आज जो महल खड़े हैं, जो सुनहरा परिवेश है, सुकून भरी हवाएँ हैं और वह सब कुछ जो हमारे आस-पास या हमारा है उन सभी के पीछे श्रम की ताकत छिपी है। उस श्रम की ताकत जिसे नींव के रूप में भी सम्मान पाने के लिए तरसना पड़ता है और कंगूरों की वाहवाही होने लगती है। पालकियों वाले लोगों की दृष्टि सामने होती है, वह चकाचौंध और सुनहरे बाग-बगीचे तलाशती है और बेचारे कहार नंगे पाँव चलते हुए कभी गर्म रेत और कभी कंकड़-पत्थरों की बिछी हुई चादर पर चलते हुए कराहते हुए, लहूलुहान होकर पालकियों को मुकाम तक पहुंचाने में दिन-रात लगे रहते हैं। यों भी बेचारे कहारों के भाग्य में चलना और पालकियों का परिवहन करते हुए पालकों को खुश करते हुए उनकी अभीप्सित यात्रा में मददगार बनना मात्र लिखा है। कभी हम किसी के कहार बन जाते हैं और कभी दूसरे। यह श्रृंखला सदियों से चली आ रही है। पालकियों में विराजमानों को इस बात से कभी कोई मतलब नहीं होता कि वे कौन हैं जो पालकियों को हौले-हौले उठाकर उन्हें ढो रहे हैं और वह भी इस गंभीरता और शालीनता के साथ की पालकी पसंदों के पेट का पानी भी न हिलने पाए और आराम में कोई खलल भी न पड़े।
पालकी वालों और कहारों के बीच का अंतर पाटने के लिए युगों से प्रयास हो रहे हैं मगर ऎसा आज तक नहीं हो पाया है। पालकी वालों और कहारों के बीच की बढ़ती ही जा रही दूरियों ने अंतिम आदमी की आवाज को कभी ऊपर तक पहुंचने ही नहीं दिया, उधर पालकी में आराम फरमाने वाले भी बाहर की दुनिया से इतने बेखबर हैं कि उन्हें हमेशा शिखरों का संगीत सुनने की आदत पड़ी हुई है, घाटियों का क्रंदन और बीहड़ों की आवाज सुनना उन्हें कभी रास नहीं आता। न कभी वे इसके लिए जतन करते हैं और न ऎसा कोई अवसर ही आ पाता है कि दोनों धुुवोें के बीच कोई सार्थक संवाद हो पाए। आज नहीं, बरसों और दशकों, शताब्दियों से यह सब कुछ होता रहा है। कुछ बिरले कुछ-कुछ दशकों बाद पैदा होते हैं जो श्रम की ताकत पहचानते हैं और श्रमिक के मन की थाह पाते हुए ऎसा कुछ कर जाते हैं कि अंतिम पंक्ति में बैठे आदमी के लिए सुकून पाने का कोई बड़ा अवसर सामने आ ही जाता है। लेकिन ज्यादातर समय शिखरों की संप्रभुता सर चढ़कर बोलने लगती है और उन्हें लगता है कि जो कुछ जमाने में हो रहा है वह उन्हीं के लिए हो रहा है और यह सब कुछ वे अपने भाग्य में लिखवा कर लाएं हैं। और इसीलिए कोई इन शिखरों, शिखरस्थों अथवा शिखरों को अपनी चँवरों से हवाएं करने वाले सेवकों को भ्रमित होकर दैवदूत मान बैठता है और कोई अपनी मजबूरी।
आजकल सभी लोगों की अपनी-अपनी ढेरों मजबूरियां हैं और ऎसे में मजदूरियां गौण होती जा रही हैं। संसार में अब दो तरह के लोग हमारे सामने हैं। एक वे बहुसंख्यक हैं जो दिन-रात मेहनत करते हैं, पसीने की कमाई खाते हैं और विपन्नता के बावजूद बड़ी मस्ती में जीते हैंंं। दूसरी किस्म में वे सारे बीमारु लोग शामिल हो गए हैं जो अपने हाथ से एक गिलास पानी नहीं पी सकते, हराम की खाने-पीने की आदत के मारे लाचार हैं, खुद के हाथों कुछ भी श्रम नहीं कर सकते, यहाँ तक की रोटी पचाने भर के लिए भी उन्हें मॉर्निंग या इवनिंग वॉक करनी पड़ती है वरना कई बीमारियां उन पर हावी हो जाती हैं। मोटी-मोटी तनख्वाहों, एसी कारों और आलीशान एयरकण्डीशण्ड बंगलों को ही अपना संसार समझने वाले इन लोगों से शेष सारे भोग-विलास हो सकते हैं। एक नहीं हो पाता तो वह है श्रम। यही वजह है कि दुनिया का कोई सा काम हो, इनके पसीने की गंध किसी को कभी नहीं आ सकती। आए भी कैसे, कुछ परिश्रम करें तो पसीना आए। नौकर-चाकरों और सुरक्षा गार्डों के बीच नज़रबंद इन लोगों की जिन्दगी और आम आदमी की जिन्दगी में यही अंतर है कि ये बड़े लोग चाहते हुए भी श्रम नहीं कर पाते।
दूसरी ओर वह बहुत बड़ा तबका है जो अपार श्रम करने के बावजूद कुछ प्राप्त नहीं कर पाता। यहाँ तक कि सराहना भी नहीं। आज का श्रम दिवस श्रमेव जयते के मूल मंत्र को आत्मसात करने का अवसर है जब हमें यह संकल्प लेना होगा कि हर श्रम करने वाला हमारे देश और समाज की नींव है, वे नहीं होते तो हमें उठाने, तोकने, पालकियों में ले जाने वाला और अन्ततः मरघट का सफर कराने वाला भी नसीब नहीं होता। उस हर आदमी के श्रम को सराहें जो दिन-रात मजदूरी कर जिजीविषा के साथ अपने कत्र्तव्य कर्म में लगा हुआ है। एसी चैम्बरों में बैठने और एसी कारों में सफर को ही जिन्दगी मान बैठे हम सभी के लिए श्रम दिवस यही कहता है कि श्रम से जी न चुराएं वरना रोटी पचाने तक के लिए कम से कम प्रातः या सायंकालीन भ्रमण से हम कभी नहीं बच पाएंगे। इससे तो अच्छा है कि श्रम की महत्ता को आज और अभी से ही क्यों न स्वीकारें। स्वीकारें तो हमारा अपना भला ही होने वाला है वरना किस में हिम्मत है कि हमें श्रम करने को कह भी सके। फिर आजकल हर बड़े शहर-कस्बों के अस्पतालों में बने आईसीयू हमारे अलावा किसके काम आएंगे...।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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