अपने समकक्ष स्थापित करें !!
दुनिया भर का सबसे बड़ा और व्यापक संकट यह है कि कोई भी किसी दूसरे को अपने समकक्ष या समान रखना और बनाना नहीं चाहता है बल्कि हर कोई चाहता है कि जो लोग उनके सम्पर्क में आएं वे सारे के सारे शिष्य या अनुचर बन जाएं ताकि वे औरों पर अधिकार जमाने और हुूकूमत जताने के अपने अरमानों को पूरा कर सकें। बात समाज की हो या किसी भी क्षेत्र की, हर कोई दूसरों को अपने से नीचे देखना और रखना चाहता है और इसी में खुश हो जाता है। यह खुशफहमी ही ऎसी है कि बड़े से बड़े लोग औरों को अपना बनाने और उन पर अधिकार जमाने के फेर में खुद अधिकारहीन हो गए। मगर इससे कोई कहीं सीख नहीं लेता। इन दिनों बाबाओं, महंतों, योगियों, गुरुओं, उस्तादों का जमाना है। चाहे शिक्षा, धर्म-संस्कृति, साहित्य, समाजसेवा, राजनीति का क्षेत्र हो या फिर गुण्डागर्दी, अपराधों और लूट-खसोट या जेबकतरी।
सबके अपने-अपने गुरु और उस्ताद होते हैं। इन गुरुओं और उस्तादों के हुआ करते हैं अपने शिष्य, शागिर्द और जमूरे। सांसारिकों से लेकर संसार छोड़ चुके बाबाओं तक सभी को एक ही भूत सवार है - ज्यादा से ज्यादा शिष्य और अनुचर बनाने का। इन शिष्यों और अनुचरों के ही बूते इन सभी का होता है शक्ति परीक्षण। जिसके ज्यादा अनुचर हो वह उसके अपने फील्ड का सिकंदर माना जाता है। यही कारण है कि सभी लोेगों को हमेशा तलाश बनी रहती है अपने अनुचरों की। इनकी पूरी जिन्दगी अनुचरों की संख्या बढ़ाने के लिए ही लगी रहती है। फिर जो अनुचर बन जाता है वह अपनी सारी बुद्धि और विवेक भी अपने उस्ताद के चरणों में गिरवी रख देता है। शिष्य और अनुचर बनाने का सबसे बड़ा फायदा इन लोगों को यही होता है कि उनके नीचे जितनी संख्या में अनुचर बढ़ते जाएंगे, उतना ही वे ऊपर होते जाएंगे और फिर किसी से प्रतिस्पर्धा का कोई खतरा भी नहीं। दूसरी बात यह है कि जितनी ज्यादा संख्या में जिसके शिष्य होते हैं, उन शिष्यों की भीड़ को देखकर दूसरे लोग भी शिष्य बनने लगते हैं। भेड़चाल का यही सबसे बड़ा फायदा होता है कि आदमी बिना कुछ सोचे समझे औरों का अनुकरण करते हुए छोटी भीड़ या गलियारों से बाहर निकल कर बड़ी भीड़ में शामिल हो जाता है। यों भी आजकल गुरुओं का कद उनकी विद्वत्ता और साधना में सफलताओं से नहीं बल्कि शिष्यों की संख्या से नापा जाने लगा है। फिर इन शिष्यों में बड़े और प्रभावशाली लोग हों या समृद्ध श्रेष्ठीजन हों तो फिर उन गुरुजी का प्रभाव बहुगुणित दिखने लगता है।
यही स्थिति समाज के सभी क्षेत्रों की है जिनमें शिष्य और अनुचर बनाने की अविराम परंपरा जारी है। इसी परंपरा की वजह से प्रतिभाओं की संख्या में ह्रास होता जा रहा है और फोलोवर्स बढ़ते जा रहे हैं। अनुचर और शिष्यों की संख्या में बढ़ोतरी का ख़ामियाजा समाज को भुगतना पड़ रहा है और बहुत सारे लोग भरपूर क्षमताओं और सामथ्र्य के होते हुए भी सिर्फ अनुचर बन कर जीवन बर्बाद कर रहे हैं। होना यह चाहिए कि ईश्वर ने जो क्षमताएं और प्रतिभाएं हमें दी हैं उनका भरपूर उपयोग करते हुए अपनी ही तरह के व्यक्तियों को तैयार करें और उन्हें अपनी बराबरी पर लाकर समाज की सेवा के लिए सौंपें ताकि समाज और क्षेत्र में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं रहे और जो लोग हमारे साथ हैं या संपर्क में हैं, वे सभी स्वाभिमान और समृद्धि के साथ जीवनयापन करते हुए समग्र जीवन को सुनहरा स्वरूप प्रदान कर सकें। लेकिन यह स्थिति लाने के लिए हमें अपनी पुरातन सोच और परंपरागत कुटिलताओं तथा असुरक्षा के भय को त्यागना होगा तथा समाज की सेवा के लिए उदारतापूर्वक आगे आना होगा। हालांकि एक सामान्य मनुष्य के लिए ऎसा कर पाना न सहज है, न सरल, लेकिन असंभव बिल्कुल नहीं। अपनी जीवनीदृष्टि को थोड़ा सा कुरेदें और संकीर्णता को छोड़कर उदारता को अपनाएं, ऎसा हो जाने पर हमारी दृष्टि बदल जाएगी और तभी से शुरू हो जाएगा सृष्टि का बदलना।
जो अपने सम्पर्क में आए उसे शिष्य या शागिर्द कहने या बनाने की बजाय समकक्ष बनाने का प्रयत्न करें। यदि इसमें हम सफल हो गए तो दुनिया और समाज पर हमारा बड़ा उपकार होगा। यह भी समझ में आ जाना चाहिए शिष्य विस्तार की परंपरा को छोड़कर हम यदि नए रास्ते को अपना लें तो फिर अपनी वर्तमान लोकप्रियता पूर्वापेक्षा बहुगुणी महसूस होगी और उसका अपना अलग ही आनंद होगा। जो लोग शिष्य और शागिर्द तलाशते हैं उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा स्वार्थी माना जाना चाहिए क्योंकि ये लोग जो कर रहे हैं और करते रहे हैं वह सब न तो समाज के लिए है, न राष्ट्र के लिए, बल्कि ये अपना कद ऊँचा रखने, खुद को पूजवाने और लोकप्रियता पाने के लिए जाने किन-किन हथकण्डों का सहारा लेने लगे हैं। दूसरी ओर जो लोग समाज को बनाना और समृद्ध देखना चाहते हैं वे अत्यन्त उदार प्रवृत्ति के होते हैं तथा उनकी प्रत्येक गतिविधि समाजोन्मुखी व कल्याणकारी होती है। यह हमारे हाथ में है कि हम अपने स्वार्थों और उच्चाकांक्षाओं से घिरे रहें या समाज की सेवा के भाव से काम करें और ऎसा काम कर जाएं कि जब हम संसार से विदा लें तब कोई यह कहने वाला नहीं मिले कि जिन्दगी भर खुद के लिए जीये और समाज को कुछ न दे गए, अच्छा हुआ चलो पृथ्वी से एक का भार कम हुआ। इसलिए गंभीरता से सोचें और खुद तय करेें कि आपके दिमाग और हृदय की खिड़कियाँ अन्दर की ओर खुलने वाली रहें या बाहर की ओर।
---डॉ. दीपक आचार्य---
941336077
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