हावी न होने दें दासत्व..... - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हावी न होने दें दासत्व.....


वरना मर जाएगी मानवता !!!


निरन्तर दासता के बंधनों की जकड़न की वजह से आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम दासत्व की परंपराओं से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। आजादी के पहले हम बाहरियों के गुलाम हुआ करते थे लेकिन आजाद होने के बाद हम उन लोगों के गुलाम होने लगे हैं जिनके हम कहे जाते हैं अथवा जो हमारे अपने कहे जाते हैं। अंग्रेजों के रूप में अंग्रेजों की ही परंपराओं में रम गए इन लोगों का सिर्फ वर्ण ही बदला नज़र आता है, शेष काम तो वे वही कर रहे हैं जो गोरों ने किया था। अब दासत्व के मार्ग बदल गए हैं। दासत्व की परिभाषाएं बदलती जा रही हैं और दासता के स्वरूपों में भिन्नता आ गई है। उस जमाने में हमें किसी की भी गुलामी से घृणा होती थी लेकिन पराधीन होने की वजह से न कुछ कह पाने का साहस था, न कुछ कर पाने का। उस जमाने में सिर्फ सहना ही एकमात्र विकल्प हुआ करता था। उस समय पराधीनता की वजह से हमारी पुरानी पीढ़ी के लोग गुलामी का दंश झेलने को विवश थे। आजादी पा लेने के बाद हमने हर दृष्टि से स्वाधीन होने के स्वप्न देखे थे लेकिन जिन आंखों से ये स्वप्न देखे गए थे उन्हें ही मोतियाबिन्द होता चला गया। आज हमारे वे सारे स्वप्न धुंधले पड़ चुके हैं और हम फिर से दासत्व की गलियों और राजमार्गों पर भटकने के लिए विवश हो गए हैं। उस समय के और आज के दासत्व में भारी अंतर आ गया है। वो जमाना अलग था जब हम मन से न चाहते हुए भी गुलामी की जंजीरों से बंधे हुए थे और हमारे भीतर मुक्ति की जबर्दस्त छटपटाहट थी।

आज जमाना दूसरा हो गया है। हम स्वाधीन हो गए हैं और मुक्त भी, लेकिन हमारे मन में गुलाम रहते हुए सब कुछ पा जाने की तीव्रता और अकुलाहट भरने लगी है और इस वजह से हम मुक्त होते हुए भी दासत्व के बंधन स्वीकार कर लेने में गर्व महसूस करने लगे हैं। हमें खुद को यह पता नहीं है कि यह स्वैच्छिक गुलामी आखिर हमें कहाँ ले जा रही है। अपने स्वार्थों को ही हम सर्वोपरि मानने लग गए हैं और जहां हमारे स्वार्थ पूरे होने की उम्मीद जगती है वहां पहुंच कर दास बन जाने में कोई परहेज नहीं रखते। बात अपने क्षेत्र की करें या कहीं ओर की। बहुत बड़ी संख्या में ऎसे-ऎसे लोगों का जमघट है जो दासत्व की नई परिभाषाओं को जन्म देते हुए वह सब कुछ करवाने में आनंद का अनुभव करने लगे हैं जो वे करवाते हैं। इस दास धर्म के आगे हमारे मानवीय धर्म, नैतिक मूल्य और सारे आदर्श स्वाहा हो चले हैं। सिर्फ हमारी ऎषणाओं की पूत्रि्त ही हमारा मकसद रह गई है फिर चाहे इसे पाने के लिए हमें कुछ भी करना क्यों न पड़े अथवा हमसे कुछ भी क्यों न करवा लिया जाए। भले ही हमारी मर्जी हो या न हो। हम अपने कामों को आकार देने के लिए विध्वंस और सृजन के किसी भी काम को अंजाम दे सकते हैं। हमें ऎसा करने में कोई मलाल नहीं रहता कि इससे समाज या देश का क्या होगा? हमारी आने वाली पीढ़ियां कितना कोसेंगी?

आजकल दासों की लम्बी श्रृंखलाएं हैं जो हर कहीं गर्व और गौरव के साथ हमारी दास परम्परा को जीवित रखे हुए हमारे अस्तित्व को बचा रही हैं। भोग-विलासिता और पैसों के दासों से लेकर किसम-किसम के दास आजकल हमारे सामने हैं। अजीब बात यह है कि हमें उन सभी जगह गुलाम होकर जीना और दास कहलाना ज्यादा रास आ गया है जहाँ हमें शहदिया छत्ते दिखते हैं, चूसने को हड्डियाँ मिलती हैं और पीने को वह सब कुछ जिसे पीकर आदमी आदमी नहीं रहता और दास ज्यादा दासत्व के हुनर दिखाने लगता है। जहां कुछ मिलने की आशा हो वहाँ हम दासत्व की किसी भी हद तक जा सकते हैं या यों कहें कि उन जगहों पर मानवीय मूल्यों में जितनी हो सके उतनी गिरावट आ सकती है। बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो दासत्व की लम्बी यात्रा में गुलामी के सारे तेवरों का आस्वादन करते हुए साठ साला बाड़ों में रहते हुए दासत्व के मूत्र्तमान स्वरूप हो गए हैं। दासत्व का प्रभाव इतना है कि इन बाड़ों से निकलने के बाद भी गर्दन झुकाये आज भी दासत्व में रमे हुए हैं। श्मशान जिनके लिए तैयारी करने लग गया है वे लोग भी दासत्व से उबर नहीं पाए हैं और आज भी वो सब कुछ गुलामी कर रहे हैं जो दशकों से करते आ रहे हैं।  इन लोगों के भीतर न जमीर बचा हुआ है, न मूल्यों को ठहराने के लिए कोई जमीन इनके पास रही है। जो कुछ है वो पराया है और अपन तो दास के रूप में जिन्दगी को जैसे-तैसे काटने चले हैं।

दासों की कई-कई किस्में ऎसी हैं जिनके मुँह पर गुलामी के ताले इस कदर जकड़े हुए हैं कि ये भारी तनावों में जीते हुए मानसिक और शारीरिक गुलामी के बोझ तले जैसे-तैसे जिन्दा रहने को विवश हो जाएंगे मगर मुँह खोलने की हिम्मत उनमें कभी नहीं रही है।दासों को पनपाने और नए-नए दास बनाने वाली कई प्लेसमेंट एजेंसिया भी हैं जिनमें वे सारे बड़े लोग शामिल हैं जिनके पास लाल-नीली बत्तियों की मद्धिम रोशनी से लेकर पॉवर ब्रेक वाली सफेद चमचमाती कारें हैं। ये दिगर बात है कि अंधेरों को प्रश्रय देने वाले इन लोगों का पता ही नहीं चलता कि ये क्या कर रहे हैं। मगर एक बात जरूर है कि ये लोग भी गुलामों के बिना एक पल जिन्दा नहीं रह सकते। ये न होंं तो इनके घर वाले भी उन्हें छोड़ कर मुक्त हो जाएं। दासों की दो किस्मे हैं। एक कार्यस्थल पर जमा रहती है तो दूसरी बंगलों पर। इन दासों को उन सभी जगह सुकून प्राप्त होता है जहां इन्हें लगा दिया जाता है। कुछ लोग इच्छा से तो कुछ अनिच्छा से भी दासत्व को गरिमामय बनाते रहते हैं। दास बनने वालों और दास बनाने वालों की यह पारस्परिक यात्रा जब तक जीवित है तभी तक उन    सभी का भला हो रहा है जो दासत्व के बहाने कुछ न कुछ प्रसाद जरूर पा  जाते हैं। दासत्व की परंपराओं ने मानवीय मूल्यों के साथ जो कुठाराघात किया है वह आने वाली पीढ़ियों तथा समाज तक के लिए आत्मघाती सिद्ध होने वाला है। स्वाधीनता पाने के बाद मुक्तमना होकर समाज और देश के लिए जीने का जज्बा भुला कर काले अंग्रेजों की गुलामी का जो दौर चला है उसने मानवीय मूल्यों की हत्या कर दी है। आज मानवता का कत्ल हो रहा है तो उसके लिए ये ही लोग जिम्मेदार हैं जो आदमी को हमेशा पराधीन रखना और देखना चाहते हैं।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

कोई टिप्पणी नहीं: