यू.पी.ए. सरकार के कार्यकाल मे बेहिसाब भृष्टाचार घोटालों के कारनामों की फेहरिश्त लम्बी ही होती जा रही है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार मे रूपये का अवमूल्यन चिन्ताजनक है, कमर तोड़ महगाई से आम आदमी मे जीवन जीने की इच्छा क्षींण हो रही है। बिपक्षी दल का नेता भृष्टाचार का मुद्दा सत्ता पक्ष के किसी मन्त्री के संदर्भ मे उठाता भी है तो टी.वी. न्यूज चेनलों पर इस चर्चा मे काॅग्रेस का कोई नुमाइन्दा यह जबाव देता है कि भाजपा को भृष्टाचार के मुुद्दे पर बात करने का कोई नैतिक अधिकार नही है क्यों कि इनके नेताओं पर भी भृष्टाचार के आरोप हैं। सच तो यह है कि मंहगाई और भृष्टाचार के विषय पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों के सत्ताधारी दल मे कोई सुनने को तैयार नही है।
हालात ऐसे ही रहे तो देश मे एक बहुत बड़ी क्रान्ति की आशंका से बिमुख नही हुआ जा सकता। जनता मे सरकार के प्रति क्षींण हो रही विश्वसनीयता के कारण आगामी लोक-सभा चुनाव का बेसब्री से इन्तजार है और ऐसा पूर्व मे कभी भी किसी भी दल की सरकार के कार्यकाल मे नही हुआ। चुनाव चाहे लोकसभा के हों या राज्यों की विधान सभाओं के, आम मतदाता अपना मतदान विश्वास की इस कसोटी पर करता है कि उसका वोट कहीं बर्वाद तो नही होने वाला है। चुनाव मे पराजित करने वाले उम्मीदवार को ही जिताया जाता है और इस हेतु दल एवं उसके उम्मीदवार की संगठनात्मक एकता, क्षमता और सरकार बनाने की जनता मे विश्वसनीयता ही इसकी कसोटी है। काॅग्रेस और भाजपा के विषय मे विश्वास की इसी कमी के कारण उत्तर प्रदेश के गत विधान सभा चुनाव मे बहुजन के बाद समाजवादी का सत्ता मे प्रकटीकरण हुआ। वहां काॅग्रेस और भाजपा प्रारम्भ से अन्त तक ऊहापोह की स्थिति मे रहे। चुनाव आने पर ही ये औपचारिक रूप मे सक्रिय हुये थे तथा प्रदेश की जनता के समक्ष तत्समय ये सशक्त विकल्प होना प्रमाणित नही कर पाये थे। परिणामतः गत 20 वर्षों से अकेले सरकार बनाने की स्थिति मे नही हो पा रहे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव के सन्दर्भ मे देश के समक्ष यह प्रश्न है कि क्या भाजपा अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति मे है ? प्रश्न यह भी है कि क्या आज यू.पी.ए. का विकल्प एन.डी.ए. है ?
सत्ताधारी दल की जितनी जिम्मेदारी एक स्वस्थ प्रशासन देने की है तो उतनी ही जिम्मेदारी मुख्य विपक्षी दल की भी है कि वह अपनी भूमिका का निर्वाह करे और देश के समक्ष यह प्रमाणित करें कि वह एक मजबूत एवं संगठित विकल्प है। सामान्यतया देखा यह जा रहा है कि केन्द्र और राज्यों की सरकार के बिरूद्ध उनके विपक्षी दल एन्टी-इन्कम्बेन्सी वोट पर अपनी नजर जमाये रहते है। अर्थात जनता सत्ताधारी दल से इतनी पीडि़त हो जाये कि मजबूर होकर विपक्ष को अपना वोट दे। लेकिन यह स्वस्थ राजनीति नही हैं। जनता को तो कहीं न कहीं वोट देना ही है। गत समय फरबरी के प्रथम हफ्ते मे दिल्ली के श्रीराम काॅलेज आॅफ काॅमर्स मे नरेन्द्र मोदी ने अपना प्रभावी भाषण दे कर विकास की राजनीति की दिशा दी है। यह एक अच्छा संकेत है। निराशा तो तब होती है जब एन.डी.ए. के आपसी अंतर्कलह की खबरें बाहर आतीं हैं। देश के चुनावी पटल पर वैकल्पिक नेतृत्व के स्थान पर अंदरूनी कलह का प्रदर्शन होना एक मजबूत विपक्ष की भूमिका का निर्वाह नही कहा जा सकता है।
देश के चुनावी पटल पर वैकल्पिक नेतृत्व के स्थान पर अंदरूनी कलह का प्रदर्शन होना एक मजबूत विपक्ष की भूमिका का निर्वाह होना नही कहा जा सकता है। नरेन्द्र मोदी एवं संजय जोशी विवाद, लालकृष्ण आडवंाणी का सूरजकुण्ड अधिवेशन के समय विवादास्पद ब्यान, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सरकार के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाह को भाजपा मे प्रवेश और इस पर शीर्षस्थ नेताओं के मतभेद व फिर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने का प्रसंग, उद्योगपति अंशुमान मिश्र को राज्यसभा का टिकट देने का निर्णय और उसके परिणामस्वरूप यशवंत सिन्हा, आडवांणी एवं सुषमा स्वराज द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त किया जाना तथा बाद मे उनके टिकट को निरस्त करने का वाक्या, क्या ये सब भा.ज.पा. के अन्दर अनिश्चितता की स्थिति को प्रकट नही करते हैं ? गत अक्टूबर 2012 मे नितिन गडकरी पर महाराष्ट्र मे उनके व्यवसायिक लाभ को राजनीति से जोड़कर उछाला गया और समय ज्यादा बीता ही नही था कि उन्होने भोपाल की एक सभा मे श्री विवेकानन्द एवं माफिया सरदार दाऊद का आई. क्यू. एक समान स्तर पर मानते हुये विवादास्पद ब्यान दे दिया। इसी ऐपिसोड के समय राष्ट्रीय-स्वयं-संध के प्रमुख एम.जी. वैद्य ने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुये वक्तव्य दिया था कि गड़करी के बिरूद्ध जो मुहिम चल रही है उसकी जड़े गुजरात मे हैं और इस वक्तव्य पर संघ के ही प्रवक्ता राम माधव ने श्री वैद्य के वक्तव्य से पल्ला झाड़ते हुये कहा था कि यह उनकी निजी राह है।
गड़करी के स्थान पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह निर्वाचित हुये। राजनीतिक, सामाजिक, संगठनात्मक, यू.पी. के पूर्व मुख्यमन्त्री रूप मे प्रशासनिक अनुभव को देखते हुये राजनाथ सिंह जी का कद और ग्राफ तुलनात्मक दृष्टि से काफी ऊंचा है। विषय को यह कहते हुये नही नकारा जा सकता कि भाजपा एक लोकताऩ्ित्रक पार्टी है और आपसी मतभेद आपस मे ही सुलझा लिये जाते हैं। निश्चित ही यह मान लेते हैं कि भाजपा एक प्रजातान्त्रिक दल है और किसी व्यक्ति या परिवार-विशेष का वर्चस्व इसमे नही है तथा लोकतन्त्र मे आपसी मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन प्रश्न तो यह है कि चुनावी युद्ध सामने है, संगठन की एकता और सरकार बनाने की क्षमता देश की मांग है, फिर संगठनात्मक अनुशासन कहां रहा ? यह एक अत्यन्त गम्भीर विषय है और इस पर गौर नही किया गया तो आने वाला लोक-सभा चुनाव सरकार बनाने के बिन्दु पर अनिश्चितता के दौर से गुजरेगा, परिणामतः खिचड़ी सरकार बनेगी या थर्ड फं्रन्ट उभरेगा और देश की जनता कभी भी एन.डी.ए. और भाजपा को माफ नही करेंगी। भाजपा को अटल जी जैसे व्यक्तित्व का एक चेहरा, जिसे देख कर वोटों को समेट लिया जाय, सामने लाना होगा। बिभिन्न टी.वी. चेनलों के द्वारा अगामी लोकसभा चुनावों के सन्दर्भ मे कराये गये सर्वे के अनुसार नरेन्द्र मोदी को देश के सर्वाधिक लोकप्रिय भावी प्रधानमन्त्री के रूप मे देखा जा रहा है। विकासवादी व्यक्तित्व और सकारात्मक सोच का यह परिणाम है कि वह भारत के युवाओं की पहली पसन्द बन गये हैं। नरेन्द्र मोदी यदि स्वयं को देश के आगामी चुनाव मे प्रधानमंत्री के रूप मे उजागर करना चाहते हैं तो निश्चित ही उन्हे सहज, सरल और ठण्डा होना होगा, अटल जी की तरह सब को साथ लेकर चलने की नीति बनाना होगी। अपनी ही पार्टी और एन.डी.ए. मे चुनावी शतरंज की शह और मात की आदत समाप्त करना होगी।
नरेन्द्र मोदी ने विकास और भयहीन प्रशासन की स्थापना गुुजरात मे की है और उसी कारण उनका एक लम्बा सफलतम् मुख्यमन्त्रित्व-काल सामने है। भाजपा भयहीन हो कर नरेन्द्र मोदी को यदि प्रधानमन्त्री के लिये प्रोजेक्ट करती है तो आंकड़े यह बताते हैं कि इससे उसे लाभ ही होगा और अपने बलबूते पर अधिकतम सीटें प्राप्त कर सकती है। धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता जैसे प्रभावहीन शव्दों का सुनते-सुनते देश की जनता को खीज होने लगी है। भृष्टाचार की लम्बी होती सूची के कारण यू.पी.ए. सरकार की विश्वसनीयता जनता मे क्षींण हो रही हैं। यह सन्देह होने लगा है कि लोकधन का सदुपयोग हो रहा है या भृष्टाचार मे खप रहा है। राजनैतिक दलों को गौर करना होगा कि अब देश की जनता को गुड-गवर्नेन्स और प्रशासन मे पारदर्शिता चाहिये। एक टी.वी. चेनल पर हो रही चर्चा के समय अपनी खीज व्यक्त करते हुये एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा था कि यदि आगामी लोकसभा चुनाव मे काॅंग्रेेस सŸाा मे आती है तो इसका श्रेय भाजपा को ही देना चाहिये। इस टिप्पणीं से यह सन्देश अवश्य मिलता है कि भाजपाईयो संगठित हो जाओ।
लेखक- राजेन्द्र तिवारी, अभिभाषक
जिला दतिया म.प्र.
फोन- 07522-238333, 9425116738
ई-मेल rajendra.rt.tiwari@gmail.com
लेखक का परिचय - लेखक एक वरिष्ठ अभिभाषक एवं सामाजिक, राजनीतिक व प्रशासनिक
विषयों के समालोचक हैं।
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