छुट्टियों में काम-काज का शौेक !!!
आम आदमी के लिए जितना कर्मयोग का महत्त्व है उतना ही महत्त्व छुट्टियों का भी है। आदमी हो या कोई सी मशीन, सभी को अनवरत उपयोग में लाए जाने और लम्बे समय तक चलाने के लिए अवकाश की नितान्त आवश्यकता होती है। जो इस सिद्धान्त को समझता है और अपना लेता है वह जीवन में सुख-शांति का सच्चा अहसास कर लेता है। इसके विपरीत जो लोग कमाई और प्रतिष्ठा अथवा दूसरों की परिक्रमाओं का शौक पालते हुए निरन्तर दौड़-भाग करते रहते हैं उनका मन-मस्तिष्क एक समय के बाद अपने आप शिथिल हो जाता है और पूरा ही जिस्म तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त होकर रह जाता है। और तब कहीं जाकर हमें हमारी मूर्खता और संसार की नश्वरता का अहसास होता है लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है और वे लोग भी हमसे काफी दूर हो चुके हैं जिन्हें हम अपना सर्वस्व मानकर उनकी सेवा में कोल्हू के बैलों की तरह दौड़भाग करते रहने का इतिहास कायम कर चुके होते हैं।
यह निश्चित माना जाना चाहिए कि हर व्यक्ति को एक निश्चित समय के बाद कुछ समय के विराम और शून्यावस्था में रहने की जरूरत होती है। व्यक्ति एक तो रात को नींद के वक्त विश्रामावस्था में होता है जब उसका शरीर शयन काल में थकान दूर कर लेता है। यह शयन काल ही ऎसा होता है कि जब कोई भी प्राणी जिन पांच तत्वों से बना होता है उन पांच तत्वों का पुनर्भरण करने के लिए उनका सूक्ष्म शरीर महाकाश में पहुंच कर सभी पांचों तत्वों का वह हिस्सा फिर भर दिया करता है जो काम करते-करते या किन्हीं प्रकार के क्षरण की वजह से खाली हो जाया करता है। यह नींद हमारे तन-मन और मस्तिष्क को विश्राम देकर फिर ऊर्जित और उत्साहित करती रहती है। इसी प्रकार जागृत अवस्था में किए जाने वाले निरन्तर कर्मों व वैचारिक ग्रंथियों के लगातार मंथन की वैचारिक श्रृंखलाओं की वजह से बोझिल हो जाने वाले मन-मस्तिष्क के लिए कुछ-कुछ दिनों के अंतराल में शून्य कर्म तथा पूर्ण विश्राम के लिए कुछ घण्टों की जरूरत होती है। ऎसा होने पर ही मस्तिष्क की कोशिकाएं फिर से पूर्ववत होने लगती हैं, ताजगी पा लेती हैं और इनकी शक्ति बराकर काम करती रहती है। निद्रावस्था अथवा निर्धारित विश्राम के बगैर मन-मस्तिष्क और शरीर की कार्यक्षमता पर घातक असर पड़ता रहता है और आगे चलकर यह असाध्य बीमारी का रूप धारण कर लेता है जिसकी परिणति मृत्यु या पूर्ण शैथिल्य पर जाकर ही होती है। आज जमाना निरन्तर प्रतिस्पर्धा का है। हर कोई कम से कम समय में पूरी ताकत लगाकर दिन-रात एक करते हुए सब कुछ पा जाना चाहता है। बहुसंख्य लोगों के लिए शरीर और जीवन का कोई मूल्य नहीं है।
ऎसे लोगों के लिए अनाप-शनाप सम्पत्ति जमा करना, पराये भोग-विलास और ऎश्वर्य वाले संसाधनों का भरपूर उपयोग करना, निर्धारित समय के लिए मिली शक्तियों का अतिरेकपूर्ण उपयोग करते हुए प्रतिष्ठा और भोग के सभी संसाधनों का उपभोग करना, घर-गृहस्थी और समाज के सारे दायित्वों और कामों को गौण मानकर दफ्तरी या धंधे के कामों को सर्वोपरि मानना, मुद्रा और द्रव्य के लोभ को सामने रखकर हर क्षण को अपने हक़ में निचोड़ लेना तथा जीवन के सारे संतुलन को दरकिनार रखते हुए सिर्फ और सिर्फ धन-दौलत जमा करने का भूत सवार होना ही जीवन भर के सबसे प्राथमिक फर्ज और धर्म हो गए हैं। इनमें दो तरह के लोग शामिल हैं। एक शोषक हैं और दूसरे शोषित। कई ऎसे हैं जो दोनों ही भूमिकाओं में नज़र आते हैं। एक तीसरी किस्म बुद्धुओं की है जिनका मन घर-गृहस्थी और संसार में नहीं लगता है, न ही समाज की सेवा इन्हें रास आती है। ऎसे लोग बिना किसी काम काज के अपने रोजमर्रा के बाड़ों में दुबके रहने का लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं। कुछ उन लोगों में शामिल हैं जो कछुवा छाप की तरह धीरे-धीरे काम करने के आदी हैं और ऎसे लोगों के लिए आम दिनों की अवधि काफी कम पड़ जाती है जिसकी भरपाई वे छुट्टी के दिन आकर कर लेते हैं।
घर-परिवार और समाज में काम और अवकाश को लेकर निरन्तर बढ़ते जा रहे भयावह असंतुलन के बीच अब कई किस्मों के लोग हमारे सामने हैं जिनके लिए अवकाशों का कोई औचित्य ही नहीं रहा। ये लोग अवकाशों का पूरा उपभोग करने में न मानवाधिकारों को देखते हैं, न आम आदमी के लिए अवकाशों की उपयोगिता को। कोई अपने नंबर बढ़ाने के लिए अवकाशों की बलि ले रहा है तो कोई दूसरों के नंबर काटने और कटवाने के लिए छुट्टियों के दिनों का उपयोग कर रहा है। इस मामले में सभी प्रजातियों के मनुष्य आगे हैं। चाहे वे साठ साला बाड़ों के लोग हों अथवा पांच साला, या और किसी धंधेबाज किसम के। अवकाशों की अहमियत सभी के लिए है चाहे वे मजदूर हों या बड़े लोग। आदमियों की एक जात स्वेच्छा से अवकाशों की बलि देने को आमादा रहती है। इन लोगों को न घर-परिवार रास आता है न समाज या कोई रचनात्मक गतिविधियां। जब समय मिलता है वे अपने परंपरागत बाड़ों में घुस कर दुबक जाते हैं और फाईलों के बोझ के बीच खो जाते हैं अथवा कंप्यूटर स्क्रीन के सामने। दूसरी किस्म उन आदमियों की है जो चाहते हुए भी अवकाशों का उपभोग नहीं कर पाते। ऎसे लोग ऊपर वालों के शोषण के मारे विवश हुआ करते हैं। इन लोगों के लिए घर-परिवार का मांगलिक-अमांगलिक अवसर हो या कोई पर्व-त्योहार, मेला-ठेला या कुछ और सामाजिक कार्य हो, इन्हें चाहते हुए भी मौका नहीं मिल पाता और अवकाशों की बलि चढ़ती देखने के सिवा कोई चारा नहीं होता।
कुछ लोग खुद अवकाश भुगत नहीं पाने की खुन्नस में नीचे के लोगों के अवकाशों और आनंद की भेंट चढ़ा देते हैंं। बात सरकारी और गैर सरकारी सभी डेरों और मठों की है जहां अवकाशों के आनंद का कहीं कोई अर्थ बचा हुआ है और कहीं एकदम नहीं। अवकाशों और कर्म के बीच संतुलन के मनोविज्ञान से नावाकिफ लोग न सिर्फ अपने मन-मस्तिष्क और शरीर के शत्रु हैं बल्कि पूरी की पूरी सामाजिक व्यवस्था और आदमी के कर्म सामथ्र्य और उनकी दीर्घायु के लिए भी गंभीर और घातक होते हैं। बड़ों से लेकर छोटों तक सभी को इस संतुलन को बनाए रखने के लिए सोचना होगा तभी हम मानवीय श्रम की कीर्तिपताका लंबे समय तक फहरा पाने में समर्थ बने रह सकते हैं, अन्यथा मानवीय ऊर्जाओं और क्षमताओं के समय-समय पर पुनर्भरण के अवसरों को छीन लिए जाने और अवकाशों की बलि चढ़ाकर हम न अपना भला कर सकते हैं न समाज और राष्ट्र का। आज के इस महानतम सत्य को सभी को अंगीकार करते हुए आत्म अनुशासन और अवकाशों के स्वतंत्र उपभोग के अधिकार की रक्षा करनी होगी। यह मानवाधिकारों से जुड़ा विषय भी है जो आम आदमी के लिए उपयोगी है।
जो लोग अवकाशों के दिनों मेंं किसी भी प्रकार के रूटीन काम के आदी हो जाते हैं या अवकाश भुगतने की स्थिति में नहीं होते हैं उन लोगों की घर-गृहस्थी और मनोविज्ञान का चिंतन किया जाए तो साफ लगेगा कि ऎसे लोगों की जिन्दगी ही अभिशप्त हो जाती है। इनकी न किसी के प्रति आत्मीयता ही रह पाती है, न कोई संवेदनशीलता। जो औरों के अवकाशों का कत्ल करते हैं वे भी, और जो लोग शिकार होते हैं अथवा अवकाशों के दिनों में रोजमर्रा की तरह काम की आदत पाल लेते हैं वे भी अपनी जिन्दगी के आनंद और लक्ष्य से भटक जाते हैं, ऎसे सनकी लोगों की पूरी जिन्दगी अभिशप्त हो जाती है। इसका खामियाजा घर-परिवार के लोगों और समाज-समुदाय तथा क्षेत्र को भी भुगतना पड़ता है। अवकाशों का पूरा उपभोग करें और करने दें तथा लोक जीवन में मस्ती लाएं।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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