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| हृषिकेश सुलभ |
आज ...अभी थोड़ी देर पहले मेरे अभिन्न मित्र और वरीय पत्रकार श्रीकांत का फोन आया....वे कलीदास रंगालय में हुई 8 नवम्बर की घटना के बारे में जानना चाह रहे थे। उनसे हुई सारी बातें शायद यहां उपयोगी न हों....पर इतना सच है कि यह पोस्ट उस फोन के बाद ही लिखा जा रहा है। .....एक घटना याद आ रही है....युवा पत्रकारों के लिए शायद उपयोगी हो......
पटना हिन्दुस्तान ने राजेन्द्र यादव को अतिथि के रूप में बुलाया था.....उनसे मिलने के लिए नगर के तमाम लेखकों को आमंत्रित किया गया। राजेन्द्रजी से बातें चल रही थी कि हिन्दुस्तान पटना के मैनेजमेंट पक्ष के सबसे वरीय व्यक्ति उपस्थित हुए....उन्होंने लेखकों को लगभग लताड़ने के अंदाज में उपदेश देना आरम्भ किया.....सारे लेखक हत्प्रभ...मौन....पत्रकार अपने मैनेजमेंट के खौफ़ से लगभग आतंक में और मौन.....अंतत: मैंने बीच में उनको बोलने से रोका....और कहा कि आप अपने अखबार में नंगी तस्वीरें छापें...अपराधियों का महिमामंडन करें और व्यवसाय के नाम पर सत्ता की दलाली करें और लेखकों कवियों की निन्दा करें कि वे जनता को संस्कारवान नहीं बना रहे हैं....। यह उचित नहीं...इसके बाद सभा स्थगित हुई....सबने सुकून की सांस ली।....सबसे ज्यादा सुकून पत्रकारों को मिला....हिन्दुस्तान दैनिक के सारे पत्रकार इस सभा के साक्षी रहे हैं।.....युवा प्रेस फोटोग्राफर मित्रो,.....आपसे सच बोलने की उम्मीद थी मुझे...पर आपने कई झूठ बोले....पर यह भी सम्भव है .....क्योंकि आत्मरक्षा में मनुष्य अक्सर ऐसा करता है। .......आप जिन स्थितियों में अपने संस्थानों में काम कर रहे हैं, वह गुलामी से भी बदतर है....
मैं यह जानता हूं और इस पीड़ा के मर्म को महसूस करता हूं। ऐसी जीवन स्थितियां एक ओर कायरता को जन्म देती हैं तो दूसरी ओर झूठे अहं को...दंभ को। एक लेखक अखबार का मुखापेक्षी नहीं होता.....और इन दिनों तो वैसे भी अखबार में लेखकों.कवियों और कलाकारों के लिए जगह नहीं बची है। आज मेरे कई मित्र अखबारों में ऊंची कुर्सियों पर बिराज रहे हैं...उनका दर्द साझा करता रहता हूं....कई अनुजवत हैं....मैं पत्रकारिता के सच से परिचित हूं साथियों।......आपने जो धमकियां भिजवायी हैं उनको सुनकर हंस भी नहीं पा रहा क्योंकि मुझे आपके भीतर के उस मनुष्य की चिन्ता है, जिसे आज की पत्रकारिता ने कमजोर किया है। आपके ही कांधों पर चढ़कर जाना है और आपके कांधे इतने कमजोर हों तो भला रोने के सिवा...उदास होने के सिवा और क्या हो सकता है। ........;
बेहतर हो मुझ पर कीचड़ उछालने के बदले आप अपने को ताकतवर बनाएं और जीवन के इस संघर्ष में अपने भीतर के अच्छे मनुष्य को जीवित रखें। उस दिन की घटना ने मुझे भी आहत किया है। नाटक देखना भी एक कला है। फोटो उतारना भी। राजनेताओं की सभा और नाटक के मंचन का फर्क समझना होगा हमें। काश उस दिन यह सब नहीं हुआ होता। मैं अपने को भी निर्दोष नहीं मान सकता। मेरा आवेश चाहे जिस कारण से उपजा हो , उसे मैं उचित नहीं ठहरा सकता। यह मेरे लिए भी आत्मविश्लेषण का समय है। आपके लिए भी.....भाषा भी हिंसा करती है.....चाहे आप करें या मैं....यह उचित नहीं.......उम्मीद है हम सब जल्दी ही किसी नाटक के प्रदर्शन में मिलेंगे और मैं हौले से आपके कांधे पर मुस्कुराते हुए हाथ रखूंगा......आमीन......।
हृषिकेश सुलभ
साभार : अंतरजाल

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