सवालों से खीझ जाते हैं प्रदेश के आला अधिकारी, गैरजवाब होने पर दिया धोंस !!
क्या कोई सरकारी अफसर किसी गैर-सरकारी व्यक्ति को सरकार से पत्राचार करने से रोक सकता है? मुल्क के किसी भी कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, लेकिन शायद आईएएस अफसर कानून से भी ऊपर होते हैं। उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (गृह) से जुड़े इस मामले से तो कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है। हाल में ही ऐसा एक आदेश उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (गृह) आर.एम. श्रीवास्तव ने अपने नोट में लखनऊ स्थित सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर के लिए जारी किया।
आरटीआई से प्राप्त सूचना के अनुसार, श्रीवास्तव को ठाकुर द्वारा भेजे दो पत्र इतने नागवार लगे कि उन्होंने नोटशीट में लिख दिया कि नूतन को डीजीपी के माध्यम से परामर्श दे दिया जाए कि वे भविष्य में शासन से पत्राचार नहीं करें। यह अलग बात है कि मुख्य सचिव जावेद उस्मानी प्रमुख सचिव (गृह) की इस बात से सहमत नहीं हुए।
दरअसल, नूतन ने अपने पति आईपीएस अमिताभ ठाकुर के संदर्भों का हवाला देते हुए मुख्य सचिव को दो पत्र भेजे थे जिनमें शासन स्तर पर आईपीएस अधिकारियों के विभागीय जांच और पदोन्नति में कुछ गड़बड़ियों की जांच कराने की बात कही थी। नूतन के मुताबिक, जांच की बात तो दूर, श्रीवास्तव ने उनको ही अवसादग्रस्त बताते हुए पत्राचार की मनाही तक की बात कह दी, वह भी अपने द्वारा नहीं, डीजीपी द्वारा जबकि ना उन्हें ना डीजीपी को ऐसा आदेश करने का कोई विधिक अधिकार है।

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