मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यात्राओं के दौरान, चप्पल, अंडे़ और काले झंडे दिखाए जाने की घटनाओं के बाद सरकार और स्थानीय प्रशासन ने एक तरह से इमजेन्सी का पूर्वाभ्यास शुरू कर दिया है। काला पैंट और काला शर्ट पहनने पर पावंदी लगाई जा रही है। कांट्रेक्ट शिक्षक सभा में न आ पाएं इसके लिए रविवार या छुटिटयों के दिन भी स्कूल खोलने का फरमान जारी हो रहा है। जा
बानगी मुंगेर की है जहां नीतीश कुमार की सभा होने वाली है। एक तरह से नीतीश कुमार की हो रही जन सभाओं में आम आदमी के आने पर पाबंदी लगा दी गयी है। मुंगेर में 8 अक्टूबर को सभा हो रही है। सभा में केवल गिने-चुने तीन हजार लोगों को आने के लिए पास पार्टी की ओर से निर्गत किया गया है। जिला जद यू. मुंगेर द्वारा जारी पास पर मुंगेर जिला जदयू के अध्यक्ष ज्ञान चंद पटेल के अलावे मुंगेर के अनुमंडलाधिकारी के संयुक्त हस्ताक्षर हैं।
दिलचस्प है कि चुने हुए तीन हजार लोगों को सभा में बुलाया गया है और उन पर निगरानी रखने के लिए दस हजार पुलिस कर्मी तैनात किए गए हैं। जिले के सभी विद्यालयों के शिक्षकों को उस दिन स्ुाबह सात बजे से ही एक कैंपस में अनिवार्य रूप से जमा होने के लिए आदेश दिए गए हैं। शिक्षिकों में आधी संख्या महिलाओं की है। बिहार की सभी हिंदु महिलाएं जितिया पर्व का 24 घंटे की निर्जला उपवास रखती हैं और वह 8 अक्टूबर को ही है।
इससे साफ है कि जो काम इमरजेंसी लगाकार 1975 में इंदिरा गांधी नहीं कर पायीं वह बिहार में नीतीश कुमार करके दिखा रहे हैं। लोकतंत्र की हत्या का गवाह 8 अक्टूबर को मुंगेर बनने जा रहा है और वह भी उस दिन जिस दिन पूरा देश लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रणेता जयप्रकाश नारायण का पुण्यतिथि मना रहा होगा। विदित है कि जेपी का निधन 8अक्तूबर को हुआ था।
नीतीश कुमार की सभाओं में अब जैसा इंतजाम हो रहा है उसने इमरजेन्सी को भी मात दे दी है। विरोध की आवाज कुचल देने के लिए प्रेस पर सेंशरशीप लगाया गया था। नीतीश कुमार ने प्रेस को एक तरह से खरीद लिया है। अब तो यह कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ही हिन्दी बिहारी मीडिया के एडिटर-इन- चीफ हैं। लेकिन बिहार में सब कुछ शासकों की इच्छा से नहीं चलता। इमरजेंसी में बीमार जेपी जेल से बाहर आ गए थे। उसी दौरान तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी पुलिस की जबरदस्त नाकेबंदी के बीच फासिस्ट विरोधी सम्म्मेलन के नाम पर जेपी को खुली चुनौती देने पटना के गांधी मैदान पहुंची थी। बंदूक की नोक पर लोकतंत्र का वह चेहरा लोगों ने वर्दाश्त नहीं किया था। बिहारी युवाओं ने उस चुनौती को स्वीकार किया था। पटना में एंटी फासिस्ट सम्मेलन के दौरान इमरजेंसी के तमाम पहरों की धज्जियां उड़ाते हुए हजारों लोगों प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ नारे बाजी की थी। लेकिन आज ताज्जुब इस बात की है कि कांगे्रसी राज के दौरान भी विरोध को कुचलने के लिए सत्ता के अधिकारों और दमन की ताकतों का कोई इस्तेमाल नहीं किया था, जो आज नीतीश राज में हो रहा है, वह 1974 में जेल जाने वाले हजार हजार लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे। उस समय भी फासिज्म को बर्दाश्त नहींं किया था और आज भी नहीं करेंगे।
साभार : दिनेश सिंह (अंतरजाल)
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