आलेख : बिना इमारत का स्कूल - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

आलेख : बिना इमारत का स्कूल

homeless school
महाभारत के काल से एक कथा सुनाई जाती थी कि जब गुरु द्र¨णाचार्य पाण्डव¨ं क¨ शिक्षा दे रहे त¨ एकलव्य नाम के बालक ने गुरु के अभाव में दूर से देख-देख कर शिक्षा प्राप्त की थी। ऐसे ही कुछ एकलव्य तैयार ह¨ रहे हैं जम्मु कश्मीर राज्य के पुंछ जिले में। पुंछ शहर से 20 किमी दूर शिंद्रा पंचायत के एकमात्र प्राथमिक विद्यालय में जहां पर न स्कूल के पास क¨ई भवन है अ©र न ही क¨ई सुविधा। या यूं कहें कि आज के आधुनिक तकनीकि के जमाने में सरकार¨ं अ©र सरकारी महकम¨ं की लापरवाही की बद©लत इस स्कूल के बच्चे एकलव्य बनने पर मजबूर ह¨ रहे हैं।  भारत पाकिस्तान सीमा नियंत्रण रेखा पर ह¨ने की वजह से वैसे भी पुंछ जिले के नागरिक¨ं का जीवन किसी युद्ध से कम नहीं है। हर वक्त सीमा पार से ह¨ने वाली ग¨लाबारी की आशंका, मिलिटेंसी का खतरा इत्यादि मिल कर वैसे भी वहां के ल¨ग¨ं के लिए जीवन अति असामान्य बना देते हैं उस पर इन परेशान हाल बेबस ल¨ग¨ं के प्रति सरकार¨ं एवं सरकारी महकम¨ं की बेरुखी उनके जीवन क¨ अ©र ज्यादा दयनीय बना देती है।। कहने के लिए इन ‘‘कठिन क्षेत्र¨ं’’ क¨ हर सरकारी य¨जना में विशेष सुविधा दी जाती हंै, लेकिन हकीकत यह है कि यह सुविधाएं उन तक पहुंचती ही नहीं है। 
             
ऐसी ही एक बेरुखी अ©र लापरवाही का उदाहरण है शिंद्रा का प्राथमिक विद्यालय। यह विद्यालय उपरी शिंद्रा अ©र निचली शिंद्रा द¨न¨ं पंचायत¨ं के बीच स्थित है ज¨ अगस्त, 2000 में उनक¨ आवंटित हुआ था। लेकिन 2014 तक यह सिर्फ कागज¨ं पर ही  मिला। वास्तविकता में विद्यालय की इमारत ही नहीं है। गंाव के ल¨ग¨ं का कहना है कि जब यह विद्यालय शुरु हुआ था तब इसमें 250 से ज्यादा बच्चे थे लेकिन इन 14 साल¨ं में बच्च¨ं की संख्या घटकर केवल 26 ही रह गई है।  विद्यालय न ह¨ने की वजह से बच्च¨ं क¨ खुले में बैठना पड़ता है ज¨ कि न केवल उनके शिक्षा ग्रहण करने की प्रक्रिया के लिए एक बुरी स्थिति है बल्कि उनके स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ है। जबकि सर्व शिक्षा अभियान के प्रमुख उद्देश्य¨ं में से एक प्राथमिक शिक्षा की गुणवŸाा पर ध्यान देना है। इस विद्यालय में मध्यान्ह भ¨जन के नाम पर आने वाला राशन भी किसी काम नहीं आ पाता। इमारत न ह¨ने की वजह से न राशन रखने की जगह है अ©र न ही उसे पकाने की। कच्चा राशन बच्च¨ं के बीच में बांट दिया जाता है। ज¨ कि सर्व शिक्षा अभियान की मूल भावना, जिसके तहत प¨षण के लिए बच्च¨ं क¨ मध्यान्ह भ¨जन दिया जाना था, के विपरीत है। वर्ष 2012 में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा जारी एक रिप¨र्ट में जम्मु कश्मीर राज्य में सर्व शिक्षा अभियान के तहत आवंटित ह¨ने वाले क¨ष में बड़े पैमाने पर गड़बडि़यां पाई गई थीं। मंत्रालय का आर¨प है कि राज्य शिक्षा विभाग ने उपय¨गिता प्रमाण-पत्र मांगे जाने पर जमा नहीं किया जबकि मंत्रालय द्वारा गठित एक अन्य पैनल ने जांच के बाद जमा की गई अपनी रिप¨र्ट में चन्हित किया कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत आने वाले क¨ष का अधिकारिय¨ं द्वारा दुरुपय¨ग किया जा रहा है।
              
इन बच्च¨ं के अभिभावक¨ं का कहना है कि विद्यालय की फाइल कई बार ज¨नल शिक्षा अधिकारी क¨ भेजी गई लेकिन आज तक उन फाइल¨ं क¨ देखा ही नहीं गया है। उन फाइल¨ं क¨ या त¨ चूहे खा जाते हैं या फिर व¨ मेज पर पड़ी धूल फांकती नजर आती हैं। वहीं दूसरी तरफ ज¨नल शिक्षा अधिकारी से बात करने पर उन्ह¨ंने कहा कि 14 साल पुराने मामले हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं हम इसके लिए कुछ नहीं कर सकते हैं। आपक¨ जाकर सीईअ¨ (चीफ एजुकेशन आॅफिसर) से मिलना ह¨गा। वह ही आपकी मदद कर सकते हैं।इस तरह से सरकारी विभाग के अधिकारी अपने सर से पल्ला झाड़ते नजर आते  हैं अ©र इसकी सजा भुगतते हैं ये छ¨टे मासूम बच्चे। अपने बच्च¨ं के भविष्य की चिंता में उनके अभिभावक दर-दर भटक रहे हैं अ©र हर अधिकारी के पास विनती कर रहे हैं लेकिन उनकी न त¨ अधिकारी सुनने क¨ तैयार है अ©र न ही शिक्षा विभाग। पुंछ जिला प्रशासन द्वारा जारी एक रिप¨र्ट के अनुसार वर्ष 2012-13 में विद्यालय भवन¨ं के निर्माण एवं मरम्मत के लिए 47.76 लाख रुपए आवंटित हुए थे जिनका पूरा इस्तेमाल कर लिया गया था। इतना पैसा जिले में लगने के बावजूद अभी भी ऐसे विद्यालय रह गए हैं ज¨ निश्चय ही इस बात की अ¨र इंगित करता है कि फाइल¨ं में लिखे आंकड़¨ं अ©र वास्तविकता में जमीन आसमान का फर्क है। शिक्षक¨ं की हालत यहां पर अ©र भी बुरी है। पूरे विद्यालय में कुल द¨ शिक्षक है पढ़ाने के लिए अ©र एक पद खाली पड़ा है जबकि वहीं दूसरी तरफ केवल जम्मु प्रांत में करीब 2,50,000 लाख बेर¨जगार हैं। इस पर भी आलम यह है कि जब ज¨नल शिक्षा अधिकारी से शिक्षक¨ं के न ह¨ने की बात बताई गई त¨ उन्ह¨ंने कहा कि आप ल¨ग¨ं क¨ त¨ शुक्र मनाना चाहिए कि 26 बच्च¨ं पर 2 शिक्षक हैं। किसी-किसी विद्यालय में त¨ 100-100 बच्च¨ं पर केवल 1 शिक्षक है। ज¨नल शिक्षा अधिकारी का यह वकत्वय दिखाता है कि हमारे अफसर बच्च¨ं के भविष्य के प्रति कितने संवेदनशील है।
            
गांव वाल¨ं का कहना है कि हमारे साथ आज तक सिर्फ वायदे ही ह¨ते रहे हैं। हमारे पास नेता आते हैं, बड़े-बड़े वायदे करते हैं अ©र फिर भूल जाते हैं। इस गांव के ल¨ग लाचारी से पूछते हैं कि क्या हमारा गांव भारत के अंतर्गत नहीं आता? क्या हमारी परेशानिय¨ं की कहीं भी सुनवाई नहीं ह¨गी? पुंछ जैसे क्षेत्र जहां के ल¨ग¨ं का जीवन अंतरराष्ट्रीेय समीकरण¨ं की वजह से वैसे ही कठिन वहां पर इस तरह से ल¨ग¨ं क¨ उनके बुनियादी अधिकार¨ं से वंचित रखना निःसंदेह ही संवेदनहीनता क¨ दर्शाता है। कहने क¨ त¨ भारत सरकार ्अपने इंजीनियरिंग अ©र मेडिकल काॅलेज¨ं की गुणगान करते नहीं थकती लेकिन सवाल यह है कि क्या इन उच्च शिक्षा संस्थान¨ं में बच्चे आसमान से टपकेंगे? या फिर अब हमारे देश की सरकारें भी यह मान कर बैठ गई हैं कि उच्च शिक्षा केवल निजी स्कूल¨ं से पढ़ने वाले बच्च¨ं की पहुंच तक रह गई है अ©र सरकारी स्कूल¨ं के बच्चे इसमें जा ही नहीं सकते । किसी भी राष्ट्र की तरक्की तभी ह¨ सकती है जब उसकी बुनियाद मजबूत ह¨। अ©र यह बुनियाद भी तभी मजबूत ह¨गी जब देश के क¨ने-क¨ने में प्राथमिक अ©र उच्च माध्यमिक शिक्षा क¨ मजबूत किया जाए फिर व¨ चाहे कश्मीर ह¨ या कन्याकुमारी। 


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नियाज़ अहमद
(चरखा फीचर्स)

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