समाज सुधार और विकास के लिए मौजूदा युग में जो कुछ बहुरूपी प्रयास हो रहे हैं उतने इससे पहले कभी नहीं हुए। इसके बावजूद जगत में आनंद और शांति की बजाय अशांति, उद्विग्नता और अपराधों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। सतयुग में जो असुर थे उनका चेहरा-मोहरा और वेशभूषा ही ऎसी थी कि उसे देखकर उनके असुर होने का पता चल जाता था। आज भी उस जमाने जैसे असुरों से भी घातक लोग हर कहीं विद्यमान हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज के असुर पहचानने में नहीं आते। वे दिखते तो देवताओं और महापुरुषों की तरह हैं और व्यवहार करते हैं असुरों से भी कहीं ज्यादा घातक। कभी ये असुर आतंकवादियों और समाजकंटकों के रूप में कारगुजारियां कर जाते हैं, कभी चोर-डकैतों और जेबकतरोें के रूप में, कभी गैंग रेपिस्टों की तरह। असुरों का भारी लवाजमा बाहर भी है और भीतर भी। हमारे आस-पास से लेकर दूर-दूर तक ये बिना सिंग-नाखून वाले असुर भरे पड़े हैं। लोगों की कथनी और करनी में अंतर आ गया है, आदमी बहुरूपियों की तरह व्यवहार करने लगा है, कुटिलताएं, षड़यंत्र और गोरखधंधों के जरिये जाने किन-किन क्षेत्रों में मदारियों की बाढ़ आ गई है जो जमूरों के कंधों पर बंदूक रखकर सब कुछ कर गुजरते हैं।
वह जमाना गुजर गया जब लोगों के चेहरों को पढ़ कर उनके दिल के भावोें को अच्छी तरह जाना जा सकता है। पर हाल के कुछ दशकों में आदमी ने दोहरा-तिहरा ही नहीं बल्कि बहुआयामी चरित्र अपना लिया है और वह हर जगह अपना चेहरा तथा चाल-चलन बदलने में इतना माहिर हो चला है कि सामने वाले उसकी हरकतों से उसके मन की थाह तक नहीं पा सकते हैं। इस दृष्टि से आदमी के भीतर से आदमी होने की गंध गायब होती जा रही है और उसमें आसुरी भावों का प्रवेश इतना होता जा रहा है कि वह प्रगाढ़ता की सारी सीमाओं को पार करता जा रहा है। अपने ही मौज-शौक, विलासिता और वैभव को सुरक्षित एवं संरक्षित बनाये रखने के लिए आदमी उन तमाम हथकण्डों का सहारा लेने लगा है जिसे कभी असुरों का हुनर समझा जाता था। कभी आदमी समूहों में अपने आपको पाकर उन हरकतों को अंजाम देता है जो समाज के लिए घातक होती हैं, कभी वह अपनी सारी इच्छाओं और वासनाओं को पूरा करने के लिए अपनी ही किस्म के लोगों को तलाश कर गिरोह बना लेता है और भरे हुए तरकशों से उस दिशा में विषबुझे तीर छोड़ने शुरू कर देता है जिधर अच्छे लोगों का जमावड़ा होता है और इंसानियत के आदर्शों की फसलें लहलहाती हैं।
उस जमाने में असुरों से ऋषि मुनि त्रस्त थे, यज्ञों का विध्वंस और तपस्वियों का शिरोच्छेदन आम समस्या हो गया था, अच्छे लोग भयभीत हुआ करते थे और अच्छाइयों का प्रभाव क्षीण होने लगा था, श्रेष्ठीजनों में संगठन और सामथ्र्य का अभाव होने लगा था। आज भी तकरीबन स्थितियाँ उन दिनों से ज्यादा अच्छी नहीं हैं, सिर्फ स्वरूप बदला है और लोगों को प्रताड़ित एवं त्रास पहुँचाने के तौर-तरीके बदले हैं। आज भी हम घिरे हुए हैं उस किस्म के लोगों से, जो मानवजाति के लिए कभी हितकर नहीं रहे। ऎसे में हम लोग एक-दूसरे को दोष देकर अपना समय गुजारने का शगल पाले हुए चुपचाप बैठे हुए हैं और रावणत्व को सहन करते ही चले जा रहे हैं। असुरों का प्रभाव बढ़ रहा है इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं, और कोई नहीं। आज अच्छे कर्मों और अच्छे लोगों को संरक्षण प्रदान करना सर्वाधिक कष्टसाध्य काम हो गया है जबकि बुरे लोग सभी जगह संगठित हैं इसलिए उन्हें अपनी ही किस्मों के लोगों से संरक्षण प्राप्त हो रहा है और उनका प्रभाव भी बढ़ता दिखाई दे रहा है। यों भी अच्छे लोग उन्मुक्त विचारों के पंछी जैसे होने के कारण किन्हीं बाड़ों में संगठित या एक साथ नहीं रह पाते जबकि बुरे लोग एक लक्ष्य पाने तक को ही अपने जीवन का लक्ष्य मानने और स्वार्थ पूत्रि्त में रमे होने की वजह से प्रगाढ़ता के साथ संगठित रह पाते हैं और ऎसा होना उनकी अपनी मजबूरी भी है।
दोष हमारा ही है। हमें समाज और देश को सुधारने के लिए अपने भीतर से ही प्रयास शुरू करने होंगे और इसके लिए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम से बढ़कर और कोई आराध्य एवं मार्गदर्शक नहीं हो सकता जो हमें सही राह तथा सफल जीवन के आयामों से जोड़ पाए। आज सबसे बड़ा खतरा मर्यादाहीनता का है। कोई किसी की मर्यादा नहीं रखने को ही अपना स्वाभिमान मान बैठा है। मर्यादाहीनता के इस भयंकर दौर में मर्यादाओं की स्थापना तथा संस्कारों को अपनाना ही एकमात्र विकल्प है जिससे सामाजिक एवं परिवेशीय महापरिवर्तन लाया जा सकता है। आज असुरों से निपटने के लिए अस्त्र-शस्त्रों की नहीं बल्कि शुचिता और संगठन की आवश्यकता है। भगवान श्री राम ने ‘अभयं सर्वभूतेभ्यो...’ के वाक्य को सर्वोपरि मानकर प्राणी मात्र को अभय कर दिया था।आज उन्हीं राम की उपासना और रामत्व को जीवन के प्रत्येक कर्म से लेकर तन-मन की प्रत्येक कोशिका तक में स्थापित करने की आवश्यकता है। राम के चरित्र को पढ़ने, जानने, समझने और जीवन में उतारने की प्रक्रिया को अपना लिया जाए तो अपने भीतर सुधार अपने आप आना शुरू हो जाता है और जब हम अपने अंदर शुचिता, दिव्यत्व और दैवत्व का अहसास करने लगते हैं तब हमारे संपर्क में आने वाले लोग भी हमारे आभामण्डल से प्रभावित होने लगते हैं।
इस प्रकार इकाई से इकाई मिलकर पूरे परिवेश की आबोहवा को बदलने का शाश्वत सामथ्र्य प्राप्त कर सकते हैं। राम का समग्र जीवन ही व्यक्तित्व निर्माण और जीवन लक्ष्यों में आशातीत सफलता पाने का वह पाठ्यक्रम है जिसे जो एक बार अपना लेता है, राम उसके हो जाते हैं और फिर रामत्व की महानतम सामथ्र्य से व्यष्टि और समष्टि, पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक में दिव्य गंध की जो महक पसरने लगती है उसे सदियों तक भुलाया नहीं जा सकता। रामत्व को आत्मसात करें और रावणी शक्तियों के पराभव के लिए संगठित होकर आगे आएं, यही आज का युगधर्म है।
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