खुद से भी होने लगते हैं पराये !!!
जो ताजा है वही ताजगी दे सकता है और इसके साथ ताजे माहौल का सृजन कर नवीन परिवर्तन की भावभूमि तैयार कर सकता है। यह बात विचारों से लेकर पदार्थों के धरातल तक सभी में लागू होती है। नवोन्मेषी जीवन जीने वाले हर क्षण ताजगी और आनंददायी स्फूर्ति का सदैव अहसास करते रहते हैं। इन लोगों का पूरा जीवन ही ताजगी से इतना भरा रहता है कि इनका पूरा आभामण्डल ही ताजगी का पर्याय हो उठता है। ऎसे में जो भी इनके सम्पर्क में आता है वह भी ताजगी और आनंद की अजीब सी हिलोरों का सुकून पाने लगता है। इस ताजगी का आनंद वह हर व्यक्ति पा सकता है जो अपने जीवन में सदैव कुछ न कुछ नया करने को उद्यत रहता है तथा दिन-रात नवीन सोच में ही जीता हुआ ताजगी से भरा हुआ रहता है। ईश्वर भी उनकी सहायता करता है जो समाज और देश के लिए नयी सोच के साथ नया-नया करने को प्रयत्नशील रहते हैं। इन लोगों को ईश्वरीय स्रोतों से विचारों की नवीन श्रृंखला आवश्यकता के समय प्राप्त होती रहती है जो इनकेे कर्म को और अधिक सुसंस्कृत, परिष्कृत और कालजयी स्वरूप प्रदान करने लगती है। दुनिया भी उन्हीं लोगों को मन से स्वीकारती है जो स्वयं नवीन आविष्कार या नवीन कर्म करते हुए उन्हें लोकार्पित करते हैं।
लेकिन ऎसे लोग बिरले ही हुआ करते हैं जिनमें कुछ न कुछ नया करते रहने का माद्दा और मौलिक हुनर होता है। इसके विपरीत अधिकांश लोग भीड़ के रूप में पैदा होते हैं। इस भीड़ में भी कई श्रेणियां हैं जिनमें वीआईपी भीड़ भी शुमार है। भीड़ की इस किस्म में वे लोग भी शामिल हैं जिन्हें बड़े लोग मानकर आदर और सम्मान दिए जाने की विवशता है, वे लोग भी शामिल हैं जो साठ साल अवधि के बाड़ों में अलग-अलग किस्मों की कुर्सियों में धँसे हुए हैं। कोई व्हील चेयर में धँसे हुए चक्कर खा और खिला रहे हैं, कोई सोफा स्टाईल कुर्सियों में धंसे हुए दूसरों पर हुकुमत कर रहे हैं, कई उच्च, मध्यम और सामान्य कुर्सियों में फिट हो गए हैं और दुनिया भर को चलाने का भरम पाले बैठे हैं। इन सभी में नकलचियों की भरमार है। हर कोई चाहता है जैसे-तैसे नकल करता हुआ अपने दिन निकाल ले। इस नकल में कई लोग अकल लगाते हैं, कई अक्लमंद लोग ठीक वैसे ही नकल करते हुए बेड़ा पार लगा देते हैं। कई ऎसे हैं जिन्हें नकल भी ठीक से नहीं करने आती, लेकिन वे भी साठ साला वैतरणी इस ठाठ से पार कर लेते हैं कोई पूछने वाला नहीं होता बल्कि सारे के सारे लोग इनकी तारीफों के पुल बाँधते हुए जयगान करते रहते हैं। एक-दूसरे की जयगान करते हुए ही पूरा कारवाँ कभी इस तरफ, तो कभी उस तरफ हिलोरें लेता हुआ किनारे पा जाता है।
किसम-किसम के उन लोकतंत्री राजाओं और इनके पीछे-पीछे फाईलों की चँवर ढुलाने वालों की बात ही निराली है। कभी अधीश की श्रेणी में शुमार किए जाने वाले ये लोग अब भी अपने अधीश्वर होने का भ्रम पाले बैठे हुए लोगों को नचा रहे हैं। ऎसे लोग हर जिले में पाए जाते हैं चाहे अपना इलाका हो या अपने देश का कोई सा क्षेत्र। इनमें कई अधीश तो ऎसे हैं जिन्हें भले ही खूब सारा जिम्मा सौंप दिया गया है मगर हकीकत में उतना माद्दा है नहीं कि तयशुदा जिम्मेदारियों का निर्वहन भली प्रकार कर सकें। ऎसे में इन लोगों के पास सिवाय दूसरे अधीशों की नकल करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा होता है। हमारे इलाके की बात हो या दूसरे इलाकों की, हर कहीं इन अधीशों की भरमार है जिनमें खुद का तो कोई हुनर है नहीं बल्कि दूसरों के किए हुए कामों की नकल करते हुए अपने बाड़ों को सर्वश्रेष्ठ मनवाने और नम्बर बढ़ाने के फेर में दिन-रात भिड़े हुए हैं। बात फाईलों से लेकर पुराने कार्यकाल, कार्यक्रमों, अभियानों, परियोजनाओं और कार्यशैली से लेकर नवाचारों के सूत्रपात की ही क्यों न हो। इन सभी में ये नकलची छत्रधारी, पॉवरब्रेकवाहनधारी, मुफतिया नौकरधारी और मुफतिया संसाधनधारियों में सफल ओहदाधारी होने का गर्व पा जाते हैं।
कई बार पुराने वजीरों की गलत नजीरों तक को अपनाने में भी ये नकलची ओहदेदार पीछे नहीं रहते, भले ही इनकी नकलचिया कार्यशैली से और लोग परेशान रहें, कुढ़ते रहें और रोजाना गालियाँ ही क्यों न बकते रहें, इन नकलचियों का क्या? वे लोग उन हर तरह के कामों को करने या करवाने में माहिर होते हैं जिनसे उनके नंबर बढ़ने की गुंजाइश हो। कई लोग तो दूसरों के कामों की नकल करते-करते हुए अपना पूरा कार्यकाल गुजार देते हैं। कई नकलचियों को बात-बात में अपने पुराने नकलचियों और आकाओं को पूछ-पूछ कर काम करना पड़ता है। जो लोग नकलची परंपरा के संवाहक हो जाते हैं वे फिर अपना कोई काम नहीं कर पाते। जिन्दगी भर हर काम पूछ-पूछ कर करना और पुराने कामों की नकल करते हुए आगे बढ़ना ही इनके जीवन की नियति हो जाता है और ऎसे में नकलचियों की डगर पर चलते-चलते ये लोग इतने पराये हो जाते हैं कि खुद के भी नहीं रहते। जीवन में यश-प्रतिष्ठा नकलची बनकर प्राप्त नहीं की जा सकती बल्कि इसके लिए मौलिक चिंतन और परिवेशीय घटनाओं तथा हलचलों से प्राप्त अनुभवों के अनुसार ही स्वयं का वैचारिक धरातल पाना जरूरी है और यह तभी आ सकता है जब हम अपने को दिए गए कत्र्तव्य कर्म में डूब कर देखें और अनुभवों से साक्षात करें।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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