आँगन बदल-बदल कर !!!
आजकल पाँव छूने, पाँव पकड़ने, परिक्रमाएँ करने, नाक रगड़ने और सब कुछ समर्पित कर देने का शगल मानवी सभ्यता पर हावी होता जा रहा है। लोगों के लिए अपना स्वाभिमान, कुल गौरव और मानवीय संस्कृति के आदर्श और नैतिकताएँ कहीं खोती चली जा रही हैं। भारतीय संस्कृति में आदर-सम्मान की परंपरा सदियों से प्रचलित रही है और इसी संस्कृति ने हमें माँ-बाप, बुजुर्ग और अपने से बड़ों के प्रति पूज्य एवं सम्मान भाव रखने की बातें सिखाई हैं। हमें यह भी सिखाया गया है कि जो वाकई मनुष्य की परिभाषा में आते हैं, आदर्श प्रेरणास्रोत हैं तथा जिनसे हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है, उनका सहज सामीप्य पाते हुए आगे बढ़ें और जीवन को गढ़ें। हमने इस परंपरा को जीवित रखते हुए और अधिक यौवन दे डाला है। आजकल हम अपने किसी भी घटिया से घटिया किस्म के और छोटे से छोटे स्वार्थ की पूर्ति कर डालने के लिए किसी भी हद तक उतरने लगे हैं। हम ऊपर उठने के लिए इतना नीचे गिर जाते हैं जिसकी कुछ दशकों पूर्व कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। पहले ज्ञान वृद्ध, बुजुर्गों तथा विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्तियों, माता-पिता, अग्रजों और बड़े बंधु-बांधवों को सम्मान दिए जाने की परंपरा थी।
आज उस परंपरा में नवाचारों का समावेश हो गया है। आज माँ-बाप और बंधुओं तथा बड़े-बुजुर्गों के कभी चरण स्पर्श नहीं करने वाले नालायक लोग उन लोगों के पाँव छू रहे हैं जो उनके स्वार्थ पूर्ति में सहायक हैं अथवा नापाक धंधों में मददगार हैं। मनुष्यों की वर्तमान प्रजाति में अधिकांश लोग ऐसे हैं जो किसी भी स्वार्थ की पूर्ति की आशा या पूर्णता पर चाहे किसी के सामने झुक कर चरणस्पर्श कर लेते हैं। फिर खूब सारे बड़े लोग भी ऐसे हैं जिन्हें चरणस्पर्श करवाने में मजा तो आता ही है, उनका अहंकार भी परितृप्त होने लगता है। चरण स्पर्श के मामले में कहीं कोई मर्यादा रेखा या अनुशासन नहीं है, जो जब चाहे अपना सकता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम सामने वाले को कितना महत्त्व देते हैं या कितना अन्यतम मानते हैं। चरणस्पर्श करने और कराने वालों का आजकल सभी जगह बाहुल्य है। छोटी आयु के प्रभावशाली लोग भी अपने से बड़ों द्वारा चरण छूने से प्रसन्न होते हैं और बेशर्म की तरह हँसते रहते हैं। बड़ी आयु के थोड़े-बहुत समझदार लोग भी ऐसे निकम्मे और बेशर्म हो गए हैं कि अपने छोटे-छोटे स्वार्थोें के लिए ऐसे-ऐसे लोगों के पाँव छूते रहते हैं जो उनसे आयु में तो छोटे हैं ही, मनुष्यता के किसी भी पैमाने पर खरे नहीं उतरते।
वास्तव में देखा जाए तो आदमी का स्वार्थ और ऐषणाएं चीज ही ऐसी हैं जिनके आगे आदमी नतमस्तक होकर वह सब कुछ करने लगता है जो नहीं करना चाहिए। लोग अपने स्वार्थों के लिए किसी भी सीमा तक अपना आँचल फैलाकर याचना कर सकते हैं, किसी भी सीमा तक पसर सकते हैं और जहाँ मौका मिलता है वहाँ पसरते हुए इतना दया भाव प्रकट कर देते हैं जितना उन्होंने किसी वास्तविक मौके पर भी नहीं किया होगा। आदमी होने के विराट और व्यापक अर्थ से बेखबर आदमी आजकल अपनी आदमीयत को खोता जा रहा है और इसकी जगह आदमी में पालतुपन तथा दासत्व के भाव हावी होते जा रहे हैं। यही कारण है कि आदमी अब औरों को पहचानने की क्षमता खो चुका है और वह भिक्षुकों की तरह हाथ तथा झोली फैलाये कभी इधर भटकता है, कभी उधर। एक बार जब कोई नंगा होकर नदी उतर जाता है अर्थात भिक्षावृत्ति को अंगीकार कर लेता है फिर उसके लिए कोई भी कार्य या अभिनय वर्ज्य नहीं कहे जा सकते। उसे जहाँ जो कुछ करना है, कर सकता है। समर्पण की इस स्थिति में पहुंचने के बाद उसे आदमीयत को ओढ़े रखना जरूरी नहीं होता। यहीं से आदमी की यात्रा शुरू हो जाती है परायी रोटियों पर पलने और पराये ओटलों पर ऐश करने की। भिक्षुकों के लिए सारा जहाँ अपना है।
हमारे अपने इलाके की बात हो या देश के किसी और कोने की, हर कहीं आदमीयत का ग्राफ निरन्तर औंधे मुँह गिर रहा है और उसी अनुपात में आदमी भी ऊँचा उठने के लिए नीचे गिर रहा है। ऐसे आदमियों को यह भान हो गया है कि अगर ऊँचा उठना हो तो दो ही रास्ते हैं। या तो अथाह परिश्रम करें या जितना गिर सकते हैं, उतना नीचे गिरें। दूसरा वाला मार्ग सहज है। इसमें किसी बात की शर्म भी नहीं, न कोई परिश्रम। फिर ऐसे लोगों को लगता है कि वे अकेले ही ऐसे थोड़े ही हैं, पूरी जमात हैं उनके साथ। बहुत से लोग अपनी सारी लाज-शरम छोड़कर और पुश्तैनी सिद्धान्तों की बलि चढ़ाकर क्या कुछ नहीं कर रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए स्वार्थ बड़ी चीज हैं और जहाँ स्वार्थ पूरे हों वहाँ कुछ भी करना इनके हक में ही होता है। इनके लिए कोई आँगन न अपना है, न पराया है। बल्कि जब तक काम होता रहे, वो आँगन उनका है। हमारे आस-पास से लेकर देश में हर कहीं ऐसे लोग काफी संख्या में मिल ही जाते हैं जो कभी इसके और कभी उसके आँगन में वृहन्नलाओं की तरह नाचते-गाते हैं और कीर्तिगान करते हुए कभी घूमर तो कभी डाण्डिया का भरपूर आनंद देते हैं। कइयों को तो इस सम-सामयिक नाच-गान में इतनी महारत हासिल है कि वृहन्नलाओं तक को मात दे देते हैं। फिर इन वृहन्नलाओं के साथ चापलूसी और मिथ्या जयगान की संगत करने वाली कई प्रत्यक्ष और परोक्ष वृहन्नलाएं भी होती हैं तथा वे भी होते हैं जो वृहन्नलाओं की प्रजाति को तैयार करने में सिद्ध हैं।
इन सभी के लिए अच्छे-बुरे का कोई भेद नहीं है। जिसके आँगन में ज्यादा सम्मान और माल मिलेगा, उसकी जय-जयकार करना ही इनका एकमात्र धर्म है। कभी आँगन बदल जाते हैं तो कभी रसिक। लेकिन इन लोगों का धंधा अपनी जगह कायम है। यों भी वैश्याओं और वृहन्नलाओं के लिए कोई नैतिक मर्यादा नहीं होती। अपने सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ कुछ न कुछ पाने के फेर में ये अपनी मनमर्जी से किसी के साथ भी अभिनय करने को स्वतंत्र हैं। आँगन बदल-बदल कर नाचने वाले इन्हीं लोगों ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं का कबाड़ा करके रख दिया है। न कोई सिद्धान्त, न नैतिकता और न ही कोई मर्यादा या अनुशासन की सीमा रेखा। जहाँ स्वार्थ पूरे हो जाएं, उस आँगन में उन्मुक्त होकर नाचने के इस हुनर के सामने सब कुछ गौण हो गया है। इन वृहन्नाओं को पहचानें और याद करें पुराने जमाने में होने वाले मुजरों को, जिनका असली मकसद मनोरंजन के सिवा कुछ नहीं हुआ करता था। मनोरंजन के नाम पर अपने उल्लू सीधे करने की बातें परदें के पीछे ही ठीक लगती थी। अन्तर सिर्फ इतना हो चला है कि आजकल हर नाच-गान और अदाओं के अर्थ पहले से पता चल जाते हैं। फिर भी जमाने में अभी आदमी बचे हुए हैं जो सहेज कर रखे हुए हैं मानवी संस्कृति को।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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