मूल निवास मामले पर सरकार के खिलाफ भरी हुंकार - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मूल निवास मामले पर सरकार के खिलाफ भरी हुंकार


मंगलवार को तमाम आंदोलनकारी संगठनों ने मूल निवास के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ हुंकार भरी है। इस निर्णय के विरोध में आंदोलनकारियों ने जिला स्तर और बाद में प्रदेश स्तर पर रैली निकालने की रणनीति बनायी है। मंगलवार को शहीद स्मारक के सभागार में तमाम आंदोलनकारी संगठनों की बैठक आहूत की गयी। इस दौरान अनिल नौटियाल ने कहा कि पहाड़ और मैदान में मूल निवास को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। लोगों में सरकार के इस निर्णय को लेकर स्थिति साफ नहीं हो पा रही है। उन्होंने कहा कि इन सबका फायदा बाहर से आये हुए लोग उठा रहे हैं, जबकि स्थानीय लोगों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। संदीप चमोली ने कहा कि मूल निवास के मुद्दे पर सभी आंदोलनकारी संगठनों को एक मंच पर आना होगा। सभी संगठनों का उद्देश्य एक ही है लेकिन व्यक्तिगत अहम आड़े आने के कारण सपफलता नहीं मिल पा रही है। यह पहाड़-मैदान की बात नहीं है बल्कि मूल निवास की बात है। बाहर से आ कर यहां पर बसने वाले अगर मूल निवासी होने की बात कहें तो यह गलत है। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारियों के मुद्दों को राजनीति की भेंट नहीं चढ़ने दिया जाना चाहिए। टीएस असवाल ने कहा कि आज प्रदेश और प्रदेशवासी जिस स्थिति में उसके लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।

राज्य में क्षेत्रीय पार्टियां हैं, आंदोलनकारी संगठन हैं लेकिन सब बंटे हुए हैं। संगठित न होने के कारण कोई रणनीति भी नहीं बन पा रही है। उन्होंने कहा कि रैली निकालने से पहले एक कोर ग्रुप का गठन कर रणनीति तैयार कर लेनी चाहिए। निर्मला बिष्ट ने कहा कि यहां का निवासी साबित करने के लिए हम 12 वर्षों से लड़ाई लड़ रहे हैं। राज्य सरकार और उच्च पदों पर पहाड़ के लोग ही बैठे हैं लेकिन ये सभी उत्तराखण्ड की भावनाओं को दरकिनार कर चुके हैं। राजधानी के सवाल पर भी सरकार अब तक कोई निर्णय नहीं दे सकी है। मूल निवासी पर नया निर्णय दे कर सरकार अब फिर से नयी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।

ओमी उनियाल ने कहा कि राज्य बनने बाद इसकी अवधारणा पर सवाल उठ रहे हैं। मूल निवास पर सरकार का विरोध न करना शहीदों का अपमान है। इस मुद्दे पर पहाड़-मैदान को बांटा जा रहा है। राज्य की लड़ाई इसलिए नहीं लड़ी गयी थी कि राजनैतिक दल इसको फुटबॉल बना कर रख दें। राज्य की राजधानी पर राजनीति करना भी उचित नहीं है। यदि इस तरह से आंदोलनकारियों की भावनाओं पर कुठाराघात किया जायेगा तो 1994 की तर्ज पर आंदोलन होने से कोई नहीं रोक सकेगा। बैठक में जगमोहन सिंह नेगी, रविन्द्र जुगरान, कमला पंत, राजीव कोठारी, सूफी खलीक अहमद, पूर्ण सिंह लिंगवाल, महेश डोबरियाल तथा प्रदीप कुकरेती 



(राजेन्द्र जोशी)

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