झारखण्ड में वर्षाभाव से धनरोपनी हुई प्रभावित, - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

झारखण्ड में वर्षाभाव से धनरोपनी हुई प्रभावित,

  • आने वाले समय में फसल उत्पादन होगा प्रभावित

भारतीय किसान मानसून के साथ एक जुआ है। यह बात संपूर्ण भारतवर्ष में लागू हो या न हा,े झारखण्ड जैसे पिछड़े सूबे में सौ फीसदी सही है। इस प्रदेश में पर्याप्त वर्षा न हो पाने की स्थिति में खरीफ फसलों का उत्पादन पिछले तीन वर्षों से खासा प्रभावित रहा है। मंझले व निम्नस्तरीय किसानों की हालत दयनीय बनती जा रही है। मौसमी वर्षा व खेतों में सिंचाई के कृत्रिम संसाधनों के अभाव में फसलों का औसत उत्पादन भी न होना किसानों की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाल रहा। खेत-खलिहानों पर नाज रखने वाले किसानों की स्थिति यह हो गई कि वे अपना घर-बार छोड़कर शहरों की ओर पलायन को विवश दिख रहे। सूबे की राजनीति का अखाड़ा झारखण्ड के संताल परगना प्रमण्डल की स्थिति और भी दयनीय है। आँकड़ों के मुताबिक इस वर्ष तकरीबन 3.53 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान का आच्छादन तय था, किन्तु 27 अगस्त 2013 तक महज 1.53 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही धनरोपनी संभव हो पायी। मौसमी बारिस के अभाव में 2 लाख हेक्टेयर भूमि इन्द्रदेव की राह देखते-देखते थक गई और फिर उदास हो गयी। गनीमत है कठिन परिस्थिति में भी हार न मानने वाले कतिपय किसानों ने पम्पिंग सेट व अन्य माध्यमों से थोड़ी बहुत धनरोपनी कर सरकारी आँकड़ों की लाज बचा ली। संताल परगना प्रमण्डल में धनरोपनी की सबसे बुरी स्थिति हालिया जिला बने जामताड़ा की रही। इस जिले में मात्र 34 प्रतिशत ही धान का आच्छादन संभव हो पाया। 

दुमका में यह 38.03 तथा गोड्डा में 40 प्रतिशत तक रहा। संताल परगना प्रमण्डल के अन्य जिलों यथा- देवघर, पाकुड़ व साहेबगंज की स्थिति इन तीन जिलों से कुछ बेहतर रही। 27 अगस्त तक देवघर में 49.4 प्रतिशत, साहेबगंज में 52 प्रतिशत व पाकुड़ में 53.7 प्रतिशत धनरोपनी का कार्य हो पाया। जून माह में सं0प0प्र0 का सामान्य वर्षापात 281.1 मिमी है जबकि बारिस की स्थिति 169.01 मिमी रही। जूलाई महीनें में सामान्य वर्षापात की स्थिति 335 मिमी थी जबकि वास्तविक वर्षा 136.9 मिमी रही। दुमका में अगस्त तक वारिस की स्थिति 229 मिमी रही। मक्का की बुआई कुछ हद तक किसानों के भावी जीवन के लिये राहत का पैगाम बनकर सामने आयी। दुमका में लक्ष्य के विरुद्ध 93.5 प्रतिशत, जामताड़ा में 91.3 प्रतिशत, देवघर में 69.7 प्रतिशत, गोड्डा में 94.7 प्रतिशत, साहेबगंज में 48.2 प्रतिशत तथा पाकुड़ में 72.2 प्रतिशत मक्का बोया गया। उम्मीद की जा रही है यह वर्ष संताल परगना के लिये मक्का उत्पादन वर्ष के रुप में सामने आऐगा। धनरोपनी के लिये अभी तक हुई बारिस से किसानों को कोई खास लाभ नहीं हो पाया। समय पर पर्याप्त बारिस न होने की स्थिति में तकरीबन 40 से 50 प्रतिशत धान के बीजड़े या तो कड़ी धूप में जलकर बर्बाद हो गए या फिर मवेशियों के लिये आहार बन गए। वर्षा की आशा में बीजड़ों का जलना यह दर्शाता है कि किसान कितने मजबूर हैं जिन्हें धनरोपनी के लिये पर्याप्त पानी तक मयस्सर नहीं हुआ। यदि पूरे झारखण्ड की बात करें तो आँकड़े यह दर्शाते हैं कि 86.50 मिमी वर्षा के विरुद्ध 22 अगस्त तक मात्र 49.86 प्रतिशत ही धनरोपनी का कार्य हो पाया जो लक्ष्य से काफी कम है। 

इस वर्ष 22 अगस्त  तक राजधानी राँची में 76.80 मिमी वर्षा के विरुद्ध महज 47.00 प्रतिशत धनरोपनी हुई। इसी तरह गुमला में 85 मिमी के विरुद्ध 54.22, सिमडेगा में 116.50 मिमी के विरुद्ध 77.79, लोहरदगा में 85.40 मिमी के विरुद्ध 61.34, पू0 सिंहभूम में 111.60 मिमी के विरुद्ध 78.19, प0 सिंहभूम में 97.40 मिमी के विरुद्ध 54.54, सरायकेला में 91.30 मिमी के विरुद्ध 68.13, पलामू में 72.70 मिमी के विरुद्ध 12.09, गढ़वा में 77.70 मिमी के विरुद्ध 24.58, लातेहार में 99.50 के विरुद्ध 65, हजारीबाग में 116.50 मिमी के विरुद्ध 31, चतरा में 63.30 के विरुद्ध 51.50, कोडरमा में 58.80 के विरुद्ध 26.07, गिरिडीह में 80.10 मिमी के विरुद्ध 45.30, धनबाद में 92.70 के विरुद्ध 27.49, बोकारो में 92.50 मिमी के विरुद्ध 55, रामगढ़ में 105.40 मिमी के विरुद्ध 27.11 तथा खँूटी में 122.30 मिमी के विरुद्ध 63 प्रतिशत ही धनरोपनी का कार्य संभव हो पाया। एस0 के0 एम0 यू0 के एक विशेषज्ञ पर्यावरणविद का मानना है प्राचीन काल से जंगल व पहाड़ों से आच्छादित इस अरण्य प्रदेश को पूरी तरह समतल बनाने की कवायद जारी है। नामालूम समय से इस प्रदेश के जंगलों से दुर्लभ व कीमी पेड़-पौधों का  वेवजह कटना जारी है। राज्य में चैड़ी सड़कों का निर्माण व मरम्मती कार्य निर्बाध जारी है ऐसी स्थिति में सड़क किनारे पेड़ों की कटाई से जंगल का वातावरण प्रभावित होता है। जंगल-पहाड़ की मौजूदगी बादलों के ठहराव का कारण बनती हैं। वृक्षों के कटने से पानी का प्राकृतिक श्रोत रोज-व-रोज कमता जा रहा है। इस अवस्था में वर्षापात की जो स्थिति अद्यतन होनी चाहि,े वह नहीं हो पा रही है। वर्षाभाव की वजह से फसलों की बुआई का प्रभावित होना कोई बड़ी वजह नहीं मानी जा सकती।  







(अमरेन्द्र सुमन)
दुमका 

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