मैंने पत्नी सहित केदारनाथ एवं बद्रीनाथधाम की के लिए दिनांक 10 जून 2013 का दतिया (म.प्र.) से एवं 11 जून का दिल्ली से हरिद्वार तक का रेलवे आरक्षंण शताव्दी एक्सप्रेस से जाने का तीन माह पूर्व ही करा लिया था। योजना के अनुसार दिनांक 12 या 13 जून को हमें ऋषिकेश से यात्रा प्रारम्भ करना थी और 16 जून के लगभग हम दोनो को केदारनाथ-धाम से वापिस होना चाहिए था। इसके बाद बद्रीनाथ-धाम को रवाना होने का कार्यक्रम था। इस यात्रा हेतु मैं व मेरी पत्नी अति उत्साहित भी थे क्योंकि हम लोगों की यह वहां के लिये पहली यात्रा थी। गत लगभग चार वर्षों से केदारनाथ एवं बद्रीनाथ-धाम पर जाने की उत्कृष्ट इच्छा के बावजूद भी दर्शन करने का संयोग नहीं हो पा रहा था। मन में यह भाव पूर्णरूप से स्थापित हो चुका था कि साक्षात भगवान शिव और विष्णु के दर्शन का आनंद अनुभव योग्य होगा एवं प्रकृति के दर्शन का अवसर तो ऋषिकेश से ही प्रारम्भ हो जावेगा। सुन्दर पहाड़़ी घाटियों पर से मनोहर दृश्य देखने की कल्पना से मैं आनन्दित हो रहा था। मन में यह प्रकट हो रहा था कि केदारनाथ व बद्रीनाथ जी के पवित्र स्थल पर शांति पूर्वक ध्यानस्थ होऊंगा और कुछ समय ध्यान में बैठकर इश्वर के अस्तित्व का साक्षात अनुभव करूंगा। इश्वर भक्ति में लीन होकर एवं स्वयं के निजी अस्तित्व से परे होकर आत्म-तत्व का अनुभव करते हुए परमात्मा के दर्शन का आभास करूंगा।
मैं पेशे से अभिभाषक हूं। दिनांक 08 जून को सुबह 10 बजे कोर्ट जाने के लिए घर से रवाना होने लगा तो मैंने अपनी पत्नी से कहा कि सामान की पैकिंग करना प्रारम्भ कर दो, क्योंकि चलने के लिए सिर्फ दो दिन का ही समय बचा है। इतना कह कर मैं कोर्ट चला गया। पत्नी ने भी उत्साह पूर्वक तैयारी लगाने की बात कही। शाम को जब मैं कोर्ट से बापिस आया तो मैंने पत्नी से पूंछा कि पैकिंग कर ली क्या ? उन्होंने जो जबाव दिया उससे मैं चैंक गया और रोष भी आया। उन्होंने मुझ से कहा ‘‘हमें ऐसा लग रहा है कि भले ही हम चल तो रहे हैं लेकिन वहां से बापिस नहीं आ पायेंगे’’ मैंने उनसे पूछा ‘‘ऐसा क्यों लग रहा है ?’’ उन्होंने जबाव दिया ‘‘पता नही क्यों, ऐसा मन में आ रहा है कि यदि वहां यात्रा पर गए तो हम दोनों में से कोई भी वापिस नहीं आ पायेगा और मैं तो वहीं रह जाऊंगी, आप सोचिये, यदि मुझे वहां कुछ हो गया तो आप स्वयं को और मुझे कैसे सम्हालोगे और आपको यदि कुछ हो गया तो मैं आपको कैसे सम्हालूंगी, कौन किसका, किससे इलाज करायेगा ?’’ यह सुन कर मुझे अच्छा नहीं लगा और उनसे मैंने कहा ‘‘क्या फिजूल की नकारात्मक बातें सोचती रहती हो, यदि तुम साथ नहीं चल सकती हो तो मैं अकेला ही जा रहा हूं’’ यह सुनकर उन्होंने जवाब दिया कि ’’मैं आपको भी अकेले किसी कीमत पर नहीं जाने दूंगी, हम लोग अगली बार चलेंगे, अभी परिवार की बहुत अधिक जिम्मेदारियां सिर पर हैं।’’ उनकी जिद पर मैंने दूसरे दिन दिनांक 09 जून को अपनी यात्रा के रेलवे टिकिटों के रिजर्वेशन निरस्त करा दिए। मैं भी रूखे मन से यह सोचने लगा कि शायद अभी भगवान केदारनाथ और बद्रीनाथ जी का बुलावा नहीं आया है, उन्हीं की इच्छा नहीं होगी कि इस बार मैं उनके द्वार तक पहुंच पाऊं।
जब दिनांक 15 और 16 जून को केदारनाथ व बद्रीनाथ धाम के हादसों की खबर टी.वी. पर हम लोगों ने देखी तो मैंने साक्षात ईश्वर के अस्तित्व का वह आभास किया कि जैसे उस महाशक्ति ने स्वयं टेलीपैथी के माध्यम से हमे संदेश भेजा था कि ’अभी यहां तुम लोग नहीं आओ बहुत हल-चल और हादसे होने वाले हैं।’ मै अपने मन मे ईश्वर से कहने लगा कि ’हे प्रभु, आपने पूर्व से ही अदृश्य होकर होने वाले विनाश के सन्दर्भ मे ऐसा संदेश भेज दिया और परेशानियों से हमे बचा लिया, आपको अपने भक्तों की इतनी चिन्ता रहती है।’ मैं यहां ऐसे किसी अनचाहे उन प्रश्नों का जबाव देना उचित नहीं समझता कि जितने लोग उन हादसों के शिकार हुए, क्या वे ईश्वर के भक्त नहीं थे ? प्रश्न यहां उनके भक्त होने या नहीं होने का नहीं है वल्कि प्रसंग तो उस परब्रम्ह परमात्मा के द्वारा मन के अंदर प्रकट किए गए, उस संदेश का है जिसने मेरे पूर्णतःसुनिश्चित कार्यक्रम को बिना किसी कारण के बदल दिया और आरक्षंण के टिकिट निरस्त करवा दिए। मेरे साथ हुए इस अनुभव से इतना अवश्य है कि वह महा-शक्ति जिसे हम परब्रम्ह परमात्मा अथवा ईश्वर अथवा भगवान अथवा अपने-अपने धर्म और मजहब के आधार पर उसे अपना सब कुछ मानते हैं, जिससे हम संचालित हैं, वह हम से टेलीपैथी के माध्यम से जुड़ जाती है, उसकी ओर से भी इंट्यूशन होता है। ईश्वर ने ही कार्यक्रम निरस्त कराने का भाव मेरी पत्नी के मन में प्रकट किया और होने वाली किसी अप्रिय घटना से हम दोनों को बचा लिया। उस महाशक्ति की दृष्टि से कोई भी व्यक्ति ओझल नहीं है, हर पल प्रत्येक समय उसकी हम पर नजर है।
लेखक- राजेन्द्र तिवारी, अभिभाषक
जिला दतिया म.प्र.
फोन- 07522-238333, 9425116738
ई-मेल : rajendra.rt.tiwari@gmail.com
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