थर्ड जेनरेशन की मोबाईल क्रांति - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 5 अगस्त 2013

थर्ड जेनरेशन की मोबाईल क्रांति

15 जुलाई से देश में टेलीग्राम सिर्फ इतिहास की बात बनकर रह गया। बुजुर्गों से सुना है कि वह टक-टक करके चलता था, लेकिन कभी देखा नहीं और न ही कभी तार बाबू को लाते देखा है। जबतक चल रहा था किसी को इसकी चिंता नहीं थी। किस हाल में चल रहा है यह तो सोचने की फर्सुत भी नहीं थी। लेकिन जब इस सेवा को बंद करने की घोषणा की गई तो अचानक सबके मन में इसके लिए श्रद्धा जग गई। हर तरफ सिर्फ टेलीग्राम की ही चर्चा होने लगी। अंतिम दिन तो लोग इतिहास का हिस्सा बनने के लिए अपनों को टेलीग्राम करने के लिए उमड़ पड़े। उनमें अधिकतर ऐसे थे जिन्हें यह भी नहीं पता था कि टेलीग्राम होता कहां से है। वह इसी उधेड़बुन में थे कि यह पोस्ट आॅफिस से किया जाता है या टेलीफोन एक्सचेंज जाना होगा। मीडिया ने भी टेलीग्राम को अंतिम सलामी देते हुए इसे याद करने वालों के हजारों किस्से छाप दिये। किसी ने खुद टेलीग्राम करने का वाक्या बयान किया तो किसी ने इसके मिलने पर होनी वाली पहली प्रतिक्रिया को साझा किया। संक्षेप में किस्सा यह है कि शहर से लेकर गांव और सरहद से लेकर बाजार तक चंद शब्दों में संदेश पहुंचाने वाला सिस्टम अब हमेशा के लिए बंद हो गया है। टेलीग्राम के बंद होने के पीछे सबसे बड़ा कारण मोबाइल को बताया जा रहा है। नई पीढ़ी की नई जेनरेशन वाला टेलीग्राम यानि मोबाईल उनके पास है। इससे संदेश भेजने के लिए न तो पोस्ट आॅफिस जाने की जरूरत है और न ही टेलीफोन एक्सचेंज का पता पूछने की आवश्यकता है।

एक आंकड़े के अनुसार देश में 99 प्रतिशत लोगों तक रेडियों की पहुँच है। लगभग 90 प्रतिशत घरों में टेलीविज़न है। 75 प्रतिशत लोगों तक समाचारपत्र की पहुँच संभव हुई है। लेकिन आंकड़ा कहता है कि 100 प्रतिशत लोग मोबाईल का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि मैं इससे सहमत नहीं हँू, लेकिन बहस का मुद्दा यह नहीं है। बल्कि यह है कि अन्य जरूरतों की अपेक्षा मोबाईल की पहुँच अधिक क्यों हो गई है? दूरसंचार माध्यमों का अति तीव्रगामी परिवर्तन के रूप में मोबाईल एक क्रांति साबित हुआ है। बाज़ार में 50,000 रूपये से लेकर 500 तक मोबाईल आसानी से उपलब्ध है। तीन से पांच हजार रूपये में बिकने वाला मोबाईल खासो-आम से लेकर गुमनाम तक की जेब में मिल जाएगा। ऐसे में योजना आयोग की टिप्पणी सटीक लगती है कि देश के आर्थिक स्थिती में सुधार हुआ है। जब मोबाईल खरीदने के पैसे हो सकते हैं तो खाने के लिए अवष्य होंगे। वातानुकूलित कमरों में बैठे आयोग के अफसरों को गलत नहीं लगता है कि जब 500 रूपये का मोबाईल खरीदा होगा तो अवष्य ही 32 रूपये में घर चल जाता होगा। देष के लगभग सभी नागरिकों के पाॅकेट में मोबाईल अवष्य होता है। इस मामले में राजधानी वाले दो कदम आगे हैं। एक समाचारपत्र के सर्वेक्षण यह बात सामने आई है कि दिल्ली में लगभग प्रत्येक व्यक्ति का अपना दो हैंडसेट मोबाइल होता है। प्रबुद्ध और षिक्षित वर्ग की बात तो दूर ग्रामीण क्षेत्र के अषिक्षित भी जिन्हें कभी सिस्टम चलाना भी नहीं आया वह भी आसानी से मोबाईल आॅपरेट कर लेते हैं। कभी अंग्रेजी का एक षब्द भी नहीं पढ़ा होगा लेकिन उन्हें भी मालूम है कि फुलटाॅक टाइम का अर्थ क्या होता है।

आधुनिक तकनीक के माध्यम से मोबाईल 10 इन 1 हो गया है। एक डिबीया में 10 जादू समा गया है। इस एक डिब्बी के माध्यम से कहीं भी कभी भी बात करना करना संभव हो सका है, और तो और चलते फिरते आप को दुनिया के बारे में जो कुछ जानना है पल भर में सर्च कर सकते हैं। इस मोबाईल ने लोगों को सिनेमा हाॅल से भी दूर कर दिया है। छोटी से डिब्बी में तीन घंटे की मूवी डाउनलोड किजिये और हाॅल टिकट का पैसा बचा लिजिये। किसी मित्र के पास आपकी पंसदीदा मूवी या फिल्म स्टार का फोटो है तो ब्लूटूथ के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। कहने का मतलब यह है कि इस आधे ग्राम के डब्बे में मनोरंजन के पूरे साधन मौजूद हैं। इसी मोबाईल ने टेलीग्राम से उसकी जि़दगी को छिना है। संदेष भेजने का जो काम टेलीग्राम कुछ घंटों में पूरा करता है वही संदेष मोबाईल में एसएमएस के रूप में कुछ ही सेकेंडों में प्रसारित हो जाता है। मोबाईल से एसएमएस और टेलीग्राम के फर्क को संजय दत्त की सुपरहिट फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस‘ देखकर समझना आसान हो सकता है। जब मुन्ना भाई को टेलीग्राम मिलता है कि षाम की गाड़ी से बाबूजी आ रहे हैं तो पूरे धोबी घाट में हड़कंप मच जाता है और आनन-फानन में धोबी घाट को अस्पताल की षक्ल दी जाती है। यदि मुन्ना भाई को बाबूजी के आने का एसएमएस मिल जाता तो ऐसी कोई नौबत ही नहीं आती।

अब ज़रा एक मोबाईल यूज़र युवा की दिनचर्या पर ज़रा गौर किजिये। सुबह आंख खुलते ही हाथ मोबाईल पर जाता है। तकिये को टटोलते हुए इनबाॅक्स को चेक करता है। सारे दोस्तों को गुड मार्निंग विष करता है। फिर फेसबुक आॅन करता है और कुछ स्टेटस अपडेट करता है। नाष्ते के टेबल पर भी एक हाथ प्लेट में तो दूसरी मोबाइल पर ही चिपकी रहती है। काॅलेज या आॅफिस गया तो षुरू होता है आधुनिक टेलीग्राम का सफर जो एसएमएस के रूप में आता जाता रहता है। सवाल किया नहीं कि पलक झपकते मित्रों या प्रेमिका का जवाब आ जाता है। इसके लिए न तो डाकघर जाना होता है और न ही किसी टेलीफोन एक्सचेंज के लाइन में लगना होता है। यह सिलसिला देर रात तक जारी रहता है। चुपचाप घर ऐसे आ जाता है कि किसी को खबर तक नहीं होती है। घर वालों के साथ बैठकर टीवी देखने के दौरान भी बीच बीच में छुपकर मैसेज और चैटिंग हो जाती है। रात 1 बजे सोने से पहले दोस्तों को फेसबुक और मैसेज के माध्यम से गुड नाइट कहना नहीं भूलता है। इस तरह टेलीग्राम रूपी मोबाईल का दिनभर का सफर पूरा होता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार एक युवा 24 घंटे में करीब 20 घंटे मोबाईल का प्रयोग करता है। इस जादू ने कमाल कर दिया है। अब तो एक 14 वर्श की आयु वाले बच्चे से लेकर मृत्यु षîा पर लेटे लोग भी इसे सीने से चिपका कर रखते हैं। प्रतिमाह एक यूजर अपने मोबाईल पर न्यूनतम 600 रूपये खर्च करता है। इसलिए सबसे ज्यादा कमाउ कंपनी कोई और नहीं है। कहने वाले कहते हैं कि इसने युवाओं को बिगाड़ दिया है अष्लीलता को बढ़ावा दिया है। लेकिन फर्क किसे पड़ता है टेलीग्राम तो जारी है न! 





पुरूषोत्तम लाल निषाद
(चरखा फीचर्स)

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