- -कृषि, आखेट और जंगल की जीवनपद्धति ही हर भाव भंगिमा को दर्शाने वाले सूबे के सभी 32 जनजातीय समुदायों की 32 भाषाओं में से 27 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं जबकि पांच बड़ी जनजातीय भाषाओं को केंद्रीय भाषा संस्थान, मैसूर ने देश के बारह संक्रमण काल से गुजर रही भाषाओं की सूची में डाल दिया है
कुमार गौरव, रांची: विशिष्ठ सभ्यता, संस्कृति के नाम पर लगभग 100 वर्ष के संघर्ष के बाद झारखंड राज्य तो अस्तित्व में आया लेकिन इन विशिष्टताओं को पहचान देने वाली जनजातीय भाषाएं विकास की आंधी में कहीं गुम हो गई। झारखंड का गठन हुए एक दशक हो जाने के बावजूद आदिवासियों के द्वारा मांगी गई विकास की स्थितियां जस की तस हैं। सूबे के आदिवासियों की आकांक्षाएं आजतक पूरी नहीं हो पाई है और आदिवासियों को अभी तक उनका सम्मान मिला है। यहां तक कि सूबे में आदिवासी अकादमी का भी गठन नहीं किया गया है। आदिवासी पत्र पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। आज सूबे की छह आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं ये हम नहीं यूनेस्को द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट कह रही हैं। जो 7,000 भाषाओं की सूची हैं। गौरतलब है कि झारखंड सरकार ने नौ आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं को द्वितीय राज्यभाषा का दर्जा दिया है और संताली भाषा भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। बावजूद इसके सूबे में इसे समुचित सम्मान नहीं दिया जा रहा है।
कृषि, आखेट और जंगल की जीवनपद्धति ही हर भाव भंगिमा को दर्शाने वाले सूबे के सभी 32 जनजातीय समुदायों की 32 भाषाओं में से 27 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं जबकि पांच बड़ी जनजातीय भाषाओं को केंद्रीय भाषा संस्थान, मैसूर ने देश के बारह संक्रमण काल से गुजर रही भाषाओं की सूची में डाल दिया है। असुर और बिरहोर जैसी आदिम जनजातीय समुदाय के मातृभाषाएं प्रायः विलुप्ति के कगार पर आ चुकी हैं। भाषा विषेशज्ञों का मानना है कि आदिवासी भाषाएं ज्ञान के भंडार को अपने में समेटे हुए है। जिसका इतिहास करीबन 4,000 साल पुराना है। यदि इस दिशा में प्रयास तेज नहीं हुए तो आने वाले 100 वर्षों में 15 लाख लोगों के द्वारा बोली जाने वाली कुडुख भाषा विलुप्त हो जाएगी। हिंदी को समर्थ बनाने के लिए आदिवासी भाषाओं को बचाना जरुरी है क्योंकि मातृभाषा बचेगी तभी राष्ट्रभाषा की उन्नति होगी। अभी सूबे में सिर्फ नौ आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं की औपचारिक शिक्षा दी जाती हैं। यूनेस्को की महानिदेशक इरीना वोकोवा कहती हैं कि मातृभाषाएं जिनमें कोई भी अपना पहला शब्द बोलता है, वही उनके इतिहास एवं संस्कृति की मूल बुनियाद होती हैं और यह बात सिद्ध भी हो चुकी हैं। स्कूल के शुरुआती दिनांे में ही बच्चे बेहतर ढ़ंग से सीख पाते हैं जिन्हें उनकी मातृभाषाओं में पढ़ाया जाता है।
अमरकंटक में अखिल भारतीय आदिवासी विवि की स्थापना की गई है लेकिन यदि झारखंड की कला, संस्कृति और भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन के लिए भी एक झारखंडी विवि की स्थापना की जाए तो हम अपनी विरासत को बचा सकते हैं। आदिवासी भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन का काम अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें समय पर उठाए गए कदमों से ही अच्छे परिणाम मिलेंगे। ऐसी उम्मीद की जा सकती है। इससे एक ओर जहां सामाजिक प्रतिमानों उचित विवेचना की जा सकेगी वहीं आदिवासियों के द्वारा आदिवासियों के लिए और आदिवासियों के साथ किए जाने वाले कार्यों से आदिवासी समाजों को अत्यंत लाभ प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी भाषाओं में महत्वपूर्ण परंपरागत ज्ञान संरक्षित है। सिंधु घाटी सभ्यता के कई स्थलों सहित अन्य ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई में ऐसे अनेक अभिलेख मिले हैं, जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। कई विद्वानों द्वारा उन्हें आदिवासी भाषाओं से मिलाकर समझने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में इन भाषाओं के लुप्त होने से बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी के लुप्त होने का भी खतरा पैदा हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार जनजातीय भाषाओं का मौखिक साहित्य लिखित साहित्य से काफी समृद्ध है लेकिन भाषाओं को जीवित रखने के लिए वर्तमान समय के अनुसार अब उन्हें लिखित साहित्य का रुप देना आवश्यक है लेकिन इस ओर स्थानीय सरकारों का रवैया भी काफी उपेक्षापूर्ण रहा है। आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में संताल ही एकमात्र झारखंडी जनजातीय भाषा है जबकि कई ऐसी भाषाएं इस सूची में शामिल हैं। जिन्हें बोलने वालों की संख्या सूबे की अन्य जनजातीय भाषाओं से भी काफी कम है। कई राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों ने एक से अधिक भाषाओं को राजभाषा का दर्जा दिया है। सूबे में भी ऐसा किया जाना चाहिए। जनजातीय साहित्य के प्रकाशन की व्यवस्था भी सरकार के स्तर पर की जानी चाहिए और इन भाषाओं में साहित्य सृजन को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र संघ की सांस्कृतिक परिषद की रिपोर्ट के अनुसार इस सदी में दुनिया के सात हजार भाषाओं में से 6300 भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए झारखंड की आदिवासी भाषाओं को बचाना आवश्यक हो गया है। सूबे में सादरी (नागपुरी), कुरमाली, खोरठा और पंचपरगनिया चार प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएं हैं। इसमें सादरी नागवंशी राजाओं के संरक्षण के कारण सूबे के आदिवासी और गैर आदिवासी समुदायों के बीच समान रुप से लोकप्रिय है। इसने जहां सूबे के सदान और आदिवासी समुदायों को एक सूत्र में बांधे रखा है वहीं सूबे की संपर्क भाषा बनकर भी उभरी है। इन भाषाओं की भी पर्याप्त वैज्ञानिकता के बावजूद वे बाजार की लड़ाई हारती दिख रही हैं। अगर गौर करें तो यूनेस्को को हमारी भाषाओं की चिंता है लेकिन सूबाई सरकार को नहीं। भारतीय संविधान की अनुच्छेद 350ए में यह प्रावधान किया गया है कि यह राज्य का दायित्व है कि छात्रों को उनकी मातृभाषा में ही प्रारंभिक शिक्षा दी जाए। फिर भी यह सवाल लोगों के जेहन में लगातार उठता है कि आखिर कब उन्हें मान सम्मान मिलेगा ? आदिवासी भाषाएं विलुप्त हो जाएगी तब, या फिर झारखंड के आदिवासी और इनकी आने वाली पीढ़ी अपनी भाशा से दूर हो जाएंगे तब ?

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