मुख्यमंत्री के नाम बिहारी युवाओं का संदेश - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मुख्यमंत्री के नाम बिहारी युवाओं का संदेश


माननीय मुख्यमंत्री 
बिहार सरकार,

विषय: पटना के प्रमुख रेडियो चैनल "रेडियो मिर्ची" पर भोजपुरी और मैथिली सिनेमा के गानों को एक घंटा देने के सन्दर्भ में |

महोदय, 

आशा करता हूँ आप स्वस्थ होंगे | हम बिहार के युवा हैं। हम बिहार के स्थापना के सौंवे वर्षगाँठ में प्रवेश कर चुके हैं | राज्य में और देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में बिहार दिवस पुरे जोश से मनाया जा रहा है | बिहार सरकार भी बिहार के कई हिस्सों में बिहार के युवाओं के मन में बिहार के प्रति सम्मान और संवेदना जगाने के लिए प्रयासरत है | महोदय, समग्र विकास तभी आती है जब जनसाधारण अपने धरा के प्रति संवेदनशील है | संवेदना संस्कृति से आती है और संस्कृति के रीढ़ का महत्वपूर्ण हिस्सा भाषा और उस भाषा में रचित साहित्य, काव्य संग्रह, संगीत और लोक रचनाएँ इत्यादि हैं | हमारे बिहार के सन्दर्भ में अगर हम संगीत की बात करें तो लोक और शास्त्रीय गायन शैलियों से हमारे भोजपुरी, मैथिली और मगही संगीत पटा पड़ा है | सोहर, बिरहा, निर्गुण, चैता, चैती, कटनी, रोपनी, फाग, कजरी, होरी, सामा चकेबा इत्यादि बहुत सी लोक संगीत की शैलियाँ हैं | अगर हम शास्त्रीय की बात करें तो बेतिया जी की ठुमरी, दरभंगा महाराज का ध्रुपद, गया जी की ठुमरी ख़ास है | शारदा सिन्हा और मल्लिक जैसे संगीतग्य हुए हैं | चित्रगुप्त और उदित नारायण जैसे लोक प्रिय संगीतकार और गायक भी यहाँ हुए | आज हमारे लोक संगीत को पिछले पचास सालों से बन रहे भोजपुरी और मैथिली फिल्मों ने हमेशा बखूबी इस्तेमाल किया है | यह बात कहने की जरुरत नहीं है की जन साधारण के बीच अपने संगीत के प्रति संवेदना जगाने और पहुचाने में रेडियो का सबसे महत्वपूर्ण स्थान रहा है | इसी सन्दर्भ में, मैं आपका ध्यान पटना में बहुचर्चित "रेडियो मिर्ची" चैनल की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ |

रेडियो मिर्ची लगभग चार से पांच सालों से बिहार में अपना व्यवसाय चला रहे हैं | रेडियो मिर्ची देश के विभिन्न हिस्सों में भी है | हम पटना के लोगों ने रेडियो मिर्ची को एक सफल रेडियो चैनल बनाने में कोइ कसर नहीं छोड़ा है | इसी क्रम में हम बिहारी युवा रेडियो मिर्ची से बिहार के मैथिली और भोजपुरी सिनेमा के गानों को मात्र एक घंटा देने का अनुरोध कई महीनो से कर रहे हैं | पटना, जिस राज्य की प्रमुख भाषाएँ भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका और बज्जिका है उसकी राजधानी है और यहाँ रहने वाली ९९ प्रतिशत लोग इन्ही भाषायों से आते हैं | लेकिन क्या हम अपने ही घर में अपनी भाषायों की अवहेलना सहन करने के लिए श्रापित हैं ? हम युवाओं ने जो रेडियो मिर्ची के समक्ष मांगे रखीं हैं मैं उनसे आपको अवगत करवाने की अनुमति चाहूँगा और उनके कारणों को भी प्रयुक्त करूंगा |

१. रेडियो मिर्ची पटना में और पटना से साठ से सत्तर किलोमीटर के दायरे में सुना जाता है, जहां पर भोजपुरी या मैथिली समझने वाले लोग शत प्रतिशत हैं | तो भोजपुरी और मैथिली सिनेमा के गाने रेडियो मिर्ची क्यूँ नहीं बजाती ?

२. रेडियो मिर्ची पश्चिम बंगाल में बंगाली फिल्मों के , तमिल नाडू में तमिल फिल्मों के, केरल में मलयाली फिल्मों के, आंध्र प्रदेश में तेलुगु, कर्नाटक में कन्नडा, महाराष्ट्रा में मराठी इत्यादि राज्यों में उनके फिल्म के गाने बजाता है | तो हमारे राज्य में हमारे सिनेमा के गाने क्यूँ नहीं ?

३. पटना के रेडियो मिर्ची पर, "कहे तोसे सजनी..", "सखी सैय्याँ त खूब ही कमात हैं..", "जिय हो बिहार के लाला", "हमनी के छोड़ी के नगरिया..", इत्यादि भोजपुरी गाने भी बजाये जाते हैं लेकिन ये भोजपुरी गाने हिंदी सिनेमा से हैं | भोजपुरी सिनेमा के हिंदी या भोजपुरी गानों से ही परहेज क्यूँ ?

४. कई बार ये दलील दी जाती है की भोजपुरी के गाने अश्लील हैं | लेकिन यही रेडियो मिर्ची "आई एम अ हंटर, शी वांट टू सी माई गन,", "बोस डी के", और हिंदी सिनेमा कई महा अश्लील गाने अपने पटना केंद्र से प्रसारित करते हैं | कहने का मतलब की ये भोजपुरी भी बजा रहे हैं और अश्लील भी बजा रहे हैं लेकिन बिहार के अपने भोजपुरी और मैथिली सिनेमा के अच्छे गानों को नहीं बजायेंगे | ऐसा क्यूँ ? ये उच्छिष्टवर्गवादी और सामंतवादी विचार धारा है | जैसा अंग्रेज हम भारतीयों को हीन दृष्टि से देखते थे, मुझे ये कहते हुए परहेज नहीं है की आज ऐसी ही भावना यहाँ पटना में रेडियो मिर्ची के इस व्यवहार से महसूस हो रहा है |

५. भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत १९६२ में हुई जो की प्रथम राष्ट्र पति की मात्र भाषा भी थी और उनके ही अगुआई में भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत हुई | १९६५ में मैथिली सिनेमा की शुरुआत फनी मजुमदार जैसे दिग्गज लोगों ने की | कमोबेश इन दोनों भाषायों में फिल्में बनती रही हैं और आगे भी बनेंगी | आज भोजपुरी सिनेमा देश के ९ राज्यों में देखा जाता है | मैथिली सिनेमा बिहार और नेपाल में देखा जाता है | मैथिली सिनेमा अपने सांस्कृतिक और परम्परावादी गायन के लियी जाना जाता है | जहां पर श्री विद्यापति के रचनाओं का भे इस्तेमाल किया गया है | हमारी इन दो भाषायों के सिनेमा में लता मंगेशकर, मो. रफ़ी, हेमंत कुमार, मन्ना डे, आशा भोंसले, वर्तमान में उदित नारायण, सोनू निगम, श्रेया घोषाल, सुनिधी चौहान, पद्म श्री शारदा सिन्हा, भारत शर्मा व्यास, मनोज तिवारी जैसे दिगाजों ने गाया है लेकिन पटना और उसके आस पास की जनता को ऐसे बेहतरीन गानों से वंचित रखा गया है | आखिर क्यूँ ?

६. बनारस का "रेड ऍफ़ एम्", बंगाल का "रेडियो मिष्टी" और झारखंड के भी रेडियो चैनल पर भोजपुरी गाने बजाये जाते हैं | लेकिन ये विडम्बना ही नहीं बल्कि एक एतिहासिक उपेक्षा है की बिहार की राजधानी में ही बिहार की भाषाओं के गानों को नहीं बजाता है यहाँ का प्रमुख रेडियो स्टेशन | आखिर क्यूँ शर्मिंदा है रेडियो मिर्ची ?

७. रेडियो मिर्ची हिंदी सिनेमा में गाये जाने वाले पंजाबी गाने जैसे "पानी दा रंग वेख के..", "तेनु लेके मैं जावांगा..', "नि मैं समझ गयी.." और मराठी मूल के लावनी गाने जो की हिंदी मिश्रित है वो बजाते हैं लेकिन हमारे गाने नहीं |

८. बहुचर्चित कोलावेरी डी से पूरा पटना और आस पास के जिलो को रेडियो मिर्ची ने पाट दिया लेकिन हमारे भोजपुरी और मैथिली सिनेमा के गाने बजाने में इन्हें शर्म आती है |

९. और तो और रेडियो मिर्ची ने भोजपुरी फिल्मों के गानों को "एयरटेल रेडियो" पर डाल दिया, मसलन की हमारी भाषा के फ़िल्मी गानों सार्वजनिक रूप से नहीं बजायेंगे | इससे भद्दा मज़ाक नहीं हुआ होगा विश्व के किसी हिस्से में जो यहाँ बिहार में हो रहा है | 

रेडियो मिर्ची के प्रमुख का कहना है की सर्वेक्षण के अनुसार पटना की जनता हिंदी सुनना चाहती है | हम तो सिर्फ एक घंटा मांग रहे हैं बिहार की मूल भाषायों के लिए | कई सवाल खड़े होते हैं | पहला तो ये की क्या ये सवाल पूछा गया की पटना और उसके आस पास रहने वाले कितने लोगों को भोजपुरी और मैथिली समझ में आती है | मेरा अनुमान है ७० - ९० प्रतिशत लोग समझते हैं अगर नहीं समझते तो रेडियो मिर्ची हिंदी फिल्मों के भोजपुरी गाने नहीं बजाती | दूसरी बात ये है की सर्वेक्षण तो पंजाबी इत्यादि गानों को लेकर भी नहीं हुआ | क्या ये पूछा गया की क्या पटना और उसके आस पास के जिले के लोग पंजाबी गाने सुनेंगे ? क्या इन्होने ७० किलोमीटर के रेडियस में सर्वे किया ?

हम अपने युवाओं में कैसी संवेदना और और किस तरह से बिहार के नवनिर्माण की चर्चा कर रहे हैं, आज सौंवे साल में | क्या हम बिहारियों को अपनी भाषायों पर हो रहे इस क्रूर मजाक को सहन करना होगा ? आखिर एक घंटे की मांग अपनी ही भाषायों के लिए, अपने ही घर में हमें देने से रेडियो मिर्ची क्यूँ कतरा रहा है | जबकि इसको चलाने वाले सब लोग इन्ही भाषायों से आते हैं | उन्ही भाषायों के लोगों के पैसे ये रेडियो चैनल चल रहा है | ये जन भावनाओं को धूमिल किया जा रहा है | अजीब परिस्थिति है, आज बिहार के सौंवे साल में हम उन लोगों की भाषायों के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं जिन्होंने ये बिहार हमें दिया | आज बंबई में बैठे गैर बिहारी संस्कृति वाले ये निर्णय लेंगे की एक करोड़ बिहारी क्या सुनेंगे | वहाँ से बैठ कर अपनी सोच हम पर थोपने वाले ये कौन लोग हैं ? सरकार से अनुरोध है की त्वरित इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाये | ये सिर्फ कुछ गानों और एक चैनल की बात नहीं, ये दुनिया भर में फैले बीस करोड़ बिहारियों की आत्म सम्मान की बात है |

आपके अपने
बिहार का सांस्कृति विकास चाहने वाले बिहारी युवा

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