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रविवार, 3 मार्च 2013

असली मौज मस्ती चाहें तो ...


मुक्त, निरपेक्ष और सहज रहें !!!


आदमी की पूरी जिन्दगी को तीन तरह से रेखांकित किया जा सकता है। एक वे लोग हैं जो निकम्मे और उदासीन हैं। ये लोग जैसे आए हैं वैसे ही मर जाने वाले हैं। दूसरी किस्म उन लोगों की है जो किसी न किसी प्रेरक या उद्दीपक कारक अथवा संबल, बाहरी मदद, चापलुसी, समझौतों और सर्वस्व समर्पण की भावना से पात्र या अपात्र सभी तरह के लोगों के समक्ष किसी न किसी रूप में हर दर्जे के याचक बनकर अथवा दया अथवा कृपा पात्र बनकर पूरी तरह पराश्रित जिन्दगी जीने के आदी हैं। ऎसे लोगों में भले ही अंतस का आनन्द न हो तब भी ये बाहरी चकाचौंध और पराई रोशनी में जीते हैं। इस किस्म के लोग दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। इनका अपना कोई वजूद नहीं होता। सिवाय इसके कि सिर्फ शरीर अपना होता है जिसका सामने वाले जिस तरह इस्तेमाल करना चाहें, करने को स्वतंत्र रहा करते हैं, शेष सब कुछ पराया ही होता है और परायाें के भरोसे चलता है। तीसरी किस्म उन लोगों की है जो लोगों की हर अच्छी-बुरी परिस्थिति को ईश्वर की ईच्छा मानकर तहेदिल से स्वीकार करते हैं और हर हाल में मस्त रहते है। इसका मूल कारण यह है कि ऎसे लोग किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखते और न ही दूसरों की उपेक्षा करते हैं।

इनकी पूरी जिन्दगी निरपेक्ष हुआ करती है। इनके प्रत्येक कर्म में ‘न उधो का लेना न माधो का देना’ तथा ‘कोऊ नृप होउ, हमे का हानि’ के सिद्धांतों का समावेश हुआ करता है। इस प्रवृत्ति के लोगों के लिए इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस स्थान पर हैं, किनके साथ हैं और उन्हें कौनसी सुविधाएं और सम्मान प्राप्त हैं। निरपेक्षता इनके कर्मयोग में कूट-कूट कर भरी होती है। उसी का परिणाम है कि इस प्रकार के लोग किसी बाह्य कारक से प्रभावित नहीं होते। याें भी जो लोग निरपेक्ष होते हं उन्हें कोई भी बाहरी प्रभाव या दबाव प्रभावित नहीं कर सकता। न ऎसे लोगों को कोई दबा सकता है और न ही ऑब्लाईज कर सकता है। ऎसे लोग किसी की भी दया या कृपा के मोहताज नहीं होते चाहे जमाने भर के लिए ख़ास माने जाने वाले लोग कितने ही बड़े आका, भाग्य निर्धारक या प्रभावी व्यक्तित्व क्यों न हों? वस्तुतः अपेक्षाओं से मुक्त होकर जीना ही सही अर्थों में जीवन मुक्ति है। जो व्यक्ति इस मूलमंत्र को अंगीकार कर लेता है, उसे जीवन में सदैव महा आनन्द की भावभूमि में विचरण करते रहने का मद मस्ती भरा सुख और सौभाग्य प्राप्त होता रहता है। यह आत्मीय आनन्द ही ऎसा है कि इसे किसी भी प्रकार से किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु की आवश्यकता से तुलना नहीं की जा सकती।

सही अर्थों में यही अद्वैतभाव का महाआनन्द है जिसकी प्राप्ति सामान्य मनुष्यों के लिए दुर्लभ तो नहीं किंतु मुश्किल जरूर है। निरपेक्षता अपने आप में ऎसा विराट शब्द है, जिसके आगे दुनिया के सारे शब्द और क्रियाएं बौनी हैं। चाहे फिर स्वार्थ, षड़यंत्र,  गोरखधंधे, परेशानियां व समस्याएं ही क्यों न हो ये सब गौण ही नहीं बल्कि निरपेक्ष व्यक्ति के आगे कहीं कोई मायने नहीं रखते। निरपेक्षता को अपनाने का प्रथम सूत्र ही है हर प्रकार के सायास-अनायास तथा चाहे-अनचाहे परिवर्तनों और परेशानियों के लिए निरंतर सदैव तैयार रहना। आज कल लोगों का धु्रवीकरण पशुओं की तरह होता जा रहा है। बात अपने इलाकों की हो या दूसरे इलाकों की। हर तरफ लोगों का विभाजन होने लगा है। समरसता और संगठन टूटने लगे हैं। समन्वय का खात्मा हो चला है और सामंजस्य की दीवारें भरभराकर जाने कहाँ गिर पड़ी हैं। कभी विचारधाराओं की वजह से, कभी स्वार्थ से, कभी अपने कुकर्मों व काले कारनामों पर पर्दा डालने, कभी संरक्षण पाने तो कभी किसी और वजह से। विचारधाराओं का वजूद अब करीब-करीब खत्म ही हो चला है। ज्यादातर धु्रवीकरण सिर्फ अपनी ऎषणाओं की नाज़ायज पूर्ति या स्वार्थों की वजह से ही हो रहा है। ध्रुवीकरण का यह दौर आदमी और समाज के सारे समीकरणों व पैमानों को ध्वस्त करने लगा है।

कोई किसी बाड़े में बंधा है, कोई नज़रबंद है तो कोई किसी बाड़े की तरफ खिंचा चला जा रहा है, कोई दूसरे बाड़ों की ओर। खूब सारे ऎसे हैं जो एक से दूसरे बाड़े में घुसने और निकलते रहने को ही अपनी जिन्दगी का सर्वोपरि लक्ष्य मान बैठे हैं। इन तमाम सम-सामयिक स्थितियों में सर्वाधिक गंभीर हालातों में जी रहे हैं तो वे लोग जो निरपेक्ष जीवन जीने के आदी हैं। ऎसे लोगों को सभी किस्मों के बाड़ों में कैद लोग घूर-घूर कर देखते रहते हैं और ये लोग ही इन निरपेक्ष लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। लेकिन निरपेक्षता का ब्रह्मास्त्र थाम लेने वाले लोगों के लिए ये चुनौतियां और ये बाड़े कोई मायने नहीं रखते क्योंकि जो लोग निरपेक्ष होते हैं वे अपनी पूरी मानसिकता बना चुकने के बाद ही निरपेक्षता के सागर में कूद पड़ते हैं। जहां उन्हें न किसी का भय है, न कोई स्वार्थ और न ही ऎसी कोई कामना जो दूसरे लोग पूरी कर सकें। निरपेक्षता का आनंद वही जान सकता है जिसका जीवन और व्यक्तित्व का हर कर्मयोग निरपेक्षता से भरा-पूरा है। ऎसे लोगों को न किसी से अपेक्षा होती है न इन फक्कड़ों की कोई उपेक्षा ही कर सकता है। निरपेक्षता का आनंद वे लोग कभी नहीं जान पाते हैं जो किसी न किसी के पिछलग्गू हैं या जयगान करते हुए परिक्रमाओं, चरण चम्पी के आदी हैं।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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