प्राणी जिन तत्वों से बना है उन तत्वों की कमी हो जाने की वजह से ही वह बीमार होता है। फिर चाहे वह पंच तत्वों की कमी हो अथवा उन तत्वों की जिन पर शरीर की संरचना और विकास टिका हुआ है। आजकल सभी प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों के व्यापक प्रचलन, निरन्तर अनुसंधानों से निकलने वाले निष्कर्षों और जानकारी से दुनिया भरी पड़ी है। जबकि भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की प्राचीनता और विशिष्टता से अनभिज्ञ होकर हम उन पद्धतियों के पीछे भाग रहे हैं जो विदेशियों की देन हैं।
चिकित्सा के मामले में हमारे अर्वाचीन वैद्यों ने जो शोध किए हैं वे आज भी हर कसौटी पर खरे उतर रहे हैं लेकिन हम आज भी विदेशियों के प्रभाव में आकर अपनी परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों को उपेक्षित करते जा रहे हैं। और इसी अनुपात में हमारी बीमारियां और समाज की सेहत भी बढ़ रही है। हालांकि इसके लिए व्यापक प्रबन्धों की कोई कमी नहीं है। लेकिन पहले जहां मामूली बीामारियों का ईलाज आदमी अपने घर में ही, आस-पास या जंगल में उपलब्ध जड़ी-बूटियों से कर लिया करता था वहीं अब उसे मामूली ईलाज तक के लिए डॉक्टरों और अस्पतालों के दर जाना पड़ रहा है।
उस जमाने में हर्बल चिकित्सा पद्धतियां विकसित थीं और इनका सबसे बड़ा फायदा यह कि किसी भी बीमारी के तात्कालिक उपचार की बजाय उसे जड़ से समाप्त कर दिया करती थीं और किसी भी प्रकार का पार्श्व दुष्प्रभाव भी नहीं होता था। आज हमारी स्थिति पराश्रित हो गई है जहां हम कुछ भी नहीं करना चाहते। छोटी सी गोली से बीमारी भगा देने के लिए हम विदेशी दवाइयों के भरोसे हैं। बावजूद इसके हम हमारी सेहत के लिए उन उपायों का इस्तेमाल नहीं करते जो प्रकृति ने उपहार के तौर पर हमें दी हैं और जिनका प्रयोग सदियों से होता आया है।
आज जरूरत इस बात की है कि हर इलाके में क्षेत्र विशेष की भौगोलिक स्थितियों और पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के उपाय किए जाएं कि वनौषधियों, जड़ी-बूटियों का व्यापक पैमाने पर अंकुरण, पल्लवन और उत्पादन हो ताकि स्थानीय लोगों को आजीविका के लिए उपलब्ध प्राचीन स्रोत फिर बहाल हो सकें। इसके साथ ही वनौषधियों से संबंधित ज्ञान के बारे में लोक शिक्षा भी जरूरी है जिससे कि इन वनौषधियों के संरक्षण एवं विस्तार में स्थानीय लोगों की आत्मीय भागीदारी भी बढ़ सके। आयुर्वेद के समग्र विकास और जन-जन तक विस्तार की धारणा तभी सार्थक हो सकती है जब वृहत् पैमाने पर स्थानीय स्तर पर वनौषधियों का संरक्षण एवं संवर्धन किया जाकर आम जनता के लिए किफायती दर पर जड़ी-बूटियां और वनौषधियां हासिल हों।
ख़ासकर ग्राम्यांचलों में वनौषधियों की पहचान और इनके संरक्षण की पुरातन परंपरा को प्रोत्साहित किए जाने की आज महती आवश्यकता है। निश्चय ही आयुर्वेद आम आदमी के लिए नितान्त लाभकारी है लेकिन इस बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार बेहद जरूरी है और तभी इसके शाश्वत परिणामों से जन समुदाय लाभान्वित हो सकता है। एक जमाना था जब आदमी के पास किसी भी प्रकार की आधुनिक चिकित्सा पद्धति नहीं थी और तब वह मात्र जड़ी-बूटियों के बल पर अपने रोगों को निवारण करने में सक्षम था और दीर्घायु प्राप्त करता था। दुर्भाग्य से विज्ञान की चकाचौंध और पाश्चात्यीकरण के दौर में आयुर्वेद का ह्रास होता चला गया।
बावजूद इन सबके आयुर्वेद की प्राच्य चिकित्सा पद्धति आज भी सबसे ज्यादा कारगर है और लोगों की इसके प्रति दिली श्रद्धा बरकरार है। पुरातन औषधीय महत्त्व के पादपों एवं जड़ी-बूटियों के संरक्षण और संवर्द्धन को लेकर सरकार की महत्त्वांकाक्षी योजनाएं भी हैं। इनके अन्तर्गत आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथिक आदि चिकित्सा पद्धतियों में प्रयुक्त होने वाले पुरातन जड़ी-बूटियों एवं औषधीय महत्त्व के पादपों की खेती करने वाले लोगों को केन्द्र सरकार वित्तीय सहयोग भी मिलता है।
इन योजनाओं के अन्तर्गत इसके लिए इच्छुक स्वयंसेवी संस्था, स्वायत्त शासन संस्थाओं, सरकारी धनराशि से पोषित संस्थानों, कृषि, वन, आयुर्वेद, चिकित्सा क्षेत्रों से सम्बद्ध विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों आदि को सहयोग प्रदान किया जाता है। इस कार्य के लिए श्रम, बीज, सामग्री और अन्य कार्यों के लिए लाखों रुपए की धनराशि प्रदान की जाती है। इसके अलावा विशिष्ट सामग्री की खरीद, प्रयोगशाला उपकरण, क्षेत्रीय उपकरण और शोधादि में जरूरी सामग्री को खरीदने के लिए भी अलग से पर्याप्त धनराशि का प्रावधान है।
ऐसी ही एक योजना के अन्तर्गत यदि कोई वनौषधियों की खेती का इच्छुक हो तो उसे तीन वर्षीय इस परियोजना के लिए प्रति वर्ष 2.40 लाख के हिसाब से सात लाख 20 हजार रुपए की धनराशि का सहयोग केन्द्र सरकार द्वारा दिया जाता है। औषधीय पादपों की खेती के लिए चहारदीवारी, सिंचाई, निर्माण, छायादार स्थान निर्माण, सामग्री संग्रहण आदि आधारभूत सुविधाओं के लिए प्रति हैक्टेयर पचास हजार रुपए की मदद भी मिलती है। इस योजना में चिह्नित औषधीय पादपों की संख्या 133 है।
इसी तरह की दूसरी योजना में सरकारी, अर्द्ध सरकारी संस्थाओं और सरकार से नियंत्रित एवं वित्त पोषित संगठनों को कम से कम पांच एकड़ क्षेत्र में चिह्नित 45 प्रकार के औषधीय पादपों के संरक्षण एवं संवर्द्धन की दृष्टि से आधारभूत सुविधाओं के लिए चहारदीवारी एवं भूमि सुधार के लिए 30 हजार रुपए, सिंचाई के लिए 30 हजार रुपए तथा पांच लाख रुपए उपकरण/छाया सुविधा आदि के लिए 30 हजार रुपए प्रति एकड़ की सहायता मुहैया कराई जाती है।
यह सहायता राशि भारत सरकार की ओर से दी जाती है। प्रदेश में औषधीय पादपों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए चाहे जाने पर राज्य सरकार से भी वांछित भूमि उपलब्ध हो सकती है। इस दिशा में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता आज महसूस होनी चाहिए क्योंकि आने वाले समय में इनका उत्पादन और प्रयोग ही फिर से प्रचलन में आने वाला है। इसकी पूरी-पूरी संभावनाएं बनी हुई हैं।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com


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