सारे प्रपंचों में माहिर होते हैं, ड्यूटी से जी चुराने वाले - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 28 अप्रैल 2013

सारे प्रपंचों में माहिर होते हैं, ड्यूटी से जी चुराने वाले


दुनिया में कई किस्मों के लोग हैं। इनमें तीन-चार किस्में मशहूर हैं। एक वे हैं जो उदासीन हैं। दूसरी किस्म के लोग वे हैं जो अपनी ड्यूटी अर्थात कत्र्तव्य कर्म के अलावा वे सारे काम करते हैं जिनमें उन्हें लाभ ही लाभ है अथवा अपने स्वार्थ सिद्ध होते हैं। तीसरी किस्म के लोग अपने स्वार्थों, आनंद और सभी प्रकार के मौज-शौक से परे रहकर कत्र्तव्य कर्म के प्रति हद से ज्यादा समर्पित होते हैं। ड्यूटी के प्रति वफादारों के बारे में चिंतन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ये लोग अपने-अपने कर्म में लगे हुए हैं जिनसे औरों को या समाज को कोई खतरा नहीं है। समाज के लिए सर्वाधिक घातक वे लोग हैं जो कत्र्तव्य कर्म के प्रति तो गंभीर नहीं होते या यों कहें कि निर्धारित ड्यूटी या सौंपे जाने वाले दायित्व इन लोगों की सबसे अंतिम प्राथमिकता होते हैं। इनकी प्राथमिकता अपने स्वार्थ, जायज-नाजायज धंधे और गोरखधंधे होते हैं जिनसे ये कुछ न कुछ प्राप्ति के सारे द्वारों से लाभान्वित होते रहते हैं। ऎसे लोगों के लिए कोई एक धंधा इनके सामने नहीं होता है बल्कि ये उस हर धंधे में फन आजमाने के आदी होते हैं जिनमें कम मेहनत में इनके स्वार्थ सिद्ध होते रहते हैं।

इस किस्म के लोगों के लिए नौकरियां या काम-धंधे बंधी-बंधायी कमाई के स्थायी स्रोत के रूप में निहाल करते रहते हैं और दूसरे धंधे इनकी प्रतिभाओं और लोक व्यवहार का परिणाम होते हैं। इस किस्म के लोगों का मन अपने निर्धारित काम-धंधों में नहीं लगता है बल्कि कई सारी दिशाओं और मार्गों की तरफ निरन्तर भागता ही रहता है। ऎसे में इनके लिए स्थायी स्रोत उपेक्षित हो जाता है और आवक या ऎषणाओं की पूत्रि्त के दूसरे रास्ते महत्त्वपूर्ण भूमिका में आ जाते हैं। अपने स्वार्थों में घिरा कोई भी व्यक्ति एक बार जब अनुशासन और सीमा रेखाओं को लांघ देता है उसके बाद उसके लिए न समग्र जीवन अनुशासन में बंधा होता है, न विचार या कर्म। ऎसे लोग उस भीड़ का हिस्सा हो जाते हैं जिनके लिए स्वार्थ और ऎषणाओं की पूत्रि्त ज्यादा मायने रखती है अपनी ड्यूटी के मुकाबले। जो लोग अनुशासन की लक्ष्मण रेखाओं को लांघ लेने का दुस्साहस कर जाते हैं वे जमाने में अपने आपको स्थापित करने, औरों को अपने पक्ष में बनाए रखने के गुर आजमाने, साम, दाम, दण्ड और भेद का प्रयोग करने तथा अपने लाभ के लिए हर प्रकार की परिस्थितियों से समझौता कर लेने के भी आदी हो जाते हैं। ये लाभ यश-प्रतिष्ठा और लोकप्रियता अर्जन के रूप में हो सकते हैं, मुद्राओं के रूप में अथवा और किसी स्वरूप में।

इनके लिए कोई काम वज्र्य नहीं है। ये वे सारे काम कर सकते हैं जो समझदार आदमी पूरी जिन्दगी कभी नहीं करना चाहता। इतना अवश्य है कि इन सभी लाभों को पाने तथा जमाने भर को अपनी मुट्ठी में कैद रखने की यात्रा पर निकल पड़े इन लोगों के लिए न स्वाभिमान आड़े आता है और न ही संस्कार। इन सभी से ये पूरी तरह मुक्त ही नहीं बल्कि उन्मुक्त हुआ करते हैं और इसी के साथ-साथ चलती रहती हैं इनकी स्वच्छन्द और बेलगाम वृत्तियाँ। ऎसे खूब सारे लोग हमारे आस-पास बिराजमान और विहाररत हैं जिनके बारे में अक्सर सुना जाता है कि ये लोग हैं ही ऎसे कि इनसे ड्यूटी के सिवा कुछ भी करा लो, बड़े मजे से करते रहेंगे। हालांकि विद्वजनों और विभिन्न मौलिक हुनरों में माहिर विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न लोगों की भी हमारे समाज में कोई कमी नहीं है जो अपने काम-धंधों और नौकरियों के मुकाबले दूसरे-तीसरे हुनरों में सिद्ध हैं और उन्हें यदि इनका मनचाहा काम मिल जाए तो ये देश-दुनिया में अपना नाम कमा सकते हैं लेकिन उन्हें वह काम नहीं मिल पाता है जिसमें वे फन आजमाना चाहते हैं।

इसे इनका दुर्भाग्य कहें या समाज, देश का। पर इसका यह अर्थ भी नहीं कि हम हमारे कत्र्तव्य कर्म को तिलांजलि देते हुए या इन्हें गौण समझते हुए उपेक्षा के भाव से देखें और दूसरे कामों तथा धंधों में बुद्धि या हाथ आजमाएं। असल में आदमी का यह दोहरा चरित्र ही समाज के लिए घातक होता जा रहा है और इसका खामियाजा यह देश भुगत रहा है। जिन लोगों को अपने कत्र्तव्य कर्म रास नहीं आते हैं और दूसरे कामों में आनंद मिलता है उन्हें अपने निर्धारित कत्र्तव्य कर्म से अपने आपको मुक्त कर लेना चाहिए ताकि वे जहाँ इच्छा हो वहाँ काम-धंधा कर सकें और अपनी खुशहाली को चार चाँद लगा सकेंं। इससे निरन्तर बेकारी और बेरोजगारी बढ़ा रहे समाज के नए लोगों को भी काम करने के अवसर प्राप्त होंगे और समाज तथा देश के लिए यह युवा पीढ़ी ज्यादा जिम्मेदारी से काम कर पाएंगी क्योंकि उनके लिए जीवन की अनिवार्यता से जुड़ा होने के कारण अपना कत्र्तव्य कर्म प्रधान होगा, शौक या अतिरिक्त आमदनी का स्रोत नहीं। आजकल प्रपंची लोगों का मायाजाल हर तरफ पसरा हुआ है जो सब तरफ दो-दो हाथों से खाना और पीना चाहता है। कत्र्तव्य कर्म के प्रति हमारी मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है ताकि हम जहाँ काम करते हैं वहाँ पूरी ईमानदारी और एकाग्रता के साथ काम कर सकें और समाज तथा देश के नवनिर्माण में अपना योगदान दे सकेंं।




---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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