खुद भी उछाल दिए जाएंगे कभी !!!
विचित्रताआंे से भरी इस दुनिया में सबसे बुद्धिमान प्राणी के रूप में मनुष्य प्रतिष्ठित है। यह मनुष्य ही है कि जो अपनी बुद्धि और कौशल के बूते दुनिया को नचाने से लेकर खुद भी नाचने तक के सारे हुनर रखता है। यह कौशल किसी में कम, तो किसी में ज्यादा हुआ करते हैं। हर आदमी अपने और अपने लोगों के लिए जीना चाहता है और इसलिए जिन्दगी भर जाने कितने जतन करता रहता है। कुछ रास्ते अच्छे और कुछ बुरे होते हैं जबकि कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जहाँ जाना आदमी की विवशता है। इसी प्रकार कई रास्तों पर आदमी चाहे-अनचाहे भी पशुओं की तरह चलता रहता है और कुछ पाने की फिराक में ताजिन्दगी भटकता रहता है। कई बार आदमी खुद सारी मनुष्यता छोड़कर या आकाओं की फाइलोें में गिरवी रखकर पशु की तरह किसी न किसी विचारधारा या अपराध का पट्टा गले में बाँध कर पालतू किस्म का हो जाता है।
आदमी को जानवरों की तरह नचाने वाले, करतब दिखाने वाले और आदमी से सारे अजीब काम करवा लेने वाले मदारियों की भारी भीड़ यहाँ-वहाँ पूरी लोकप्रियता के साथ विद्यमान है। इसी तरह हर कहीं तमाशबीनों की फौज भी है जो डमरू या ढोल बजते ही जमा हो जाती है मुफतिया करतबों का आनंद पाने। तमाशा दिखाने वालों से लेकर मदारियों तक की मौजूदगी हमारे अपने पावन इलाकों में भी है। इनमें स्वदेशी और दूर-देशी दोनों ही किस्मों के मदारी हैं जिनके पास आदमी को भरमाने से लेकर नचाने और मरा-अधमरा कर देने तक के सारे हुनर और जादुई नुस्खे हैं। आदमियों की विस्फोटक जनसंख्या के बीच खूब सारे लोग ऐसे हैं जो खुद कुछ नहीं करते बल्कि दूसरों के हुनर, सम्पत्ति, श्रम, मन-मस्तिष्क, शरीर और सब कुछ इस्तेमाल करते हुए अपने काम निकालते रहते हैं। यह इस किस्म के लोगों का मौलिक गुण है जो औरों में देखने को नहीं मिलता। कई मामलों में भगवान भी ऐसे लोगों की मदद करता है। इस किस्म के लोग उन सभी प्रकार की कलाबाजियों और वाग् विलास में माहिर होते हैं जिनसे अपने काम में आने वाले या भविष्य में आ सकने वाले लोगों को भ्रमित किया जाकर उनका मनचाहा लाभ लिया जा सके।
ऐसे लोग दुनिया के और हिस्सों की ही तरह अपने यहाँ भी काफी संख्या में हैं जिनका काम ही लोगों का शोषण करना और किसी न किसी जलेबी या चाशनी का कड़ाह दिखाते हुए चाहे जिस तरह भी हो सके, अपने काम निकालना है। सामाजिक और परिवेशीय दायित्वों से लेकर मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को भुलाकर ऐसे लोग हर गली-चौराहों से लेकर फोरलेन व सिक्सलेन, ढोंगी पाखण्डी योगियोें और बाबाओं की आलीशान कुटियाओं से लेकर राजप्रासादों तक अपने करतबों की चादर फैलाये रखते हैं। दूरदर्शिता और दोहन ये दो गुण इनमें इतने कूट-कूट कर भरे हुए होते हैं कि इन्हें अच्छी तरह पता रहता है कि कौन उनके काम आ सकता है अथवा भविष्य में आने वाला है। इनके संबंधों की बुनियाद ही कोई न कोई स्वार्थ हुआ करता है। किसी से इनका कोई स्वार्थ न सधे तो ये सीधे मुँह बात तक नहीं करते, सहयोग या आत्मीयता की बात तो बहुत दूर है। यही कारण है कि ऐसे लोगों का कोई स्थायी मित्र या आत्मीयजन नहीं होता। इस किस्म के लोगों का यदि पति-पत्नी, बच्चों, माता-पिता या नाते-रिश्तेदारों से भी यदि कोई स्वार्थ नहीं सधता हो तो उस स्थिति में ये उनको भी उपेक्षित या त्याज्य कर देने में नहीं हिचकते।
इन लोगों के लिए मित्रता और आत्मीयता का रिश्ता तभी तक होता है जब तक स्वार्थ की आयु पूर्ण न हो जाए। यही कारण है कि अपनी पूरी जिन्दगी में ये खूब सारे लोगों में यह भ्रम बनाए रखते हैं कि वे उनके ही हैं, जबकि हकीकत में ऐसा होता नहीं। स्वार्थ पूरा हुआ नहीं कि ये अपनी राह, किसी और के साथ स्वार्थ पूरा करने की यात्रा शुरू कर देते हैं। ऐसे लोग हमेशा अपनी छवि विनयी, सुशील, समर्पित, ईमानदार और सेवाभावी के रूप में बनाए रखने की भरसक कोशिशों में जुटे रहते हैं। उनका यह आडम्बरी स्वरूप ही इन्हें अपने कामों की पूर्णता और स्वार्थ पूरे करने में मददगार साबित होता रहता है। आज इसका और कल उसका दामन थाम कर ये पूरी जिन्दगी जाने किन-किन लोगों को भरमाते हुए पूरी मस्ती के साथ गुजार देते हैं और जब जाने का समय आता है तब तक खूब माल बना लेते हैं। इनके साथ नहीं होती तो सिर्फ दो बातें- लोगों की सद्भावना और श्रद्धा। क्योंकि इनकी जिन्दगी में जो आता है अथवा ये जिनकी जिन्दगी में भरम फैला कर घुसपैठ कर लिया करते हैं उन सभी को एक समय बाद इनकी असलियत का पता चल जाता है और ऐसे में इनके प्रति किसी के मन में भी न श्रद्धा का भाव होता है न प्रेम का। बल्कि लोगों की बद्दुआओं का खजाना ये मरते दम तक बढ़ाते रहते हैं अपनी मिथ्या लोकप्रियता का जयगान करते हुए।
इस किस्म के लोग दूसरों को बुद्धू समझते हैं और इनका स्पष्ट मानना होता है कि दुनिया के सारे लोग सिर्फ और सिर्फ उनकी सेवा-चाकरी के लिए पैदा हुए हैं। इस प्रजाति के लोगों के लिए कोई अपना नहीं होता। काम निकल जाने के बाद ये ऐसे हो जाएंगे जैसे साँप सूंघ गया हो या कभी जानते ही नहीं थे। यूज एण्ड थ्रो की अपनी इस आदत को भले ही इस किस्म के लोग अपने मौलिक गुणधर्म और व्यक्तित्व की विलक्षणता के रूप में स्वीकारें मगर हकीकत यह भी है कि इस किस्म के लोगों के लिए भी कोई आकस्मिक क्षण ऐसा आ ही जाता है जिसमें इन्हें भी उठा कर ऐसा फेंक दिया जाता है, जहाँ से वे कभी लौट कर नहीं आते। सिवाय सिसकने और सुबकने के इनके पास कोई चारा नहीं होता। यह इनकी वह अवस्था होती है जब घर-परिवार के लोग भी इन्हें उपेक्षा की नज़रों से देखने लगते हैं और इनकी तेरहवीं के लिए मानस बना चुके होते हैं। दूसरी तरफ इनका अपना कोई मित्र नहीं होता सिवाय झुर्रियों भरी देह, षड़यंत्रों और कुटिलताओं भरी जिन्दगी की दास्ताँ, जिसे सुनाकर वे अपने मन को हलका करना चाहते हैं, मगर सुनने वाला कोई इनके पास तक नहीं फटकता। तकरीबन ऐसी ही हालत इनके समानधर्मा उन लोगों की भी होती है जो इनकी ही तरह अपनी जिन्दगी गुजारते-गुजारते, जमाने भर को दुःख देते, भ्रमित और गुमराह करते हुए, अपने स्वार्थ पूरे करते हुए उत्तरार्द्ध के किनारे तक बैठे हैं उत्तरक्रिया के लिए।
इनके श्वेत-श्याम इतिहास का ही कमाल होता है कि ये अपने जीवन के उत्तरार्ध में अपने किए की ऐसीसजा भी भुगतते हैं और प्रायश्चित भी नहीं कर पाते। औरों की जिन्दगी और अरमानों को तबाह करने वाले ये लोग खुद भी मौत की भीख मांगने को विवश हो जाया करते हैं।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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