हमारी पूरी जिन्दगी में कई सारे काम ऎसे हैं जिन्हें हम खुद मानते हैं कि ये फालतू हैं। हमारी कई परंपराएं अब पुरानी हो चली हैं और कई प्रथाएं ऎसी हैं जो अब फिजूलखर्ची और औपचारिकता निर्वाह भर के लिए रह गई हैं।
पूरी जिन्दगी में ढेरों ऎसे मौके आते हैं जब हमें लगता है कि आखिर ये सब क्यों करना पड़ता है। यह वह स्थिति है जो हमारे इंसान होने को तगड़ी चुनौती देती है और यह सिद्ध करती है कि हमारे भीतर वो आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प तक नहीं रहा है जिससे कि हम हमारे और समाज के अच्छे-बुरे के बारे में सोच भी सकें, कुछ करने की बात तो बहुत दूर है।
आजकल हर इंसान अपने जीवन में ऎसे कितने ही घुमावदार मोड़ और रास्तों से होकर गुजरता है जिसमें उसे अक्सर लगता है कि जो कुछ हो रहा है, वह अच्छा नहीं है और ऎसा नहीं होना चाहिए। मगर आदमी की विवशता देखियें कि वह कुछ कर नहीं पाता है और मन मसोस कर रह जाता है।
आदमी की यह विवशता कहें या सामाजिक होने की मर्यादा या और कुछ, मगर आदमी की पूरी जिन्दगी का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक पहलू यह है कि वह अपने तथा समाज के हित में काम करने की बजाय सामूहिक उत्सवों और मौसर में सामाजिक और पारिवारिक रूढ़ियों और मर्यादाओं की दुहाई देता हुआ परंपराओं की बाढ़ में बह जाता है और रूढ़ियों तथा अनावश्यक परंपराओं का निर्वहन एक नासमझ दास या अंधे अनुचार की तरह करता चला जाता है और इस तरह अपने आपको सामाजिक कहलाने का दंभ पालता रहता है।
दूसरी ओर खुद अपनी व्यक्तिगत जिन्दगी में उन सारे व्यसनों और बुराइयों को आजमाता रहता है जो वज्र्य कही गई हैं। यहाँ वह अपना विवेेक तक खो देता है और सामाजिक होने के बावजूद असामाजिक हरकतें करने में रमा रहता है।
सामाजिक मामलों में खुद की छवि बनाए और बचाये रखने के लिए आदमी दासत्व ओढ़ कर परंपराओं का पालन करता है जबकि वैयक्तिक मामलों में खुद के स्वार्थ और व्यसनों तथा भोग-विलास को बरकरार रखने के लिए वह समाज और सामाजिक मर्यादाओं का व्यतिक्रम करते हुए उन्मुक्त और स्वेच्छाचारी व्यवहार पर आमादा रहता है।
इंसान की यह दोहरी भूमिका ही वह मुख्य कारण है जिसके कारण हम सभी लोगों से लेकर अपने समुदाय और क्षेत्र को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। हालात ये हैं कि अपने आपको समाज के ठेकेदार कहने वाले, समाजसुधारक की भूमिका में सामने आने वाले और जागरुक कहे जाने वाले बुद्धिजीवी समझदार लोग भी बातें तो समाज को सुधारने और युगानुकूल बदलाव लाने, समाज की उन्नति की करते हैं मगर जब खुद का मौका आता है तब पीछे हट जाते हैं और मूकदर्शक होकर वह सब कुछ स्वीकार कर लिया करते हैं जो उन्हें पसंद नहीं आता, जिसका वे सार्वजनिक तौर पर विरोध करते रहने में आगे ही आगे रहते हैं।
बात हमारे घर-परिवार, समाज, समुदाय या क्षेत्र किसी से भी संबंधित हो, जहाँ कहीं अनौचित्यपूर्ण और फिजूलखर्ची भरी कोई परंपरा हो, इनका खात्मा करना तथा समाज को इन बुराइयों से उबारना हमारा ही फर्ज है, इसके लिए कोई और आगे नहीं आने वाला। कोई इंसान किसी बात को न चाहे, और यह कहे कि करना पड़ता है, किसी इंसान के लिए इससे अच्छी शर्मनाक बात और कुछ हो ही नहीं सकती।
भगवान ने मनुष्य बनाकर धरती पर हमें भेजा ही इसलिए है कि हम अपना और समाज का भला-बुरा सोच-समझकर निर्णय लें और सम सामयिक चिंतन करते हुए युगानुकूल बदलाव लाने के लिए हमेशा तत्पर रहें।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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