तभी होगा दुःखों और तनावों का अंत !!!
आजकल हर आदमी किसी न किसी परिमाण में तनावग्रस्त और दुःखी है। दुःख और तनावों के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं लेकिन सबसे बड़ा जो कारण आदमी को तनावग्रस्त करता है वह है लोग क्या सोचेंगे, कहेंगे। आदमी स्वयं आत्मनिर्भर, बुद्धिमान, ईश्वर का अंश और वह सब कुछ है जिसकी वजह से उसे मनुष्य की योनि प्राप्त हुई है लेकिन स्व-सामर्थ्य, दिव्यताओं की विस्मृति और सांसारिक तथा मायावी क्षुद्र कामनाओं, छोटे-छोटे स्वार्थों, बेतुके प्रतिशोध और अहंकार के भिन्न-भिन्न स्वरूपों को अंगीकार करने वाला आदमी अब आत्महीनता के दौर में पहुंचता जा रहा है। भगवान उसे समंदर सा विस्तृत सुख देना चाहता है लेकिन वह संकीर्णताओं से आकंठ इतना घिरा हुआ है कि सिर्फ पोखर भर पाने के लिए पूरी ताकत झोंक देता है और ताजिन्दगी इसी में रमा रहता है। ऐसे में दशक पर दशक बीत जाते हैं, पर उनका वह ठीक-ठीक से अंदाज भी नहीं लगा पाता। न ही वह अपने शरीर और आत्मा के कल्याण पर कोई ध्यान दे पाता है। नियति यदि अकूत वैभव भी देना चाहे तब भी आदमी ने अपनी फ्रेम ही इतनी छोटी गढ़ ली है कि उसे इतने में ही संतोष करना पड़ता है। सच तो यह है कि आदमी को ईश्वर तथा अपने कर्म पर भरोसा ही नहीं रहा। इन स्थितियों में वह लगातार यही चाहता है कि चाहे जैसे भी हो सके, पूरी ताकत बटोरने में ही लगाए रखे ताकि उसका स्टेटस बना रहे। आदमी को सर्वाधिक चिंता अपने स्टेटस की है और यही वह सबसे बड़ी महामारी है कि आदमी भीतर से चाहे कितना खोखला हो, बाहर वालों की नज़रों में भरा-पूरा और समृद्ध दिखने भर के लिए कई ऐसे काम कर गुजरता है जो वह कभी नहीं करना चाहता है। इसी ऊहापोह में व न भीतर से मजबूत रह पाता है न बाहर वालों को अपने व्यक्तित्व का अपेक्षित सौन्दर्य दिखा पाता है।
आदमी भीतर से भी आधा-अधूरा हो जाता है और बाहर से भी। कई मर्तबा आदमी इतना अधिक खोखला हो जाता है कि हर तरफ से टूट जाता है और तब उसे भान होता है अपने आत्मतत्व का और बाहरी चकाचौंध के सच का। वसुधैव कुटुम्बकम् और सबै भूमि गोपाल की... जैसे वाक्यों का उद्घोष करने वाले पुरखों की इस धरा पर आजकल मैं और मेरा परिवार की अवधारणा खूब फल-फूल रही है। अधिकतर लोग दस-पन्द्रह मीटर की परिधि के भीतर कैद होकर रह गए हैं जहाँ इस परिधि में रहने वाले लोग ही उनके कुटुम्बी हैं और बाकी सारे पराये या अस्मरणीय। आदमी आजकल जहां जाता है, जहां रहता है वहां यह परिधि हमेशा उसके साथ रहती है। मन-मस्तिष्क से लेकर हृदय की गुहाओं तक आदमी में यह बोध जागते भी बना रहता है और सोते हुए भी। स्वप्न में भी आजकल आदमी अपनी जेब और अपने परिवार से ज्यादा कुछ चिंतन कर पाने की स्थिति में नहीं है। संयुक्त परिवारों का खात्मा हो रहा है और पारिवारिक विघटनवाद के खतरे पूरी ऊँचाइयों के साथ गगनचुम्बी आकार पाते जा रहे हैं। हर आदमी दो-चार जनों को ही पूरा संसार मानकर जिन्दगी गुजार देता है। बहुतेरे तो ऐसे हैं जिनके आने से लेकर जाने तक की कोई खबर नहीं रहती है। बरसाती नालों में बहने वाले पानी की तरह लोगों के आने और जाने का यह सिलसिला लगातार बना हुआ है। आदमी की ऐकान्तिक, स्वार्थी और आइसोलेट प्रकृति की वजह से उसका पूरा जीवन टापू की तरह होकर रह गया है जहाँ एक-दूसरे को कोई मतलब नहीं है एक दूसरे से। इस ऐकान्तिक भोगवादी प्रवृत्ति के चलते आदमी के भीतर इंसानियत का भाव मरता जा रहा है और उसका स्थान ले रही पैशाचिक वृत्तियाँ।
जरा कुछ समझदार हुए नहीं कि अलग रह जाने की मनोवृत्ति ने आज सामाजिक व्यवस्थाओं की जड़ों पर गहरा प्रहार किया है और यही कारण है कि आदमी अकेला रहकर भी खुश नहीं है और सामाजिकता उससे निरन्तर दूर भागती जा रही है। पहले जहां समाज या समुदाय की व्यवस्थाओं के भय के मारे आदमी अनुशासन में बंधा होता था और पूरा समाज उसके सुख-दुःख में साथ होता था इस वजह से सुख बहुगुणित हो जाते थे और इनका उल्लास सौ गुना प्रकट होता था। वहीं दुःखों, पीड़ाओं और समस्याओं के वक्त आत्मीय सहयोग एवं सहभागिता की वजह से बड़े से बड़ा दुःख कैसे सरक कर दूर हो जाता था इसका अहसास तक नहीं होता था तथा आदमी वज्रपात तक को सहन करने की सामर्थ्य पा लिया करता था। आज का उच्चाकांक्षाओं से ग्रस्त खोखला आदमी इतना अहंकारी हो गया है कि उसे दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार तक करने में मौत आती है। वह पूरी तरह अपने मैं तथा अपने दो-चार लोगों में दिन-रात रमा रहता है। वह उन्हीं दो-चार लोगों के लिए जीता है, उनके इशारों पर चलता-नाचता-भागता रहता है और पारिवारिक समृद्धि की खुशफहमी पालते हुए अन्ततः खाक हो जाता है। ऐकान्तिक मनोवृत्ति और अकेलेपन का आनंद पाने के आदी लोग दूसरों की अपेक्षा ज्यादा दुःखी, तनावग्रस्त और अवसाद भरे होते हैं। इन लोगों को भौतिक सम्पन्नता भले मिल जाए, आत्मीय प्यार, दिली सुकून और मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य से बहुधा वंचित रहना पड़ता है। दो-चार अपवाद भले निकल जाएं पर बहुतों के लिए यही उनके जीवन का सच हुआ करता है। समुदायोन्मुख संवेदनशीलता के अभाव, दुःखों के विकेन्द्रीकरण के अवसरों व साधनों की कमी तथा अपनी-अपनी चंद फीट की परिधियों में रहने की विवशता भरे क्षण इन लोगों के लिए बड़े आत्मघाती होते हैं क्योंकि तब उन्हें सोचने व समझने के लिए सिर्फ अपनी दीवारें और अपने ही विषय होते हैं जिनमें कभी भंवर की तरह, कभी मकड़ी के जाले की तरह ये लोग उलझते ही चले जाते हैं।
ऐसे लोगों के लिए छोटे-छोटे दुःख और समस्याएं भी असाध्य और भारी लगने लग जाती हैं और तब इन्हें अहसास होता है कि समुदाय या कुटुम्बजनों की मौजूदगी में ऐसी समस्याएं कभी सामने आ ही नहीं सकती, लेकिन इन लोगों के अहंकार का ग्राफ इतना अधिक ऊँचा होता है जो उन्हें धरातल पर आने का कोई अवसर देता ही नहीं है। मनुष्य जीवन सिर्फ उदरपूर्ति के लिए नहीं है बल्कि सेवा और सामाजिक सरोकारों की पूर्ति में समर्पित भागीदारी के लिए है। जिन लोगों के जीवन में ऐकान्तिकता की वजह से किसी भी प्रकार का वैषम्य, निराशा और अवसाद की स्थितियां हों या फिर मानसिक और शारीरिक समस्याएं। इन सभी प्रकार के लोगों को चाहिए कि वे अपने अहंकार और स्वार्थ छोड़ कर समुदाय की निष्काम सेवा का कोेई न कोई काम हाथ में लें और सामाजिकता को अपनाएं। इसी से उनके नकारात्मक भावों का विकेन्द्रीकरण होकर विगलन होगा तथा जीवन का असली आनंद प्राप्त होने लगेगा। कई बार सामाजिक सेवाव्रतियों का मन भी कुछ दुष्टबुद्धि नरपिशाचों की करतूतों की वजह से डाँवाडोल हो जाता है लेकिन हम सभी को यह सोचना चाहिए कि ऐसे आसुरी लोग हर युग की छाती पर मूंग दलते रहे हैं। हमारा मकसद समाज की निष्काम और सच्ची सेवा है और जहां सत्य होगा वहां असत्य धीरे-धीरे अंधेरों से निकल कर बाहर जाएगा ही। अपने उद्देश्य विराट रखें और ऐसे असामाजिक लोगों के प्रति बेपरवाह रहें क्योंकि इन्हें मनुष्य का शरीर भले ही प्राप्त हो गया है पर इनमें पशुता कूट-कूट भरी है। फिर जब पशु ही हैं तो उनके पास नोंच खाने, लूट-छीन खाने, काट खाने आदि के औजारों की कहां कोई कमी हो सकती है। बचना और सुधरना हमें ही है।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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