जब हो लोकमंगल की दृष्टि !!!
परिवेश में जो कुछ परिवर्तन हम लाना चाहते हैं उसके लिए यह जरूरी है कि हमारे मन में इसके लिए स्वस्थ और सकारात्मक बीजों का अंकुरण हो। जब चित्त की भावभूमि शुद्ध और परोपकारी दृष्टि से युक्त होती है तभी लोक मंगल की भावनाओं का सृजन बिंब पाने लगता है। चित्त में वैचारिक शुद्धता के साथ लक्ष्यों की पवित्रता भरी भावभूमि जितनी अधिक निर्मल, स्वच्छ और लोकमंगल की भावनाओं से भरी होती है उतना ही उसके भीतर दिव्यता का समावेश होता है। परिवर्तन की धार के लिए मन की निर्मलता से लेकर तन की शुचिता भी जरूरी है तभी अपने भीतर से आने वाले विचारों का सूक्ष्मता के साथ स्थूल स्वरूप प्राप्त होने का दौर आरंभ हो सकता है।
हमारे मन में वैचारिक और लक्ष्यगत शुद्धता का अभाव होने की स्थिति में हम अपने आस-पास या पारिवारिक बदलाव से लेकर परिवेशीय परिवर्तन तक में वो सफलता प्राप्त नहीं कर सकते हैं जो इच्छित हुआ करती है। बल्कि मन और कथनी-करनी में जरा सा भी फर्क आने की स्थिति में हमारे द्वारा जो भी कार्य संपादित होते हैं वे पूर्णता का आभास भले ही करा लें मगर इनमें न प्रभावोत्पादकता होती है, न वह गंध, जो कार्य की पूर्णता के बाद मस्ती और शाश्वत आनंद का अहसास करा सके। सिर्फ स्थूलता का अहसास मात्र किया जा सकता है, फिर ऎसे कर्मों के कालजयी होने की संभावनाएं भी धुंधली ही रह जाती हैं।
मन के निष्काम, निःस्पृह तथा शुचितापूर्ण संकल्पों के साथ ही जो आचरण होते हैं और जिस कर्मयोग को आकार दिया जाता है वही सफलता का अहसास कराता है और वास्तव में उन्हीं कर्मों को युगों तक याद किया जाता है। ये कर्म ही प्रेरक तथा अनुकरणीय भावों का संचरण करते हैं और कत्र्ता समूहों को श्रेय भी प्रदान करने का सामथ्र्य रखते हैंं। लोक मंगल की दिशा-दृष्टि जब परोपकार और संवेदनशीलता के रसों में पग कर निकलती है तब यह लोक कल्याण के सुनहरे रंगों और रसों का दरिया उमड़ा देती है फिर चाहे यह समाज-जीवन के किसी भी क्षेत्र से संबंधित उत्थान की बात हो या अपने क्षेत्र के लोगों के उत्थान या प्रोत्साहन की या फिर किसी महान सामाजिक और भौगोलिक या अन्य बदलाव की, इन सभी के लिए मन की तरंगों से लेकर कर्म की नींव तक सब कुछ पूर्ण मौलिक और शुद्ध होना जरूरी है और तभी मन की कल्पनाएं और लक्ष्य की प्राप्ति की डगर आसान हो जाती है और इससे जुड़े प्रत्येक कर्म में ईश्वरीय अनुकंपा प्राप्त होने के साथ ही सामने आने वाली बाधाओें का शमन स्वतः होता रहता है।
इसी प्रकार के लोकोन्मुखी एवं समाजोन्मुखी कर्म जीवन को सफल बनाने के साथ ही युगों तक अपने कर्मयोग का कीर्तिगान करते रहते हैं। यश और प्रतिष्ठा की प्राप्ति कर्म की सफलता पर निर्भर हुआ करती है। जो काम अच्छे होते हैं वे अपने आप लोक प्रतिष्ठा प्राप्त कर लिया करते हैं, उनके लिए प्रचार या किसी धूम-धड़ाके की जरूरत नहीं हुआ करती। इसके विपरीत जो कर्म सिर्फ पब्लिसिटी और लोकप्रियता पाने के उद्देश्य से किए जाते हैं उनका प्रभाव कुछ दिनों में ही समाप्त हो जाता है और उस प्रकार के प्रचार के बाद वह कार्य भी अपने आप क्षीण होता रहकर नष्ट होने लगता है और कुछ माहों और समय के बाद लोग इन कर्मों को पूरी तरह भुला बैठते हैं।
कर्म और यश का पारस्परिक संबंध तभी तक है जब तक कि कर्म के प्रति दिली लगाव और मौलिकता के साथ निष्काम भावना का पुट हो। पहले कर्म होने पर यश अपने आप प्राप्त होने लगता है जबकि पहले ही यश और प्रतिष्ठा का लक्ष्य लेकर काम शुरू किया जाता है तब वह कार्य निष्फल हो जाता है और उसका किसी तरह का कोई प्रभाव सामने नहीं आ पाता। क्षणिक प्रचार के बुलबुलों के बुदबुदाने के बाद यह यश फिर कहीं गायब हो जाता है और कत्र्ताओं के हाथ न कर्म का श्रेय लग पाता है, न कोई यश। कोई सा कर्म हाथ में लें, उस कर्म के प्रति निष्ठा और लगाव के साथ यह भी देखें कि वह अपनी रुचि का है भी या नहीं, विषयगत अरुचि और कर्म की विवशता किसी भी कार्य का प्रतिफल पहले ही आधा कर दिया करती है। इसके साथ ही कर्म के आरंभ से लेकर पूर्णता की प्राप्ति तक लोकमंगल की दृष्टि रखी जाए तो सृष्टि बदलने और नवनिर्माण के हमारे प्रयासों को सुनहरा आकार मिल सकता है। जो यश-प्रतिष्ठा भी देता है और कालजयी दुआएं भी।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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