सदा से कहा जाता रहा है कि जमाना युवाओं से ही है। जिस ओर उनके कदम चलते हैं, जमाना उसी ओर बढ़ता है। सो, सरकार ने ग्रामीण विकास में अपना हाथ मजबूत करने को उनकी ओर हाथ बढ़ाया है। प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप योजना के बहाने हुनरमंद, और हौसलों से भरे नौजवानों की फौज समूचे देश में खड़ी की गई है। झारखंड में भी पीएमआरडीएफ के युवा साथी ग्रामीण विकास का नया आयाम और रेखा खींचने में अपनी भूमिका तैयार कर रहे हैं। ऐसे फेलो अपना कौशल दिखाते हुए सरकारी कामकाज में तरुणाई की ताजा हवा लाते दिखने लगे हैं। सर्ड, झारखंड इसमें अपनी जिम्मेदारी बखूबी उठा रहा है।
विकास की बाट जोहते गांव, माटी तक पहुंच का प्रयास
देश की आजादी के 66 बरस बीतने के बावजूद देश के कई हिस्से अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ सके हैं। नक्सलवाद के कारण कई राज्यों के कुछ जिले और गांव-गांव आज भी विकास की बाट जोह रहे हैं। इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने आन्ध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में स्थित अनेक जिलों को माओवादी उग्रवाद से प्रभावित जिलों के रूप में चिन्हित किया है। इन सभी जिलों की कुछ समान विशेषताएं है। 50 प्रतिशत से अधिक आबादी का भीषण गरीबी से प्रभावित होना, अधिक भू-भाग पर जंगल होना, आदिवासी और दलित आबादी का अधिक अनुपात तथा वहां विकास के प्रतिमानों का अभाव उन्हें पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि (बी. आर. जी. एफ.) के अंदर खड़ा करती है। भारत सरकार ने इन जिलों में समेकित कार्य योजना (आई.ए.पी.) नामक विशेष अभियान शुरू किया है। प्रशासनिक शैली में ये जिले आईएपी जिले कहलाते हैं।
माना जाता है कि हथियारबंद नक्सल समूहोें के प्रभाव के विस्तार का एक कारण आइएपी क्षेत्रों के विकास में कमी होना है। योजना आयोग के एक विशेषज्ञ दल ने अपनी 2008 की रिपोर्ट ‘‘चरमपंथ प्रभावित क्षेत्रों में विकास की चुनौतियां‘‘ में यह उजागर किया है कि नक्सली आंदोलन को जनता का सहयोग और समर्थन इसलिए मिल रहा है क्योंकि नक्सली दीन-हीन गरीबों की समस्याओं और जरूरतों को पूरा करते रहते हैं। इस विषय पर सरकार की समझ बढ़ी। उसके अनुसार नक्सली चरमपंथ को विकास का विशेष अभियान चलाकर तथा स्थानीय शासन को अधिक उदार हितकारी और विकासकारी बना कर ही चुनौती दी जा सकती है। लेकिन सुधार की प्रक्रिया में एक बड़ी समस्या स्थानीय जिला प्रशासन का सक्षम न होना है। इस विकास प्रक्रिया को उत्प्रेरित करने व अनुकूल परिस्थितियों के लिए संगत कार्रवाई करने पर उसने काम षुरू किया है। इसी को लक्षित करते 13 सितंबर, 2011 को, प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास शिक्षावृत्ति नाम की योजना का ग्रामीण विकास मंत्री ने प्रधानमंत्री के उपस्थिति में ऐलान किया था। इसके अनुसार समेकित कार्ययोजना जिलों (आई.ए.पी.) में जिला प्रशासन के तहत युवा उद्यमियों को तैनात किया गया है। ये फेलो साथी स्थानीय समुदायों, उनकी सामाजिक सांस्कृतिक और राजनैतिक ताने-बाने, स्थानीय अर्थव्यवस्था, व उसके सम्पर्क सूत्रों एवं राजनैतिक एवं प्रशासनिक मशीनरी के साथ उनके संबंधों को गहराई से समझने का प्रयास कर रहे हैं। नक्सलग्रस्त क्षेत्रों में गांव-गांव तक पहुंचकर उनकी समस्याओं, जरूरतों की पहचान भी करने में लगे हैं। कहें कि गांव और माटी को समझने-जानने की उनकी कोषिष है। समस्याओं को समझते हुए उनके लिए परिस्थितिजन्य, व्यावहारिक और आदर्ष नीतियां बनाने में उनकी आवाज को प्रमुखता देनी है।
नासूर बनी है ‘जंगल की सरकार’
झारखंड अपने स्थापना काल से ही नक्सलवाद का नासूर झेल रहा है। अब तक सैकड़ों पुलिसकर्मी और आम लोग नक्सलियों के हाथों मारे जा चुके हैं। राज्य के 24 में से 22 जिलों में माओवादियों, नक्सलियों का आतंक है। यहां तक कि राजधानी रांची तक उनके निषाने पर आ चुकी है। राज्य के किसी भी हिस्से में ‘जंगल की सरकार’ की अनुमति के बिना कोई विकासपरक कार्य सहजता से नहीं हो पाता। विकास योजनाओं में उनकी हिस्सेदारी तय है। बगैर लेवी दिए कोई भी कार्य संभव नहीं। विरोध करने पर बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। नक्सलियों के खिलाफ तनकर खड़े होने वाले तीन बड़े राजनीतिज्ञों की हत्या कर चुके हैं। 16 जनवरी, 2005 को माओवादियों ने माले के विधायक महेंद्र सिंह की हत्या कर दी थी। झामुमो के सांसद सुनील महतो को भी उन्होंने मार डाला था। नौ जुलाई 2008 को जदयू विधायक रमेष सिंह मुंडा की हत्या भाकपा माओवादियों ने कर दी थी। इस कड़ी में झाविमो प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे को भी षामिल किया जा सकता है। यहां तक बाबूलाल मरांडी, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुदेष महतो, सुधीर महतो, पूर्व विधायक प्रकाष राम व रवींद्र राय भी नक्सलियों की हिट लिस्ट में हैं। पुलिस के बड़े अफसर भी उनके निषाने पर रहे हैं। वर्ष 2000 में नक्सलियों ने लोहरदगा के एसपी अजय सिंह की हत्या कर दी थी। 2001 में गढ़वा के डीएसपी अमलेष कुमार को निषाना बनाया गया था। 2002 में पलामू के छतरपुर में लैंड माइन ब्लास्ट कर डीएसपी देवेंद्र कुमार सहित एक इंस्पेक्टर की हत्या कर दी थी। 2006 में चतरा में डीएसपी विनय भारती को मार दिया गया था। 2006 में ही बुंडू के डीएसपी प्रमोद कुमार की हत्या कर दी थी। 2 जुलाई 2013 को पाकुड़ के एसपी अमरजीत बलिहार को नक्सलियों ने पांच सिपाहियों के साथ मार डाला। दरअसल नक्सली समस्या महज झारखंड भर की नहीं है। रेड काॅरिडोर का प्रसार देष के नौ राज्यों तक है जिसमें करीब 50 करोड़ आबादी निवास करती है। और जंगल की सरकार राज के चलते विकास योजनाएं धरातल तक ले जाने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पीएमआरडीएफ फेलो के बहाने केंद्र सरकार इन चुनौतियों से निपटने की दूरगामी कोषिष में लग गई है।
झारखंड में नक्सली घटनाएं और प्रभावित लोग:
वर्ष घटना पुलिस मरे आम लोग नक्सली
2001 ---- 53 29 94
2002 ---- 69 20 43
2003 342 16 21 101
2004 379 41 20 128
2005 312 27 07 92
2006 310 43 20 81
2007 482 08 13 149
2008 452 37 57 149
2009 510 48 138 40
2010 301 17 70 35
2011 505 32 130 72
2012 479 26 169 31
ग्रामीण विकास में हमराही
पीएमआरडीएफ फेलो झारखंड जैसे नक्सल प्रभावित राज्य में ग्रामीण विकास में सरकार के महत्वपूर्ण हमराही हो सकते हैं। सर्ड निदेषक श्री आरपी सिंह बताते हैं कि हमारे राज्य में 17 जिलों को आई.ए.पी जिलों के तौर पर चिह्नित किया गया है। इन जिलों में 33 होनहार और हुनरमंद युवा फेलो कार्यरत हैं। राज्य के नवनिर्माण में ये फेलो अपनी बड़ी उपयोगिता साबित करेंगे। केंद्र सरकार की यह योजना युवाओं के लिए ना सिर्फ स्वर्णिम अवसर है बल्कि इस बहाने स्थानीय कुषल और कर्मठ नौजवानों को जिला स्तरीय नेतृत्व को निर्णयकारी मदद देने और विकास सुधार प्रक्रिया में अपनी क्षमता दिखाने का भी अवसर है। पीएमआरडीएफ कार्यक्रम के समन्वयक एस. दास बताते हैं कि सभी फेलो अपने-अपने विषय और क्षेत्र के विषेषज्ञ हैं। मैनेजमेंट, लाॅ, आइटी, एकाउंट्स, इकोनाॅमिक्स और ऐसे ही अन्य विषयों में पीएमआरडीएफ फेलो निपुण हैं। विकासपरक मुद्दों को बुनियादी तौर पर समझना और उसकी राह में आ रही बाधाओं, चुनौतियों को समझने में वे बेहतर होते हैं। साथ ही उपयोगी और सहायक नीति निर्धारण में वे स्थानीय प्रषासन को ठोस सुझाव दे सकते हैं। वे इसके लिए शोध अध्ययन करना, सर्वे कार्य, मूल्यांकन और ऐसे ही अन्य वैज्ञानिक क्रियाओं का प्रयोग प्रभावी तरीके से करेंगे।
राजीव रंजन, गुमला जिले में पीएमआरडीएफ के फेलो के तौर पर कार्यरत हैं। एक्सआइएसएस के पीजीडीआरीडी के छात्र रहे हैं। सोषल साइंस के क्षेत्र में एक साल का तजुर्बा भी इनके पास है। राजीव कहते हैं कि पीएमआरडीएफ प्रोग्राम ने उनके जैसे कई साथियों को एक प्लेटफाॅर्म दिया है। ग्रामीण विकास के आयामों को समझने, जिला प्रषासन के साथ कार्य करने और खुद को निखारने का मौका हमें मिला है। यह पीएमआरडीएफ फेलो साथियों के लिए सुनहरा मौका है। राजीव बताते हैं कि वे और उनके साथी श्रीकांत पुरवार गुमला के 60 प्रखंडों में लगातार घुम रहे हैं। अभी एक साल ही हुआ है और कई बुनियादी सवालों को समझने और उनके समाधान ढूंढने में हमें सफलता मिली है। पालकोट में आधार कार्ड योजना को लागू करने में हमें उपलब्धि मिली है। मनरेगा, इंदिरा आवास, एनआरएलएम, एनआरएचएम, स्वास्थ्य, षिक्षा, एनआरडीडब्ल्यूपी, आईडब्ल्यूएमपी तथा आईएपी के बेहतर संचालन में सहयोग, इनकी निगरानी और उनके परिणामों का मूल्यांकन, बजट परिव्यय तथा धन के उपयोग से जुड़े आंकड़ों का संकलन करने तथा स्थानीय इलाके में स्वैच्छिक सहयोग का ताना-बाना तैयार करने में भी हम अपने दायित्वों को निभाने में लगे हैं। राजीव के अनुसार जब उन्होंने और उनके साथी ने काम करना षुरू किया था तो लोगों का सहयोग अपेक्षाकृत कम मिलता था। पर अब हमारा स्वागत हो रहा है। प्रखंड से लेकर ग्राम स्तर तक लोग अपनी समस्याएं, सुख-दुख हमसे षेयर कर रहे हैं। आज हमें लगता है कि हम भी ग्रामीण विकास के हमराही हैं।
श्री आर.पी सिंह पीएमआरडीएफ फेलो को ग्रामीण विकास के दूत के तौर पर देखते हैं। उनके अनुसार सरकार और पंचायतों के साथ उनका तालमेल जितनी अच्छी तरह बनता जाएगा, जनता और सरकार के बीच सहभागिता और विष्वास का पूल बहाल होगा। श्री सिह का मानना सही है। एक ओर जहां राज्य में विधायिका और विधानसभा कमजोर है, गांव की सरकारें अभी सीखने-समझने की प्रक्रिया में हैं, पीएमआरडीएफ फेलो ग्रामीण विकास में अहम कड़ी साबित होने वाले हैं। पीएमआरडीएफ फेलो के बहाने सरकार को जमीनी तथ्यों, आंकड़ों को समझने में सहूलियत होगी। नए और प्रचलित तौर-तरीकों के बीच सेतू बनेगा। साथ ही नए और रचनात्मक विचारों, ताजे तौर-तरीकों का लाभ सरकार को मिलेगा।
अमित झा
रांची
झारखण्ड

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