जीवन में कभी भी पूर्ण अनुकूलताएं और पूर्ण विपरीत स्थितियां नहीं हुआ करती। इनका अनुपात हमेशा सम न होकर न्यूनाधिक रूप में विषम होता है और इन्हीं विषमताओं का चक्र पूरी जिन्दगी यों ही चलता रहता है। ऎसे में किसी भी व्यक्ति को यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि पूर्ण अनुकूल परिस्थितियां ही कभी हमारे सामने बनी रहेंगी ही। इसके साथ ही यह सोचकर भी कभी विकल नहीं होना चाहिए कि जीवन में हमेशा खराब परिस्थितियाँ बनी ही रहेंगी। पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक में परिवर्तन एक निरन्तर प्रक्रिया है जो हमेशा किसी न किसी रूप में जारी रहती है। सृष्टि का यह परिवर्तन कुछ के लिए अच्छा होता है तो शेष के लिए खराब स्थितियां लेकर आता है। समय कभी अच्छा-बुरा नहीं होता है लेकिन समय के साथ जो कारक हैं उनका स्वरूप बदलता रहता है और इन्हीं का प्रभाव हम सभी लोगों से लेकर परिवेश तक पड़ता ही है।
इनके साथ ही यह अवश्यंभावी है कि अच्छी और बुरी शक्तियां और लोग हर युग में रहे हैं और रहने वाले हैं। सत और असत की सत्ता हर युग में रही है और इस युग में भी है। इसलिए जीवन का कोई सा पक्ष हमारे सामने हो, हमें अपने किसी काम के लिए अच्छा समय आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए क्योेंकि समय हमेशा ऎसा ही रहने वाला है। आज चारोंं तरफ आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अनाचार, व्यभिचार, चोरी-बेईमानी और अपराधोें का माहौल है, लोग यह कहने लगते हैं कि समय बड़ा खराब आ गया है। मानवीय मूल्यों का जो हश्र हो रहा है और उस कारण से मानवी सभ्यता और संस्कृति पर कहर बरपने लगा है, अच्छे कहे जाने वाले इस बुरे समय को खराब महसूस करने लगे हैं और यह कहने के आदी हो गए हैं कि अब तो भगवान को अवतार लेना ही चाहिए, सतयुग आएगा तथा अच्छे समय की प्रतीक्षा जरूरी हो गई है।
इन तमाम आशाओं के बीच अपने अच्छे कामों के लिए कई सारे लोग सतुयग आने की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं और उन्हें लगता है शायद युग बदलेगा और चमत्कार हो जाएगा। इस प्रकार की सोच रखने वाले लोग यही सोचकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें तो उनकी पूरी जिन्दगी निकल जाने के बाद भी सतयुग नहीं आने वाला। परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर ही परिस्थितियों का पूरा लाभ उठाया जा सकता है। हालात अपने आप नहीं बदला करते बल्कि हालातों को बदलने के लिए वर्तमान को ही प्रयत्न करने पड़ते हैं। चारों तरफ कितना ही नकारात्मक माहौल हमारे सामने क्यों न हो, अंधकार के बीच भी छोटा सा चिराग अंधेरे को खत्म कर देने के लिए काफी है और इसलिए आशाओें तथा प्रयासों को अच्छे समय की प्रतीक्षा में आगे से आगे टालते चले जाना दृढ़व्रती और यशस्वी व्यक्तियों का लक्षण नहीं कहा जा सकता है।
समाज पहले भी ऎसा ही था और ऎसे में सुधारकों और महापुरुषों ने अपने प्रयत्न किए तथा कुछ सुधारा किया, कुछ विकास किया और चले गए। पूरी दुनिया को बदल डालने का न हमारे पास समय है और न ही सामथ्र्य। इन स्थितियों में यह हमारा दायित्व है कि सतयुग आने की प्रतीक्षा करने की बजाय सतयुग लाए जाने के लिए अपने सामथ्र्य के अनुरूप अभी से प्रयत्न आरंभ करें। हर अच्छी शुरूआत के लिए हर क्षण शुभ और मांगलिक होता है, इस बात को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए। समाज की हर इकाई यदि बदलाव के लिए तैयार हो जाए तथा सकारात्मक चिंतन से अपने जीवन व्यवहार में परिवर्तन की भाव भूमि रच दे तो कोई कारण नहीं कि परिवेश मेें बदलाव को महसूस न किया जा सके। जो कुछ बदलाव लाना है उसमें हमें ही भागीदार बनना होगा, इस सत्य को हमें अच्छी तरह जान लेना चाहिए। हमें यह भी साफ तौर पर मान लेने की जरूरत है कि जो कुछ करना है वह हमें ही करना है, बदलाव लाने का काम हमारे कंधों पर है और इसके लिए दूसरों पर निर्भरता या दूसरों से आशाएं-अपेक्षाएं रखना पूरी तरह व्यर्थ है।
इसके साथ ही दूसरों को दोष देना भी व्यर्थ है। अपने आपको सुधारने की यात्रा आरंभ करें आज और अभी से। फिर देखें कि कैसे हम खुद भी बदलने लगते हैं और जमाने में भी बदलाव का अहसास होने लगता है। सतयुग के आने की प्रतीक्षा में समय न गंवाएँ बल्कि अपनी ओर से ही सतयुग लाने का प्रयास आरंभ करें, इसी में हमारा अपना और समाज तथा देश की भला संभव है। सतयुग की प्रतीक्षा वे लोग करते हैं जो खुद कुछ नहीं कर निकम्मे बने पड़े रहते हैं और औरों से अपेक्षा रखते हैं कि वे कुछ करें। ऎसे निकम्मे लोग न खुद के होते हैं न समाज या राष्ट्र के। आज देश और समाज को सर्वाधिक खतरा है तो इन्हीं लोगों से जो औरों के भरोसे अच्छा समय आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं और खुद निकम्मों की तरह पड़े रहते हैं। समय केे साथ चलें और वर्तमान को सुधारने तथा भविष्य को सँवारने में अपनी अहम् भागीदारी निभाएँ।
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