साम्र्राज्यवाद की सदियों पुरानी अवधारणा सामंती विचारधारा से उपजी और पोषित है। ऋषि परंपरा के चंद निस्पृही लोगों को छोड़ दिया जाए तो दुनिया भर में हर आदमी अपना विस्तार चाहता है। जो योग्य है वह भी, और जो अयोग्य है वह भी। आदमी कभी अपने दायरे में खुश नहीं रह सकता, उसकी हर क्षण इच्छा रहती है कि जो दूसरे का है वह भी उसका अपना हो जाए। भले ही वह उसका उपयोग न कर पाए, लेकिन दिन-रात उसी उधेड़बुन में लगा रहता है और इसके लिए नित नए षड़यंत्रों, हथकण्डों और स्टंटों का ताना-बाना बुनता रहता है। ऐषणाओं का पर्याय हो चुका आदमी इसी प्रकार मकड़ी हो जाता है और फिर अपने ही बिछाए जाल को समृद्धि तथा साम्राज्य विस्तार का सेतु मानकर परिभ्रमण करता रहता है। विराट संसार को जानने के लिए धरा पर भेजा गया आदमी छोटे से कोने में सिमट कर निरन्तर होने वाली दौड़भाग को ही संसार समझ बैठता है। आजकल अधिकांश लोगों की स्थिति इससे कुछ और ज्यादा नहीं है।
हर गली में मामूली संपदा और जमींदारी पा लेने वाले लोग शेर बन बैठे हैं। इन दिनों हर क्षेत्र में मोहल्ले-मोहल्ले, कॉलानियों, गाँवों, शहरों और महानगरों की गलियों में ऐसे असंख्य शेर अपनी सत्ता का करिश्मा दिखा रहे हैं। यह दिगर बात है कि इनका पूरा तथाकथित विराटकाय व्यक्तित्व परिधियों में सिमट कर रह गया है। इन परिधियों से बाहर इन शेरों को कुत्तों, गधों और उल्लूओं जितना सम्मान भी नहीं मिल पाता। अपने-अपने कूओं में टर्र-टर्र कर रहे इन मेढ़कों के डेरों में दिन-रात अनुचर बनने और बनाने की फैक्ट्रियाँ धड़ल्ले से चल रही हैं। कई मूरख और बुद्धिहीन लोग बिना कुछ सोचे-समझे अनुचर बनते जा रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। भेड़ों की रेवड़ को देख वे भी अपने पूर्व जन्म का स्मरण कर अनुचर परंपरा को गौरवान्वित करते जा रहे हैं। असंख्यों धर्मपथ, राजपथ और जनपथ हैं जहाँ हर तरफ अनुचरों की संख्या विस्फोटक आँकड़े पार करती जा रही है। दूसरी किस्म में बुद्धि के नाम पर कमा खाने और जीने वाले अनुचर हैं जो जहाँ कुछ मिलता है, बिना कुछ खर्च किए प्राप्ति की आशा हो, वहाँ दौड़े चले जाते हैं और तब तक डेरा जमा रखते हैं जब तक कुछ मिल न जाए अथवा मिलते रहने की आस बनी रहे।
तीसरी किस्म उन अनुचरों की है जो एक-दूसरे को सुरक्षित और संरक्षित करने व रखने के साथ ही पारस्परिक लाभ की परम्पराओं को हमेशा जीवंत बनाए रखना चाहते हैं। चौथी किस्म ऐसे अनुचरों की है जो रूढ़ियों से घिरे हुए हैं और अपने संरक्षकों को बदलते रहने के आदी हो गए हैं। ये लोग न घर के होते हैं न घाट के। जिन्दगी भर कभी इधर तो कभी उधर भटकते ही रहते हैं। आजकल जमाना भीड़ तंत्र का है। जिसके पास ज्यादा भीड़ है वह किसी को भी भाड़ में झांेक सकता है। आदमी में अब पहले जैसे आदर्श, चरित्र और व्यवहार रहे नहीं, जिनका अनुकरण करते हुए लोग सहज ही अनुचर बन जाया करते थे और जिन्दगी भर साथ निभाते थे। आजकल आदमी खोखला हो गया है और उसे अपनी शक्ति के नाम पर चाहिए भीड़। भीड़तंत्र के भरोसे ही इनकी भैंसों के दूध का इंतजाम होता है। यही कारण है कि आजकल हर तरफ अपने अनुचरों की भीड़ जमा करने का शगल परवान पर है। यों भी भीड़ जमा कर लेना आजकल बहुत बड़ी बात नहीं है, भीड़ को अपनी बनाए रखना बड़ी चुनौती हो गई है और परिवेश में सारे जतन इसीलिए हो रहे हैं ताकि भीड़ उनकी सगी बनी रहकर जय-जयकार करती रहे, भले झूठमूठ ही सही।
संसार में रहने वाले गृहस्थियों, धन्ना सेठों, सत्ता की घांणी चलाने वालों से लेकर संसार को छोड़ बैठे वैरागियों का कद भी आजकल भीड़ के आधार पर नापा जाने लगा है। अनुचरों की जितनी ज्यादा भीड़, उतनी ज्यादा इनकी जिन्दगानी और शोहरत। अनुचर बनाने वाले भी खूब हैं और अनुचर बनने वाले भी। दोनों में किसी की कोई कमी नहीं है। पहले आदमी खुद कुछ बनकर दिखाता था और गर्व करता था। आजकल आदमी खुद खाली पीपा बनकर रह गया है और दूसरों के वजूद पर नाचने लगा है। आदमी को अब परायी ताकत के बूते तौला जाने लगा है। अपने-अपने आकाओं के पीछे श्वानों की तरह दुम हिलाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। जमाने की उलटी रीत के आगे श्रेष्ठ गृहस्थी लोग बाबे होते जा रहे हैं और संसार को छोड़ बैठे बाबे गृहस्थियों की तर्ज पर अनाप-शनाप संपदा और जमीन-जायदाद के स्वामी होते जा रहे हैं। हर कोई आदमीयत छोड़ कर धन-दौलत के पीछे भागने लगा है और इसकी चकाचौंध के मारे अनुचरों की परंपरा निरन्तर प्रसार पाती जा रही है। बिना कुछ मेहनत-मजूरी किए, बिना पुरुषार्थ के सब कुछ पा लिए जाने का नशा आदमी पर इतना चढ़ा हुआ है कि उसे न अच्छा दिखता है, न बुरा। उसके लिए कोई वर्जनाएं नहीं हैं यदि उसके हित सध रहे हों। उसे हमेशा लगता है कि उसका तो उसका है ही, पराया भी उसका है या उसका होना चाहिए।
इस स्वार्थ के वशीभूत होकर ही लोग अनुचर बनाने और बनने में जिन्दगी भर जुटे रहते हैं। अनुचर बनने और बनाने वाले अपनी कही कई बातों पर अमल करें या न करें, पर परस्पर परिक्रमा और जयगान के दौर निरन्तर जारी रहते हैं। जो अनुचर बनता है अथवा जो अनुचर बनाने का प्रयास करता है, इन दोनों किस्मों के बारे में तय मानना चाहिए कि ये परस्पर किसी न किसी स्वार्थ की बुनियाद से जुड़े हुए हैं तथा दोनों ही किस्में आदमियों की वह प्रजाति है जो पुरुषार्थहीनता और पराये माल को अपना बनाने की विधाओं का इस्तेमाल करने वाली है। अनुचर बनने और बनाने वालों को पूरी तरह आदमी नहीं माना जा सकता है और न ही ऐसे लोगों की पारलौकिक यात्रा सफलता पा सकती है। अनुचर परंपरा का निर्वहन ही इस बात को इंगित करता है कि कोई उनका इस्तेमाल कर रहा है और जो लोग अनुचरों के रूप में मोहांध या स्वार्थान्ध हैं उनका बौद्धिक स्तर निरन्तर नीचे जा रहा है। अनुचर वही बनता है जिसमें अपना कहने को कुछ नहीं होता। चाहे बात बौद्धिक धरातल की हो, पूर्वजों की साख की हो अथवा इंसानियत की। अनुचर बनने का मतलब उस परमसत्ता ईश्वर का अपमान जिसने मनुष्य को पूर्णता पाने के लिए भेजा है और आदमी है कि आदमी होने की बजाय भेड़ों की रेवड़ में शामिल हो गया है।
गीता के उपदेश याद रखें और सुप्रीम पॉवर का स्मरण करें, उसी के निर्देशों के अनुसार चलें अन्यथा हम न मनुष्य रह पाएंगे न अगले जन्मों में मनुष्य योनि पाने के काबिल। आज जो लोग आदमियों की पूजा में लगे हैं उन सभी का यह जन्म तो बिगड़ ही गया है और आने वाले जन्म में भी उनको आदमी होने की आशा छोड़ देनी चाहिए।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें