सरकारी मामलों में काम करने की इच्छा और उसके लिए उपलब्ध साधनों में गहरा और व्यापक अंतर रहता है। अधिकारी भले ही बहुत कुछ करना चाहते हों, लेकिन वे उन्हें कर नहीं सकते हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने यहां रविवार को यह बात कही। मुखर्जी ने कहा कि दोनों के बीच असंतुलन के कारण 'मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों' की ढेर सारी इच्छाएं आकार नहीं ले पाती हैं।
पश्चिम मिदनापुर जिले में घाटल विद्यासागर उच्च विद्यालय के 125 वर्ष पूरे होने के मौके पर आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति ने अपनी बात रखी। योजना आयोग में अपने कार्यकाल के दौरान शिक्षण संस्थानों की मदद के लिए एक विशेष कोष की व्यवस्था का मुखर्जी ने उल्लेख किया। मुखर्जी 1991 और 1996 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे।
उन्होंने याद दिलाया, "मैंने उस समय योजना आयोग के उपाध्यक्ष का एक विशेष कोष गठित किया था, जिससे मेरे पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान मैंने कई शिक्षण संस्थानों की मदद की।" राष्ट्रपति ने कहा, "सरकार में कामकाज करने के लंबे अनुभव के कारण मैं जानता हूं कि सरकार में हमारी इच्छा और साधन में बहुत बड़ा अंतर रहता है।" सात मिनट बांग्ला में दिए संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा, "मंत्री, मुख्यमंत्री बहुत कुछ करना चाहते हैं, लेकिन वे उसे क्रियान्वित नहीं करा पाते, क्योंकि हमें अपनी इच्छा और साधन में संतुलन रखना होता है।"

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