आपदा के बाद उच्च न्यायालय के आदेशों ने उड़ाई सरकार की नींद
देहरादून, 9 जुलाई। नैनीताल उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले कि ‘‘नदी की जमीनों पर बने भवनों को सरकार 60 दिन के भीतर ध्वस्त करे और इस तरह की जमीनों में किए गए आवंटनों को सरकार सात दिनों के भीतर ध्वस्त करे‘‘ पर प्रदेश सरकार कि मुसीबतें बढ़ गई हैं, क्योंकि राज्य बनने के बाद प्रदेश में काबिज भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने जहां तमाम सरकारी भवन नदी-नालों में बनवा दिए, वहीं इन सरकारों ने नदी-नालों की जमीनों को खैरात की तरह तमाम ऐसे लोगों को आवंटित कर दी, जो उंची पहुंच वाले थे। प्रदेश में आई आपदा के बाद नैनीताल उच्च न्यायालय का यह फैसला मुख्य न्यायधीश बरीन घोष और न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की संयुक्त पीठ ने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट में प्रस्तुत बिना बहुगुणा की जनहित याचिका पर दिया है। बिना बहुगुणा की ओर से सय्यद नदीम ने अधिवक्ता के रूप में इस प्रकरण की पैरवी की। सरकार को दिए अपने आदेश में बैंच ने सरकार द्वारा नदी-नालों में भवन बनाने को लेकर दी गई स्वीकृति को सात दिन के भीतर निरस्त करने के आदेश दिए हैं और बैंच ने ऐसे तमाम निर्माणों को 60 दिन के भीतर ध्वस्त करने के निर्देश भी सरकार को दिए हैं और यह कहा है कि नदी को उसके स्वरूप में वापस लौटाया जाए, वहीं न्यायमूर्तियों ने यह भी आदेश दिया है कि प्रदेश सरकार 16 हफ्तों के भीतर उच्च न्यायालय में इन आदेशों के परिपालन के संबंधी शपथ पत्र भी न्यायालय में प्रस्तुत करें। उल्लेखनीय है कि यह निर्णय बिना बहुगुणा की जनहित याचिका संख्या 233/2008 के संदर्भ दिया गया है। उच्च न्यायालय के इन आदेशों के बाद प्रदेश सरकार सकते में है और हाईकोर्ट द्वारा निर्देशित आदेशों के पालन को लेकर समयसीमा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। मामले में हाईकोर्ट के कड़े रूख को देखते हुए राज्य सरकार के अधिकारी हाईकोर्ट के निर्देशों को लेकर विदि विशेषज्ञों के साथ बैठक कर समाधान ढूंढने में जुट गए हैं। गौरतलब हो कि राज्य का विधानभवन सहित राज्य सरकार द्वारा पिछले 12 वर्षों में जितने भी महत्वपूर्ण निदेशालयों के भवन बनाए गए, जिनमें उत्तरांचल टैक्नीकल यूनिवर्सिटी भी शामिल हैं, करोड़ों रूपये की लागत के ये सभी भवन या तो नदी-नालों के बहाव क्षेत्र की भूमि में स्थित हैं अथवा इनके तटों पर। इतना ही नहीं राजधानी देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों में तो अफसरशाही, सफेदपोशों और भूमाफियाओं के गठजोड़ के चलते नदी-नालों और खालों में बुरी तरह कब्जा कर नदीयों के बहाव क्षेत्र को संकुचित कर दिया गया है। राजनैतिक जानकारों के अनुसार सफेदेपोशों और माफियाओं के इस गठजोड़ ने नदी-नालों में वोट की राजनीति के चलते ऐसे क्षेत्रों में कब्जा कराया है। समाज सेवकों का कहना है कि एक ओर तो अवैध रूप से नदी-नालों में बसे ये लोग नेताओं के वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होते रहते हैं, वहीं आपदा के समय मुआवजे के लिए ये लोग खड़े हो जाते हैं। नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेश का प्रदेश की बेलगाम हो चुकी ब्यूरोक्रेसी और सफेदपोश नेताओं पर कितना असर पड़ेगा, यह तो न्यायालय की समयावधि समाप्त होने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन उच्च न्यायालय के इन आदेशों ने सरकार की नींद जरूर उड़ा दी है।
विधान सभा की नाक के नीचे हुए अतिक्रमण की सच्चाई पर प्रश्न वाचक चिन्ह
- नदी से नाले में तब्दील रिस्पना को किसी ने नहीं देखा
देहरादून, 9 जुलाई। दैवीय आपदा पर आजकल पूरे देश में राजनीति और चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। उत्तराखंड की इस भीषण त्रासदी को देखते हुए सरकार अब नदी नालों के किनारे बसी बस्तियों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रही है, लेकिन ठेठ विधान सभा की नाक के नीचे नदी से गंदे नाले में तब्दील हुयी रिस्पना नदी को किसी ने नहीं देखा जिसकी वास विधान सभा में बैठे प्रदेश के नेताओं और थिंक टैंक के नथूनों तक पहुँचती है। सन साठ के दशक में लगभग 300-250 मीटर चौडाई के साथ बहाने वाली इस नदी ने आज़ादी के साथ जहाँ धरातल में गुम होना शुरू कर दिया था वहीँ राज्य निर्माण के बाद इसके सीने में गैंती फावड़ों की मार ने इसे कहीं 50 मीटर तो कहीं 10 मीटर बना दिया है। आज रिस्पना नदी एक गंदे नाले के रूप में प्रदेश की विधान सभा के पिछले भाग से सढान्ध फैलाती सारे प्रदेश के राजनीतिज्ञों का मखौल उड़ा रही है। रिस्पना में सबसे ज्यादा कब्ज़ा भी इस क्षेत्र के एक बाहुबली कांग्रेसी विधायक ने किया है। उसनें अपने वकील भाई की मदद से राजीव नगर डांडा से लेकर सुसवा नदी तक कई किलोमीटर दायरे में सैकड़ों एकड़ नदी छोर की जमीन पर अवैध बस्ती का निर्माण करवाकर जान बूझकर एक ऐसा कोकस बनाया जिस से वह इन लोगों के बीच गरीबों का मसीहा बनकर रहे। उसने औने पौने दामों पर पूरी रिस्पना नदी के दोनों छोरों को बेचकर करोड़ों की कमाई की लेकिन मजाल क्या है कि किसी राजनेता ने चूं तक की हो। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के शासन काल में जब तिवारी चीन यात्रा से लौटकर आये थे तब उन्होंने रिस्पना नदी का कायाकल्प करने की बतौर घोषणा की थी और करोड़ों की लागत से इस नदी को पुनः नदी जैसा जीवन देकर इसे पर्यटन के रूप में विकसित कर नदी के उद्गम से लेकर सुसवा नदी में विसर्जन तक इसे स्वच्छ जल से आच्छादित करने व नदी के छोरों पर स्वीपिंग पुल बनाने की विधिवत घोषणा भी कर दी थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि नदी के दोनों छोरों पर एक ड्राइव वे बनेगा जिस से शहर का यातायात भी घटेगा और नदी का एक खूबसूरत तटबंध भी बन जाएगा। अपनी दबंगई के लिए मशहूर यह कांग्रेसी नेता तब विधायक भी नहीं हुआ करता था। इस घोषणा के तुरंत बाद उसने जाने क्या ऐसी बूटी सुंघाई कि पंडित नारायण दत्त तिवारी जैसा राजनीतिज्ञ भी इस प्रकरण पर चुप्पी साधे बैठ गए। तब से अब तक लगातार इस नदी का बेहिसाब दोहन होता रहा. एकछत्र रिस्पना नदी पर राज करने वाले इस कांग्रेसी विधायक ने वक्त-बेवक्त जब चाहा तब इस पर अतिक्रमण किया. राजीव नगर डांडा, लोअर राजीव नगर, दीप नगर, गोरखपुर जैसी बस्तियों में फर्जी पट्टों पर जमीन बिकती रही और आवाज़ उठाने वालों के मुंह में नोटों की गड्डी ठुन्सती रही. वर्तमान में आलम यह है कि आपदा का नाम आते ही नदी के आस-पास बसे घरों को खाली करा दिया जाता है। हरे पुल जिसकी लम्बाई अब मात्र 10-15 मीटर रह गयी है के पास लगभग सौ मीटर की दूरी पर बना शिव मंदिर 16 जून की बरसात में बह गया. कई लोग अपना घर छोड़कर अन्यत्र शरण लेने गए भले ही फिर लौट आये। लेकिन आज उनकी नींदे गायब हैं। सरकारी नुमाइंदे रिस्पना के इस अतिक्रमण को आँखे मूंदे देख रहे हैं लेकिन किसी की मजाल नहीं जो आवाज बुलंद कर सके। नदी से नाले में तब्दील हुई रिस्पना कभी अपने स्वच्छ जल के लिए जानी जाती थी आज मल की बदबू लिए बह रही रिस्पना के आंसू पोछने वाला कोई नहीं बचा है जिसे यह चिंता हो कि आखिर यह तरक्की किस काम की। यही हाल बिंदाल नदी, सुसवा नदी, तमसा (टपकेश्वर के पास से बहने वाली) नदियों का भी है, जिनके तटों पर आये दिन अतिक्रमण होता ही जा रहा है। अब जबकि नैनीताल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश बरीन घोष और न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की संयुक्त पीठ ने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट में प्रस्तुत बिना बहुगुणा की जनहित याचिका पर यह फैसला दिया है कि ‘‘नदी की जमीनों पर बने भवनों को सरकार 60 दिन के भीतर ध्वस्त करे और इस तरह की जमीनों में किए गए आवंटनों को सरकार सात दिनों के भीतर ध्वस्त करे‘‘, ऐसे में सरकार के आगे सबसे बड़ी मुसीबत के रूप में कई सरकारी निदेशालय और बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान बने हुए हैं। गौरतलब हो कि राज्य का विधानभवन सहित उत्तरांचल टैक्नीकल यूनिवर्सिटी, जेल लॉ कॉलेज आदि कई अन्य निदेशालय जो कि करोड़ों रूपये की लागत के भवन हैं या तो नदी-नालों के बहाव क्षेत्र की भूमि में स्थित हैं अथवा इनके तटों पर। वहीं हरिद्वार और ऋषिकेश जैसी तीर्थनगरियों में गंगा तट पर साधु-संतों ने सबसे ज्यादा कब्जा जमाया हुआ है। ऐसे में क्या सरकार नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेशों का यथावत अनुपालन कर पाएगी या यह अनुपालन फिर गरीबों पर कहर बनकर बरपेगा, क्योंकि इन सरकारी भवनों के अलावा समस्त राजधानी की नदियों के दोनों छोरों पर सफेदपोशों, भूमाफियाओं और एमडीडीए के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से हजारों की संख्या में आवास निर्मित हैं, जिन्हें ध्वस्त करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसा है। यदि नैनीताल उच्च न्यायालय का निर्देश मानकर इन बस्तियों पर डोजर चलते हैं, तब कांग्रेस को मिलने वाला उनका एक बहुत बड़ा वोट बैंक उन्हीं के खिलाफ खड़ा हो जाएगा। डर है कि आगामी समय में यदि पहाड़ में बादल फट गया तब कहीं शांत चित रिस्पना नदी और शहर की अन्य नदियों ने भी ने भी अगर मन्दाकिनी की तरह रौद्र रूप ले लिए तो देहरादून में इन नदियों के तटों पर अवैध पट्टों की ये अवैध बस्तियां कहीं स्वाहा न हो जाएँ. और प्रदेश में एक और ऐसी ही त्रासदी को जन्म न दे दें।
शवों के अंतिम संस्कार के लिए केदारनाथ में फंसे 74 लोग निकाले गए
- अब माना सरकार ने कि चार हजार से अधिक मरे
देहरादून, 9 जुलाई। रामबाड़ा, केदारनाथ में लाशों के अंतिम संस्कार और राहत एवं बचाव कार्य के लिए गए दल के सभी सदस्यों को मंगलवार को हैलीकाप्टर से निकाल लिया गया है, दल के लगभग 74 सदस्य बीते तीन दिनों से केदारनाथ में फंसे हुए थे, मौसम की खराबी के चलते और हैलीकाप्टरों के उड़ान न भरने के कारण ये लोग मुसीबत में थे। इनमें से कई सदस्य बीमार भी बताए जा रहे हैं, वहीं जिला प्रशासन ने केदारनाथ पहुंचने के दूसरे रास्ते को बनाने का कार्य शुरू करने पर विचार शुरू कर दिया है, क्योंकि गौरीकुण्ड-रामबाड़ा केदारनाथ मार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और इस मार्ग के खुलने में काफी समय लगने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार ने आखिर मान ही लिया कि केदारनाथ में हुई भीषण तबाही में मरने वालों की संख्या चार हजार से उपर है, सरकारी आंकड़ों के अनुसार यह संख्या चार हजार 45 से उपर जा सकती है, इस बात की पुष्टि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने भी की है, मुख्यमंत्री बहुगुणा ने बताया कि 15 जुलाई के बाद लापता लोगों को मृतक मानकर उनके परिजनों को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी, उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों से और उत्तराखण्ड में दर्ज लापता लोगों की सूची में मिलान के बाद अंतिम सूची जारी की जाएगी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्रदेश का आपदा प्रबंधन विभाग और मुख्यमंत्री 580 लोगों के मारे जाने की सूचना बीते 20 दिन से दोहरा रहे थे। सरकारी जानकारी के अनुसार अभी तक केदारनाथ में 150 शवों का सामुहिक दाह संस्कार किया जा चुका है। वहीं बीते ऋषिकेश-जोशीमठ मार्ग पर स्थित उर्गम घाटी में बादल फटने से कई मकान ध्वस्त हो गए, परिणाम स्वरूप अलकनंदा नदी का जल स्तर एक बार फिर बढ़ गया है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के चलते पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बना हुआ है, भागीरथी, अलकनंदा, असीगंगा और अन्य सहायक नदियों में बारिश के बाद जल स्तर बढ़ने की जानकारी मिली है। वहीं कोटद्वार क्षेत्र में एक जेसीबी के खाई में गिरने से चार लोगों की मौत हो गई।
हाईकोर्ट ने दी हरक को राहत
देहरादून, 9 जुलाई, । नैनीताल हाईकोर्ट ने कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष अयज भट्ट द्वारा दायर की गई याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया, जिसके बाद कृषि मंत्री हरक सिंह रावत को बड़ी राहत मिली है। नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट द्वारा हरक सिंह रावत के मंत्री रहते हुए उपनल तथा टीडीसी चेयरमैन पद पर रहने को असंवैधानिक बताते हुए नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने हरक सिंह पर लाभ के दोहरे पदों पर रहने की बात कही थी। भट्ट की इस याचिका में कहा गया था कि हरक सिंह रावत ने संविधान के उनुच्छेद 191 का उल्लंघन किया है, लिहाजा उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त होनी चाहिए, जिस पर मंगलवार को जस्टिस विजय की ऐकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्यपाल द्वारा राज्य सरकार के उस निर्णय पर मोहर लगाए जाने के बाद हरक सिंह रावत पर ऐसा कोई मामला नहीं बनता है, जिसमें सरकार द्वारा इन पदों को लाभ के पदों के दायरे से बाहर कर दिया था।
आपदा पीड़ितो के लिए आयी राहत सामग्री
देहरादून, 9 जुलाई, । उत्तराखण्ड में आई भीषण आपदा में भारत स्काउट्स एव गाईडस के मुख्यायुक्त श्री सी0एस0ग्वाल के स्वंय के प्रयासों से विभिन्न प्रदेशों के स्काउट्स सचिवों से सहयोग प्राप्त किये जाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम में आज स्काउट गाइड साउथ वैस्टन रेलवे से 250 राशन बैग, मिनरल वाटर, बिस्किटस व कम्बल रेलवे स्टेशन देहरादून में प्रशासन के प्रतिनिधि को उपलब्ध कराये हैं। इस अवसर पर मु0आयुक्त सी0एस0ग्वाल के अतिरिक्त ऐ0डी0 गडवाल एन0एस0राणा हेड क्वार्टर कमिश्नर राजीव शर्मा के अलावा सा0वै0 रैलवे के स्काउट ली0 कुम्मुरूदीन0एम0 सूबेदार व सदस्य अशोक तेलासाग, चिकमाथ, एस0के0जोशी, मोहसीन, शेखयशवंत, डी0शेखर बाबू, एन0अमीर सेम्युल, राज विजय कुमार, बी0 राजेश कुमार आर आदी भी उपस्थित रहे। सामाग्री प्राप्त करने के पश्चात सी0एस0ग्वाल द्वारा सा0वे0रेलवे के मुख्यायुक्त एके0 मितल जी0एम0,सा0वे0 रेलवे हुबली को दूरभाष पर धन्यवाद दिया गया।
धरना देकर किया निर्णय का विरोध
देहरादून, 9 जुलाई, । चुनाव से पूर्व तीस नई सहकारी आवास समितियों को उत्तराखंड सहकारी आवास संघ में जोड़ने के विरोध में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित संगठन का धरना आज भी जारी रहा। इस दौरान संगठन ने साफ कहा कि उनकी मांगे पूरी होने तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। विदित हो कि उत्तराखंड सहकारी आवास संघ में चुनाव से पूर्व नई सहकारी समितियां जोड़े जाने के विरोध में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित संगठन ने मोर्चा खोला हुआ है, जिसके चलते ही उनके द्वारा गांधी पार्क के समक्ष किया जा रहा धरना- प्रदर्शन का कार्यक्रम आज भी जारी रहा। इस अवसर पर आयोजित सभा में वक्ताओं ने कहा कि आगामी 15 व 16 जुलाई को संघ के चुनाव होने हैं, व्यक्ति विशेष का कब्जा कराने के उद्देश्य से सहकारिता विभाग के अधिकारियों द्वारा अधिनियम व नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि इस चुनाव में कई प्रतिनिधियों को आमंत्रित नहीं किया गया है। व्यक्ति विशेष की खातिर तमाम नियमों को ताक पर रखकर काम किया जा रहा है। उनका यह भी कहना था कि सहकारिता विभाग असंवैधानिक रूप से निबंधक सहकारिता समितियां उत्तराखंड के निर्गत निर्वाचन आदेश छह फरवरी की घोषणा के बाद 30 सहकारी आवास समितियों का मात्र दो दिन निबंधन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि बार-बार आपत्तियां करने के बाद भी उन्हें अनसुना कर दिया गया, इस संघ में कई प्रतिनिधि उप्र के समय से वर्षों से जुडे हुए हैं, उन्हंे निर्वाचन में शामिल नहीं किया जा रहा है, जिससे प्रतिनिधियों में रोष व्याप्त है। उन्होंने कहाकि कई बार सहकारिता मंत्री को अवगत कराये जाने के बाद आज तक इस दिशा में कोई कार्यवाही नहीं हो पाई है, जिससे आंदोलन करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। धरना देने वालों में राजीव कोठारी, भद्र सिंह नेगी, पृथ्वीपाल सिंह रावत, नरेश शर्मा, मुकेश नारायण शर्मा, अनिल कन्नौजिया आदि मुख्य रूप से शामिल थे।
राहत के इंतजार में आज भी बैठे है ग्रामीण
मसूरी/देहरादून, 9 जुलाई, । एक ओर आपदा के बाद राहत बांटने का ढोल सरकारी तंत्र की ओर से पीटा जा रहा है। हकीकत में अभी तक दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में तीन सप्ताह बाद भी राहत नहीं पहुंच पाई है। पीड़ित ग्रामीण राहत की इंतजार में दिन गंवा रहे हैं उनकी आपदा पर कोई आंसू पोंछने नहीं जा रहा है।। गत 16 व 17 जून को उत्तराखंड के पहाड़ों पर आई आपदा में पूरे सरकारी तंत्र का ध्यान केदारघाटी पर ही है, जबकि अन्य स्थानों में सैकड़ों गांव बाढ़ व पनगोला फटने से मकान, पशु खेती की जमीन आदि गवां चुके हैं। रास्ते पूरी तरह बंद हैं। ऐसे में सरकारी अमला भी सड़कों के किनारे तक जाकर वापस लौट आता है। जबकि दूर दराज के गांव आज भी राहत के लिए तरस रहे हैं। उनकी पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं है। ऐसा ही एक गांव सैंजल है। जौनपुर विकासखंड का यह गांव ब्लाक का आखिरी गांव है जहां जाने के रास्ते टूटे हुए है। गांव में लोगों के पास खाने के लिए भी नहीं है। गांव बादल फटने के आगोश में आकर समाप्त हो चुका है लोगों के घर का सारा सामान बह गया है। पशु बाढ़ में बह गये है। किसी तरह रात काट रहे हैं लेकिन तीन सप्ताह बाद भी यहां राहत तो दूर कोई सुध लेने नहीं आया। ग्रामीण पूरा दिन राहत आने के इंतजार में काट रहे हैं तथा शाम होते ही अपने आशियाने में निराश होकर लौट आते हैं। आपदा राहत के नाम पर ट्रकों के ट्रक आ रहे है और सड़क मार्ग पर वितरण कर लौट जा रहे हैं हकीकत में जिन्हें राहत की जरूरत है उनतक राहत आज भी नहीं पहुंच रही है।
बागेश्वर में हुई दैवीय आपदाओं की क्षति की सूचना
बागेश्वर/देहरादून, 9 जुलाई, । अपर जिलाधिकारी/प्रभारी अधिकारी आपदा प्रबन्धन उदय सिंह राणा ने अवगत कराया है कि विगत दिनों जनपद के अन्तर्गत दैवीय आपदाओं के कारण हुई क्षति की सूचना में अब तक जनपद में 55 भवन क्षतिग्रस्त हुये हैं जिनमें 1 कच्चा तथा 1 पक्का आवासीय मकान पूर्णरूप से क्षतिग्रस्त, 25 पक्के आवासीय भवन तीक्ष्ण क्षतिग्रस्त एवं 28 पक्के आवासीय भवनों को आंशिक क्षति हुई है। 1 गौशाला क्षतिग्रस्त हुआ है। उन्होंने बताया कि 261 पशुहानि हुई है, अतिवृष्टि/भूस्खलन से 3.78 हैक्ट० कृषि भूमि प्रभावित हुई है। दैवीय आपदा से अब तक 69 ग्रामों के 96 परिवारों की 492 जनता प्रभावित हुई है। उन्होंने बताया कि अब तक 7,16,474/-रू० की राहत सहायता राशि वितरित की जा चुकी है। जनपद के 94 मोटर मार्गों से 81 मोटर मार्ग यातायात के लिए खुले हुए हैं शेष 13 बन्द मोटर मार्गाे को खोलने के लिए लोनिविभाग, पीएमजीएसवाई तथा एडीबी को तत्काल यातायात के लिए खोलने के निर्देश जारी किये गये है। उन्होंने बताया कि तहसील कपकोट अन्तर्गत पिण्डर नदी में स्थित लोहे की पुलिया बह जाने के कारण 10 ग्रामों का सम्पर्क कट जाने से 1163 परिवार प्रभावित हुये हैं तथा ग्राम नामती चेटाबगड़ के तोक हिलडुगरा की पेयजल योजना क्षतिग्रस्त, ग्राम कन्यूटी में पेयजल योजना बाधित तथा ग्राम सूपी में अनु०जाति बस्ती पेयजल योजना क्षतिग्रस्त हुई हैं। तहसीलदार बागेश्वर पद्म सिंह मेहरा ने बताया कि लगातार मौसम खराब होने के कारण हैलीकॉप्टर में आटा, चावल, दाल, तेल, नमक, चीनी, कैन्डिल, माचिस के पैकेट बनाकर बदियाकोट राहत कैम्प में प्रभावित परिवारों में भेजने हेतु रखे गये हैं। उन्होंने बताया कि मौसम के ठीक होते ही प्रभावित ग्रामों में शीघ्र ही राशन भेजा जायेगा। तहसील स्तर पर प्रभावित परिवारों को राहत सहायता वितरण हेतु आवश्यक कार्यवाही की जा रही है।
जर्जर इमारत ढही, अन्य जर्जर इमारतों पर भी खतरा बरकरार
देहरादून, 9 जुलाई, । उत्तराखण्ड में आई भीषण आपदा के बाद भी दून प्रशासन जर्जर भवनों की सुध लेने को तैयार नहीं है। नगर निगम ने जिला प्रशासन के साथ मिलकर 105 गिरासू भवन चिन्हित किए थे। जिन्हें गिराने का काम आज तक भी नहीं किया जा सका है। मंगलवार की सुबह धामावाला क्षेत्र में स्थित एक जर्जर भवन का एक हिस्सा ढह गया। हालांकि इस हादसे में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है। किन्तु इन गिरासू भवनों पर कब कार्य करेगा। यह अब भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। प्रदेश में आई आपदा का रौद्र रूप पूरा देश देख चुका है। अभी भी मौसम का मिजाज शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। जिसके चलते कई लोगों की जिन्दगियां दांव पर लगी हुई है। चाहे यह लोग नदियों के किनारे बसने वाले हों या फिर जर्जर हो चुकी इमारतों में रहने वाले। जिला प्रशासन व नगर निगम इन्हें खाली कराने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है। जिसके चलते यह जर्जर इमारते सीधे मौत को दावत दे रही हैं। सुबह धामावाला में एक जर्जर इमारत का हिस्सा गिरने से क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई। हालांकि इस हादसे में किसी के हताहत होने की कोई सूचना नहीं है लेकिन पता चला है कि धामावाला क्षेत्र में ऐसी कई इमारते हैं। जिनमें लोग किराए पर निवास कर रहे हैं। किन्तु इन इमारतों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि भारी बरसात में यह कभी भी गिर सकती हैं। उसके वावजूद इन इमारतों में लोगों की जान को जोखिम में डाल उन्हें यहां रहने की इजाजत क्यों दी गई। यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है। कई वर्ष पूर्व जिला प्रशासन व नगर निगम ने शहर की ऐसी 105 इमारते चिन्हित भी की थी। किन्तु उसके बाद इस दिशा में कोई कार्यवाही नहीं की गई। जिसके कारण कई लोग अब भी मौत के मुंह में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं।
गांधी पार्क में भिड़ पड़े पुलिस और फौजी युवक
देहरादून, 9 जुलाई, । प्रेमनगर में व्यापारी नेता व फौजी के बीच हुआ विवाद अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि गांधी पार्क में पुलिस से एक व्यक्ति की कहासुनी हो गई जिसमें दोनों के बीच हाथापाई तक की नौबत आ गई। युवक ने खुद को फौजी बताते हुए पुलिस कर्मी को देख लेने की धमकी तक दे डाली। जिसके बाद दोनों पक्ष पुलिस चौकी में पहुंच गए। घटनाक्रम के मुताबिक एक व्यक्ति ने गांधी पार्क में कान साफ करने वालों से अपना कान साफ कराया जिसके बाद उसने कम सुनाई देने की शिकायत की। इसकेे बाद खुद को फौजी बता रहे इस युवक ने वहां हंगामा मचाना शुरू कर दिया। जिससे वहां काफी भीड़ एकत्र हो गई। इस बीच हंगामे की सूचना पाकर पुलिस कर्मी मौके पर पहंुचे और फौजी को समझाने का प्रयास किया किन्तु फौजी पुलिस पर ही रौब झाड़ने लगा। जिससे दोनों के बीच कहा सुनी हो गई और हाथापाई तक की नौबत आ गई। इसके बाद मौके पर मौजूद लोगों ने दोनो को समझााकर कर मामले को शांत कराया। लेकिन खुद को फौजी बता रहा यह युवक मानने के लिये तैयार नहीं था। जिसके बाद यह मामला पुलिस चौकी तक पहंुच गया। जहां खबर लिखे जाने तक समझौता कराने के प्रयास चल रहे थे।
पुलिस की मिली भगत से आईएसबीटी से ट्रैकरों का अवैध संचालन
देहरादून, 9 जुलाई, । सुप्रीम कोर्ट ने अपना एक निर्णय सुनाते हुए पुलिस की छवि तक पर टिप्पणी कर डाली थी। किन्तु यह एक कटु सत्य है भी। आईएसबीटी से ट्रैकरों का अवैध संचालन लंबे समय से हो रहा है। हैरानी इस बात की है कि इससे संचालक तोे चांदी काट रहे है किन्तु उत्तराखण्ड रोडवेज और सरकार को करोड़ों के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यही नहीं ट्रैकर संचालक परिवहन मंत्री का रौब दिखाने से भी पीछे नहीं हट रहे। इस पूरे खेल में स्थानीय पुलिस चौकी के कर्मियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में बनी हुई है। राज्य सरकार परिवहन विभाग के लगातार घाटे में चलने को लेकर काफी परेशान है। इसके लिए काफी प्रयास विभाग और शासन की ओर से किए जा रहे हैं लेकिन इन प्रयासों को कुछ वाहन माफिया पलीता लगाने में जुटे हुए हैं। इसी का एक उदाहरण आईएसबीटी के समीप देखने को मिल रहा है। यहां एक व्यक्ति के निजि प्लाट से अवैध रूप से ट्रैकरों का संचालन लंबे समय से किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस संचालन को परिवहन विभाग से न तो इस तरह की कोई अनुमति मिली हुई है और न ही ट्रैकरों के लिए इस तरह का नियम निर्धारित है। जिसके चलते आईएसबीटी से ट्रैकर स्वामी सवारियों को भरकर दून से सहारनपुर व रूड़की तक का सफर करवा रहे हैं। जिससे परिवहन विभाग को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह संचालक परिवहन मंत्री का रौब दिखाकर चांदी काट रहे हैं। इस बात की जानकारी पुलिस को भी है लेकिन कुछ पुलिस कर्मियों की भूमिका भी संदिग्ध बनी हुई है। एक ओर तो परिवहन विभाग में हो रहे घाटे को कम करने के लिए शासन व विभाग जी-तोड कोशिश करने में जुटा हुआ है। वहीं ट्रैकरों का अवैध संचालन परिवहन विभाग के लिए राजस्व के भारी नुकसान का सबब बनता जा रहा है।
बेनामी संपत्तिया भू-माफिया के निशाने पर
देहरादून, 9 जुलाई, । दून में बेनामी व सरकारी संपत्तियों पर बड़े पैमाने पर लोगों ने कब्जा जमाया हुआ है। किन्तु शासन प्रशासन इसकी सुध लेने को तैयार नहीं है। एक समय दून घाटी अपनी प्राकृतिक आबोहवा के लिए पूरे देश में प्रसि़द्ध थी। जिसके चलते देश की कई नामी गिरामी हस्तियों ने इस शहर में या तो अपना एक घर बनाकर छोडा या फिर जमीन लेकर छोड़ दी। जब वे चल बसे तो अकूत धन दौलत होने के कारण उनके परिजनों को दून की जमीन के बारे में कोई जानकारी नहीं रही। जिसका फायदा बाद में भूमाफियाओं ने इन जमीनांे पर पटवारियों की मिलीभगत से उठाया। भू-माफियाओं द्वारा इन जमीनों को फर्जी दस्तावेजों के जरिए ऊंचे दामों में बेचकर चांदी काटी गई। अब भी दून घाटी में इस तरह की भूमि ढूंढने के लिए भूमाफिया सक्रिय है। किन्तु प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। दून की जमीने अब भी उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद के कब्जे में है और परिषद के अधिकारी भूमाफियाओं के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर जमीनों को खुर्दबुर्द करने पर तूले हैैं। उत्तराखण्ड के लोगों से परिषद पूरी तरह से परहेज कर रहा है। राज्य गठन के 13 वर्ष बाद भी परिषद ने राजधानी दून में लोगों की जरूरत के लिए जमीनों का आवंटन नहीं किया। जो लोग यहां आकर कई साल पहले बस गए थे उनमें से अधिकांश लोग या तो मर चुके हैं। या फिर जीवन के अंतिम पड़ाव में है। जबकि एकाकी जीवन जी रहे कई बुजुर्गों की बेस कीमती प्रापर्टी पर भू माफिया की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है। कुछ बुजुर्गों की तो प्रापर्टी के लिए हत्या तक कर दी गई। जिसके कई उदाहरण विगत वर्षो में देखने को मिले हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जिनकी जमीन दून में फर्जी दस्तावेज बनाकर कब बेच दी गई। इसका उन्हंे पता नहीं चल पाया। राजपुर रोड स्थित करोड़ों की भूमि को लेकर दून में जमकर विवाद भी हुआ था। जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई हथियार बंद बदमाश इस संपत्ति पर कब्जा करने पहंुच गए थे। किन्तु विवाद के चलते उन्हे बैरंग लौटना पड़ा। दून घाटी में अकूत बेनामी संपत्ति पड़ी हुई है। जो कि भू माफियाओं के निशाने पर है और इन संपत्तियों के वारिशों का कोई अता पता नहीं है। इन संपत्तियों को संभालने के लिए सिर्फ चौकीदार ही तैनात किए गए है। किन्तु विगत वर्षो में करोड़ों की जमीनो की रखवाली करने वाले चौकीदारों की हत्याओं ने भी कई सवाल खड़े कर दिए है। आखिर दून घाटी में जो बेनामी संपत्तियां खाली पड़ी हुई हैं। क्या इन संपत्तियों को लेकर शासन प्रशासन कोई गंभीर कदम उठाएगा या नही। यह भी एक सवाल बना हुआ है। हांलाकि प्रापर्टी के करोबार में कुछ आईपीएस व आईएएस की भूमिका के चलते बेनामी सपत्तियों पर शासन प्रशासन का कब्जा होने की उम्मीदें फिल्हाल कम ही लगती हैं।
मौसम साफ होते ही सेना के हेलीकॉप्टर ने भरी उड़ान
देहरादून, 9 जुलाई,। उत्तराखंड के अधिकतर स्थानों पर मौसम साफ होने के साथ ही तीन दिन के बाद वायु सेना का हेलिकॉप्टर मंगलवार को मलबा हटाने और शवों के अंतिम संस्कार के लिए वहां तैनात टीमों तक जरूरी सामान पहुंचाने के लिए उतरा। एक अन्य घटनाक्रम में, केदार घाटी में शवों के अंतिम संस्कार के काम में लगे दल के कुछ बीमार सदस्यों को इलाज के लिए देहरादून लाया गया है। प्रशासन अभियान में सहायता के लिए घाटी में उनके स्थान पर अन्य टीम भेजने पर विचार कर रहा है। वायु सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सोमवार को वायु सेना के विशेष विमान से केदार घाटी में खाद्य आपूर्ति पहुंचाने में नाकामी के बाद हेलिकॉप्टरों ने मंगलवार को मौसम साफ होने पर यह काम किया। आधिकारिक सूत्रों ने बताया है कि क्षेत्र में फैले टनों मलबे को साफ करने और इसके नीचे दबे शवों के अंतिम संस्कार के वास्ते विभिन्न विभागों के प्रशिक्षित कर्मियों व चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए 15 दिन का जरूरी सामान पहुंचाया गया। राहत सामग्री से लदे हेलिकॉप्टरों के उतरने के साथ ही सबसे ज्यादा प्रभावित चमोली, उत्तरकाशी और रूद्रप्रयाग जिलों में प्रभावितों को राशन वितरण का काम शुरू हो गया, जो पिछले कुछ दिन में काफी प्रभावित हुआ था।
अनिश्चितकालीन धरना जारी
देहरादून, 9 जुलाई, । पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षितों का अपनी मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना जारी है। आंदोलनरत पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षितों ने सरकार पर उनकी मांगों के प्रति गंभीर न होने का आरोप लगाया है। पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षितों द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया शुरु करने की मांग को लेकर लैंसडाउन चौक स्थित पुराना रायपुर बस अड्डे पर अनिश्चितकालीन धरना दिया जा रहा है। सरकार की अनदेखी से पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षितों में सरकार के प्रति रोष व्याप्त है। पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षितों का कहना है कि उच्च न्यायालय नैनीताल के द्वारा भर्ती प्रक्रिया पर लगाई गई रोक हटाने के पांच माह बाद भी सरकार एवं शासन ने नियुक्ति प्रक्रिया शुरू नहीं की। इस संबंध में पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षित मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, शिक्षा सचिव और शिक्षा निदेशक से मिल चुके हैं लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई कार्रवाही नहीं की गई। सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैय से पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षितों में रोष व्याप्त है। पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षितों का कहना है कि 14 फरवरी 2013 को उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ बैंच ने अपने निर्णय में बीटीसी पत्राचार प्रशिक्षितों को 2004 में पारित किए गए उच्च न्यायालय के निर्णय को आधार मानते हुए नियुक्ति आदेश दिए गए हैं। इससे पूर्व उत्तराखंड शासन द्वारा सरकार के सामने उच्च न्यायालय के तथ्यों को प्रस्तुत नहीं किया गया। शासन द्वारा उच्च न्यायालय में दिए गए शपथ पत्र में कुल रिक्त पदों का विवरण एवं जनपदवार पत्राचार बीटीसी प्रशिक्षित के लिए 868 पदों को सुरक्षित रखने का उल्लेख किया गया। संगठन का कहना है कि 14 फरवरी 2013 को उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ बेंच ने अपने निर्णय में बीटीसी पत्राचार प्रशिक्षितों को 2004 में पारित किए गए उच्च न्यायालय इलाहाबाद के निर्णय को आधार मानते हुए नियुक्ति के आदेश दिए गए थे। धरने पर बैठने वालों में दयाल सिंह रावत, सुरेंद्र सिंह नेगी, सोनीराम भट्ट, यशवंत सिंह गुसाईं, बल्लभ प्रसाद जसोला, सुरेंद्र सिंह नेगी, भगत सिंह नेगी, यशवंत गुसाईं, राकेश चौहान आदि शामिल रहे।
(राजेन्द्र जोशी)

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