सर्वधर्म समभाव और सहिष्णुता की नीति हमारे राष्ट्र की पहचान जरूर हैं किंतु हमारी विदेष नीति को सषक्त करने में यदि कोई भी तत्व आड़े आये तो पुनः विचार करना लाजिमी है। पिछले लम्बे अंतराल से भारत अपनी विदेष नीति के बतौर जाना जाता रहा है जिसके कारण इसने पष्चिम एषिया में शांति और एकता स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है चाहे वह अन्य पड़ौसी देषों को दी जाने वाली आर्थिक मदद ही क्यों न हो भारत प्राकृतिक प्रकोपों और विकट स्थिति मंे उन्हें मदद करने में कभी पीछे नहीं रहा है। लेकिन यही नीति अब कुछ बदलाव महसूस कर रही है क्योंकि हमारी वार्ताओं और ढुलमुल रवैये को पड़ौसी और मित्र राष्ट्रों ने मजाक बनाकर रख दिया है क्योंकि हाल ही में पाकिस्तान और चीन ने ये जता दिया कि भारत को वह मिलकर परेषान करते रहेंगे। ज्ञात रहे कि पाकिस्तान की ओर से भारत के कष्मीर के पुंछ जिले में पेट्रोलिंग कर रहे दो भारतीय जवानों को नियंत्रण रेखा के पास मध्य जनवरी में मार दिया गया जिनके शव बिना सिर के बरामद किये गये। ये भी ज्ञात रहे कि चीन भी समय समय पर भारतीय सीमाओं को उल्लंघन करता आया है और वर्तमान में स्थिति यह रही कि हमारी विदेष नीति को आघात पंहुचा और पष्चिम एषिया सहित समस्त विष्व में भारतीय विदेष नीति के जानकारों ने अफसोस जताया। यही नहीं भारत के नागरिक सरबजीत को बिना जुर्म कैद में रखा और जुर्म साबित न कर पाने के भय से कैदियों के हाथों मरवा दिया गया।
यदि वर्तमान में की गई भूलों को सुधारकर दलगत राजनीति और कुर्सी बचाने की नीति से परे जब नेता सोचने लग जाएं तभी संभव है कि खोया हुआ सम्मान लौटाया जा सकता है। क्या शहीद की विधवा को उसके पति का सिर मिल सका ? क्या हमने कई दिनों तक चीनियों का अपनी सीमा मेें लौट जाने का इंतजार नहीं किया ? क्या हमने कभी किसी को शेर सी दहाड़ में ललकारा ? नहीं ! ये विडंबना ही समझियें कि जिस देष को वीरों ने अपने रक्त से सींचा है वहीं पर विदेषी ताकतें अपनी गंदी नजरें गड़ाये बैठी हैं और हम कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं बावजूद इसके कि हमने परमाणु शक्ति सम्पन्न होते हुए भी चीन को जवाब नहीं दिया कि जो वो कर रहा है वो बर्दाष्त नहीं किया जायेगा। क्यों हमारे सैनिकों को आदेष दिये गये कि अपनी सीमा से विदेषियों को खदेड़ दिया जाए। कारगिल की लड़ाई को ही याद कर लिजीए क्यों भूल जाते हैं हम कि अमरीका जो कि भारत पर परमाणु निषेध के लिए आमादा था भारत ने परीक्षण करके विष्व में अपनी धाक स्थापित की थी और बाद में 13 मई 1998 को संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि भारतीय परमाणु परीक्षण अनुचित थे। वे स्पष्ट रूप से अपने क्षेत्र में एक खतरनाक नई अस्थिरता बना रहे हैं और एक परिणाम के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका के कानून, के अनुसार मैंने भारत के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। बहुत बाद में बिल क्लिंटन का नजरिया भारत के प्रति बदला था और प्रतिबंध हटा लिए गये । इसलिए कहा गया है कि सच की हमेषा विजय होती है ।
हम चाहे 9/11 को चाहे 26/11 को आतंकवाद के रूप में याद करें पड़ौसी मुल्क या जो कोई भी नापाक इरादे रखता हो, शांति के मार्ग में जो कोई भी आड़े आये या जो कोई भी आतंकवाद फैलाए उन्हें सबक सिखाने के लिए भारत को अपनी विदेष नीति और अपनी सामरिक क्षमता को विषेष रूप से प्रयोग करना होगा और राजनीति नहीं करते हुए देषभक्ति का जौहर दिखाना होगा । अन्यथा चाहे हम कितने ही परीक्षण कर लें और चाहे कितने ही सामरिक क्षमताओं के प्रदर्षन हेतु कार्यक्रम चलाएं वे नाकाफी ही रहेंगे। कहना ना होगा कि यदि यही हाल रहे तो भारत के लिए चीन और पाकिस्तान मिलकर आने वाले समय में एक होकर बड़ी समस्या खड़ी कर सकते हैं दूसरी सबसे बड़ी बात मैं कहना चाहूंगा कि चीन की ताकत बढ़ रही है उसके सस्ते इलैक्ट्राॅनिक्स और उत्पादों के कारण जिसका निर्यात वह भारत को बहुत बड़े रूप में करता है जिसमें गुणवत्ता तो दूर की बात रही स्थिरता की कमी रहती है बावजूद इसके मुनाफा कमाने के लिए निर्यात होता रहता है । गौर करने वाली बात यह है कि पिछले कुूछ समय से कई चीनी उत्पादों को उनके खराब गुणवत्ता के कारण कई देषों ने प्रतिबंधित कर रखा है फिर भारत में ये धडल्ले से क्यों चल रहे हैं ? यदि आर्थिक तौर पर चीन की शक्ति को कम करना है तो हमें प्रत्येक क्षेत्र में चीनी उत्पादों को त्यागना होगा साथ ही साथ भारत के साथ किए गये हर दुर्रव्यवहार चाहे वह सीमा पर हो या सरबजीत जैसे बेगुनाह इंसानों का कत्ल तीखी और स्थिर प्रतिक्रिया विष्व मंच एवं संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष रखनी होगी ताकि आने वाले समय में भारत में सुरक्षा को सुनिष्चित किया जा सके और पष्चिम एषिया में शांति बहाली तथा विकास की ओर कदम उठाया जा सकेे।
जैसलमेर

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