसे पैसा जमा करने को ही जिन्दगी का लक्ष्य मानकर चलने वाले खूब लोग हमारे आस-पास भी हैं। भले ही इसके लिए दूसरों को किसी भी प्रकार की कोई कीमत चुकानी पड़े। दूसरों को रुला के, बरबाद करके, जिन्दगी भर के सारे तनावों और दुःखों को सामने वालों की झोली में डालकर भी पैसा बनाना और जमा करते रहना इन संस्कारहीन लोगों के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता होता है।

आज की शिक्षा में उन सभी विषयों और बिन्दुओं का समावेश है जो किसी भी प्रवृत्ति को उद्योग का दर्जा देने के लिए काफी होता है। ऎसे में इन उद्योगों से संस्कारों की बजाय अर्थार्जन की फैक्टि्रयाँ सालाना हजारों-लाखों लोग उगल रही हैं जो किसी न किसी बाड़ों में घुसकर अपने आपको भारी करने में लगे हुए हैं। संस्कारहीनता ही वह वजह  है जिसके कारण बड़े से बड़े शिक्षित लोगों के चेहरों से मुस्कान गायब है और कुटिलताएं हावी हैं। उन लोगों की वृत्तियां दूसरों को प्रसन्नता और खुशी की बजाय दुःखों और तनावों की ओर धकेल रही हैं। संस्कारहीन लोगोें का एकमेव मकसद अपने घर भरना और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए सारे प्रबन्ध करना ही रह गया है। इस हर दर्जे की संस्कारहीनता की ही वजह से आज चारों ओर शिक्षा के भारी प्रसार के बावजूद अनुशासहीनता, अमर्यादित जीवन, षड्यंत्रों भरे सफर, पशुता से परिपूर्ण चरित्र और व्यवहार, धोखाधड़ी, बेईमानी और भ्रष्टाचार तथा ऎसे सारे कारक हमारे सामने सर उठा रहे हैं जिनसे पूरा समाज, परिवेश और देश मैला होने लगा है।
एक तरफ संस्कारहीनता और दूसरी तरफ हमारी पुरातन संस्कृति और इतिहास की जड़ों से कटाव, ये दो मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से शिक्षा और साक्षरता के अपार प्रसार के बावजूद हम उन सभी समस्याओं से घिरते जा रहे हैं जिनसे मानवता लज्जित और शर्मसार होने लगी है और हमारी पूरी मानवीय सभ्यता और लोक संस्कृति को ग्रहण लगता जा रहा है।

अब भी समय है जब हम शिक्षा के साथ शिक्षा के अनुपात में ही संस्कारोें का समावेश करते हुए नई पीढ़ी को नई जीवनीदृष्टि प्रदान करें और जीवन का असली अर्थ समझाएं, तभी हमारा समाज, परिवेश और राष्ट्र सारी सम-सामयिक विषमताओं और विकारों से मुक्त होकर सच्ची भारतीयता को प्रतिबिम्बित कर सकने में समर्थ हो सकता है।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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