दिल्ली दुष्कर्म मामले में मौत की सजा पर पुष्टिकरण सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय की 'तीव्र गति' पर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को उच्च न्यायालय से कहा कि निचली अदालत फैसले, अंतिम आदेश और गवाही का हिंदी अनुवाद मुहैया कराए बगैर आरोपियों की अपील पर कदम नहीं बढ़ाए। दो आरोपियों मुकेश सिंह और पवन कुमार गुप्ता को निचली अदालत के फैसले और अंतिम आदेश और अदालत के सामने पेश गवाही की हिंदी में अनूदित प्रति 10 दिनों के भीतर मुहैया कराने का निर्देश देते हुए प्रधान न्यायाधीश पी. सतशिवम, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की खंडपीठ ने सवाल किया कि 'आखिर क्यों उच्च न्यायालय नंबर के बगैर अपील पर तेज गति से सुनवाई करने में जुटा है। हमें प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।'
उच्च न्यायालय की तत्परता पर स्पष्ट रूप से फटकार लगाते हुए प्रधान न्यायाधीश सतशिवम ने कहा, "यह उच्च न्यायालय का कर्तव्य यह सुनिश्चित करना नहीं है कि सुनवाई के लिए उसके सामने पेश अपील व्यवस्थित है।" अदालत ने यह बात तब कही, जब अतिरिक्त महा न्यायअभिकर्ता सिद्धार्थ लूथरा ने बताया कि आरोपियों की अपील पर संख्या दी गई है। संख्या अपूर्ण और दोषपूर्ण है और इस पर मृत्युदंड की सजा की पुष्टिकरण सुनवाई के साथ ही साथ सुनवाई हो रही है।
प्रधान न्यायाधीश ने सवाल किया, "क्या व्यवस्था आरोपियों को इस तरह की बुनियादी चीजों से महरूम कर सकती है? वे फैसले, अंतिम आदेश और गवाही की हिंदी में अनूदित प्रतियों की मांग कर रहे हैं। ये अंग्रेजी में हैं।" उन्होंने आगे कहा, "जो लोग मौत की सजा का सामना कर रहे हैं, आप उन्हें अनुवाद कराकर क्यों नहीं दे रहे हैं?"
लूथरा के यह कहने पर कि फैसला, अंतिम आदेश और गवाही के अनुवाद की मांग आरोपियों की ओर से सुनवाई में देरी कराने की एक चाल है, प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "अपील पर सुनवाई करने में उच्च न्यायालय आतुरता न दिखाए। क्या उच्च न्यायालय मौत की सजा वाले सभी मामलों की त्वरित सुनवाई करता है?" प्रधान न्यायाधीश ने लूथरा से कहा, "आखिर आरोपियों को भी इस बात की संतुष्टि होनी चाहिए कि उन्हें पूरा मौका दिया गया।"

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