अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति (आईसीआरसी) ने अपने 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं, लेकिन भारत में इसका पहला मिशन 1917 में शुरू हुआ था और इसने 1982 में यहां औपचारिक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। जम्मू एवं कश्मीर में गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए लोगों तक पहुंचने के लिए भारत सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के लिए आईसीआरसी को जून 1995 तक इंतजार करना पड़ा था। आईसीआरसी ने हालांकि, 12 फरवरी 1917 को भारत में अपना पहला मिशन शुरू किया था और प्रथम विश्वयुद्ध में बिछड़े लोगों के बीच सम्पर्क स्थापित कराने में अपनी भूमिका निभाई थी।
जनवरी 1917 में आसीआरसी के प्रतिनिधिमंडल को काहिरा में जेनेवा स्थित मुख्यालय से भारत और म्यांमार में युद्धबंदियों के शिविरों और सामान्य बंदियों का निरीक्षण करने का संदेश प्राप्त हुआ था। आसीआरसी के मुताबिक प्रतिनिधिमंडलइसके अगले महीने स्वेज नहर के रास्ते बम्बई (अब मुम्बई) पहुंचा था। इस आगमन के साथ ही भारत में आईसीआरसी का सफर शुरू हो गया।
नई दिल्ली में आईसीआरसी की मौजूदा प्रमुख मेरी वन्र्ट्ज ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल की यात्रा का उद्देश्य इस बात का पता करना था कि कहीं बंदियों के साथ मर्यादित व्यवहार किया जा रही है या नहीं। आईसीआरसी के यहां सम्पर्क समन्वयक मारेक रेसिश ने कहा, "भारत में आईसीआरसी के शुरू किए गए पहले मिशन के 95 साल से ज्यादा समय से हम विभिन्न राजनीतिक माहौल में अपनी सेवाएं देते रहे हैं।"
आईसीआरसी अब जम्मू एवं कश्मीर के बंदियों के लिए अभियान चला रही है तथा यह इंडियन रेड क्रास सोसायटी की भी सहायता कर रही है। फरवरी 1863 में स्विटजरलैंड के जेनेवा में गठित आईसीआरसी को 1949 के जेनेवा सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली थी। इसके प्रतिनिधि 60 से ज्यादा देशों में हैं और 80 से ज्यादा देशों में यह अभियान चला रही है।
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