प्रकृति के संगीत को हर क्षितिज तक पहुंचाया, मानव प्रेम के सरताज गायक - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 10 मई 2013

प्रकृति के संगीत को हर क्षितिज तक पहुंचाया, मानव प्रेम के सरताज गायक


महामानव विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ से भला कौन अपरिचित होगा। देश-दुनिया भर में अपनी अदभुत एवं विलक्षण प्रतिभा से करोड़ों लोगों के हृदय पर राज करने वाले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उन सभी प्रतिभाओं में शीर्षस्थ रहे जो महापुरुषों और दैव पुरुषों की पहचान मानी जाती है।

ठाकुर दा से बने टैगोर

रवीन्द्रनाथ का जन्म 7 मई सन् 1861 ई. को कोलकाता के एक प्रसिद्ध ठाकुर परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज बंगाल के जमींदार बनर्जी ब्राह्मण थे जिन्हें उनके गांव के लोग ‘ठाकुर दा‘ कहते थे और उसी ‘ठाकुर दा‘ का अंग्रेजी उच्चारण टैगोर हो गया। ठाकुर परिवार उन्नीसवीं शताब्दी से ही अपने कला प्रेम और साहित्यानुराग के कारण प्रसिद्ध रहा है। बालक रवीन्द्र के पितामह श्री द्वारिकानाथ ठाकुर तथा उनके पिता श्री देवेन्द्रनाथ राजा राम मोहनराय द्वारा स्थापित ‘ब्रह्म समाज’ के प्रमुख कार्यकत्र्ता थे।

पिता से पायी व्यक्तित्व विकास की प्रेरणा

रवीन्द्रनाथ की माता का नाम शारदा देवी था जिनका स्वर्गवास रवीन्द्र के बाल्यकाल में ही हो गया था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा के संस्कार पिता के संरक्षण में निर्मित हुए। पिता की आध्यात्मिकता, प्रार्थना, एकान्तनिष्ठा तथा ध्यान-धारणा आदि क्रियाओं ने बालक रवीन्द्र के मानस को आकृष्ट किया। जिसके फलस्वरूप वे कालान्तर में इन गुणों का विकास करने में समर्थ हुए। विद्याध्ययन के लिए उन्हें ‘ऑरियण्टल सेमिनार‘ और उसके बाद नॉर्मल स्कूल में भेजा गया।

प्रकृति ने जगाया आध्यात्मिक स्पंदन

उन्होंने बचपन में अपने पिता के साथ भारत के विभिन्न इलाकों का भ्रमण किया और हिमालय की सुरम्य एवं रहस्यमयी वादियों एवं गांवों की कमनीयता ने उनकी आध्यात्मिक भावना को संस्पर्श किया। सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने ‘पयार‘ छंद में कुछ काव्यांश लिखे। काव्य रचना के नियमों से उन्हें ज्योति प्रकाश के रूप में पद्य रचनाओं के मार्गदर्शन से परिचय करवाया। थोड़े समय पश्चात स्कूल में रवीन्द्र एक कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गये।

काव्य और कथा साहित्य में दिखाया कमाल

सन् 1873 ई0 में उनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ और इसी वर्ष उन्हाेंने ‘पृथ्वीराज पराजय‘ नामक नाटक की रचना की। सन् 1874 ई. में शेक्सपियर के मशहूर नाटक ‘मैकबैथ‘ का अनुवाद कियाऔर वे काव्य रचना तथा कथा साहित्य के प्रणयन की दिशा में उन्मुख हुए। सन् 1876 में रवीन्द्र ने बड़े भाई सत्येन्द्र के साथ यूरोप की यात्रा की। कुछ समय तक ब्राइटन स्कूल में पढ़ने के बाद वे लंदन विश्व विद्यालय में भर्ती हुए, लेकिन वहां जीवन के आनन्दमय अनुभव प्राप्त न होने के कारण वे भारत लौट आये। नौ दिसम्बर सन् 1883 में उनका विवाह प्रसिद्ध लेखक रमेशदत्त की पुत्री मृणालिनी देवी के साथ हुआ। सन् 1901 में उन्होंने दो विद्यार्थियाें को लेकर  ‘शांति- निकेतन‘ की स्थापना कर आदर्श शिक्षा का शुभारम्भ किया।

गीतांजलि पर मिला नोबेल पुरस्कार

सन् 1905 में रवीन्द्र नाथ ने बंगाल में बंग-भंग विरोधी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। सन् 1909 में वे पुनः इंगलैंड गए। वहां उन्हाेंने अपनी कृति ‘गीतांजलि‘ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्हें 23 नवम्बर 1913 को गीतांजलि पर साहित्य का सर्वोच्च नोबेल पुरस्कार मिला जिसमें एक लाख बीस हजार रुपये की राशि प्रदान की गई। उन्होंने यह सम्पूर्ण धनराशि शांति-निकेतन के हितार्थ अर्पित कर दी।

शांति निकेतन को मिली वैश्विक शोहरत

उनकी लगन तथा साधना ने ‘शांति-निकेतन‘ को विश्वव्यापी शोहरत दिलवाई तथा वहाँ के उन्मुक्त परिवेश ने साहित्य, कला और संस्कृति के विकास में शिक्षा का जो आदर्श स्वरूप प्रस्तुत किया है, वह राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है। आज यह विश्वविद्यालय देश के सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालयाें में से एक है। इसके निर्माण के पीछे कवीन्द्र रवीन्द्र के तप और त्याग का आदर्श जीवन प्रतिबिम्बित होता है।

राष्ट्रीय गान के रचयिता

रवीन्द्र नाथ ने 1911 में ‘जन गण मन अधिनायक जय हे भारत-भाग्य विधाता‘ शीर्षक राष्ट्रीय गान लिखा। जो कांगे्रस के 26वें वार्षिक अधिवेशन में गाया गया एवं जिसे आज देश में राष्ट्रीय गान का गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। स्वदेश प्रेम के कारण उन्हाेंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में तत्कालीन वायसराय को एक पत्र लिखकर अपनी ‘सर‘ की उपाधि लौटा दी।

साहित्य, सेवा और देशभक्ति का त्रिवेणी प्रवाह

रवीन्द्रनाथ के जीवन में साहित्य सेवा, राष्ट्र भक्ति तथा विश्वभावना का अद्भुत त्रिवेणी-संगम था। उनकी बहुमुखी प्रतिभा द्वारा जिस उच्च कोटि के साहित्य की रचना हुई, उसमें काव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध तथा आलोचना की विधाएं प्रमुख हैं। अपने अध्ययन, चिंतन-मनन के द्वारा उन्हाेंने जीवन की जो अनुभूतियाँ पायीं गई, वे उनकी कृतियाें के रूप में विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर के रूप में अविस्मरणीय स्थान पा चुकी हैं। उनकी कहानियाें में ‘काबुलीवाला‘, उपन्यासों में ‘गोरा‘, गद्य निबन्धाें में ‘जीवनस्मृति‘ और ‘साधना‘, नाटकों में ‘डाकघर‘ और ‘चित्रांगदा‘ कविताओं में ‘चयनिका‘ और ‘गीताजंलि‘ विशेष ख्याति प्राप्त रचनाएँ हैं। इनके अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में प्रकाशित हो चुके है।

दुनिया को दी नई रोशनी

उन्हें बंगला और अंग्रेजी भाषा में साहित्य रचना करने का समान अधिकार था। संगीत व चित्रकला में भी उन्हें विशेष महारत हासिल थी। महात्मा गांधी जैसे विश्व प्रसिद्ध नेता उनके प्रति श्रद्धावनत थे तथा उन्हें गुरुदेव की पदवी से सम्बोधित करते थे। 31 जनवरी 1939 को रवीन्द्रनाथ ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथों शांति-निकेतन के ‘हिन्दी भवन‘ का उद्घाटन करवाया। 14 अप्रैल सन 1941 को उनकी 81 वीं वर्षगांठ मनाई गई।  सात अगस्त 1941 को उनकी महान आत्मा भौतिक शरीर का त्याग कर परमतत्व में विलीन हो गई । आज वे शरीर के पंचभूत-तत्वों के रूप में मौजूद नहीं है लेकिन उनके कार्य तथा सद्गुण सदैव चिरस्मरणीय रहेंगे। वे एक कुशल कवि, श्रेष्ठ कथाकार, उन्यासकार, और सफल नाटककार होने के साथ-साथ उच्च कोटि के संगीतज्ञ, चित्रकार, पत्रकार, अध्यापक, वक्ता तथा अभिनेता थे।

कृतज्ञ है पूरी दुनिया

उनकी कला और प्रतिभा विश्व मानवता के लिए कल्याण एवं प्रेरणा की निधि बनकर अमर हो गई है। उन्होंने अपने साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में न केवल भारत का मस्तक गर्व से ऊँचा किया बल्कि विश्व साहित्याकाश में भी अपनी कीर्तिपताका का परचम फहराया।






(अनिता महेचा )
कलाकार कॉलोनी,
जैसलमेर-345001

  

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